जागरूकता ही कैंसर की गंभीरता से बचाता है : भारती डोगरा

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(राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस, 7 नवंबर पर विशेष आलेख)
पुंछ, जम्मू
कोरोना महामारी के प्रकोप को कंट्रोल करने के बाद से सरकार ने एक बार फिर से उन बीमारियों को काबू करने की तरफ ध्यान केंद्रित कर लिया है जो देश की एक बड़ी आबादी को प्रभावित कर रही है. इन बीमारियों में कैंसर प्रमुख है. इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) और नेशनल सेंटर फॉर डिज़ीज़ इंफॉर्मेटिक्स एंड रिसर्च (एनसीडीआईआर) की नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम रिपोर्ट 2020 के अनुसार देश में लगभग 16 लाख कैंसर के मरीज़ हैं. 2025 तक यह आंकड़ा 12 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है. हालांकि समय रहते इसका इलाज संभव है. लेकिन ज़रा सी लापरवाही और जागरूकता की कमी पर यह इंसान को मौत के मुंह में धकेल देता है.
लोगों को इसके प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से देश में हर वर्ष 7 नवंबर को राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस मनाया जाता है ताकि इसके उपचार और लक्षणों के प्रति लोगों तक संदेश पहुंचाया जा सके. हालांकि वैश्विक स्तर पर प्रति वर्ष 04 फरवरी को विश्व कैंसर जागरूकता दिवस मनाया जाता है, लेकिन भारत में इसे नोबेल पुरस्कार विजेता मैडम क्यूरी के जन्मदिन 07 नवंबर को मनाया जाता है. जिसे 2014 में तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन द्वारा घोषित किया गया था.
वर्ष 2022-2024 में कैंसर का थीम “Close the Care Gap” रखा गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वैश्विक स्तर पर कैंसर मौत का दूसरा प्रमुख कारण है. 2018 में विश्व स्तर पर लगभग 18 मिलियन मामले कैंसर से संबंधित थे. साल 2040 तक यह मामले दोगुने होने का अनुमान लगाया जा रहा है. जो इसकी गंभीरता को दर्शाता है. भारत में हर साल 7 नवंबर को लोगों को मुफ्त कैंसर जांच के लिए केंद्र से लेकर नगरपालिका के अस्पतालों तक जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है ताकि वहां पहुंचकर अपनी प्रारंभिक जांच करा सकें. जिससे उन्हें यह पता लग सके कि उन्हें किसी प्रकार की कोई कैंसर की कोई शिकायत तो नहीं है. अगर कोई लक्षण पाया जाता है तो उसकी तुरंत जांच कराने की सलाह दी जाती है, ताकि रोगी का जल्द से जल्द उपचार कर उसे रोगमुक्त बनाया जा सके.
दरअसल कैंसर बीमारियों का वह एक समूह है जिसमें असामान्य कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ती हैं तथा शरीर में अपने आसपास के हिस्से पर आक्रमण करने या अन्य अंगों में फैलने के लिए अपने सामान्य सीमाओं को पार कर जाती है. यह शरीर के किसी भी अंग में शुरू हो सकती है. फेफड़े, प्रोस्टेट, पेट एवं यकृत का कैंसर पुरुषों में सबसे आम है जबकि स्तन या थायराइड का कैंसर महिलाओं में सबसे आम है. सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी कराने वाली एक संस्था दृष्टि के शोध के अनुसार मुख्य कैंसर के रोगियों को छोड़कर 30 से 50 प्रतिशत रोगियों को कैंसर में शुरुआती लक्षणों की जांच कर ठीक किया जा सकता है.
केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर के सीमावर्ती ज़िलों में भी कैंसर रोगियों की संख्या देखी जा सकती है. हालांकि समय समय पर स्थानीय प्रशासन द्वारा जांच शिविर लगाकर लोगों को इसके प्रति जागरूक किया जाता रहता है. कुछ माह पहले जम्मू कश्मीर के सांबा जिले के आयुक्त कार्यालय में कैंसर जागरूकता अभियान का आयोजन किया गया था. इसका उद्देश्य आशा वर्करों को कैंसर से जुड़े लक्षणों से परिचित कराना था, ताकि वह ग्रामीण स्तर पर महिलाओं में होने वाले स्तन कैंसर की पहचान कर उस महिला को इलाज के लिए प्रेरित कर सकें. अक्सर ऐसा देखा गया है कि ज्यादातर महिलाएं तब तक डॉक्टर के पास नहीं जाती हैं जब तक वह बहुत अधिक बीमार ना हो जाएं क्योंकि गांव में वह अपने काम में इतनी व्यस्त होती हैं कि वह अपने स्वास्थ्य पर पूरा ध्यान नहीं दे पाती हैं. जिसके कारण बाद में वह गंभीर रोग बन जाता है और उनकी मृत्यु भी हो जाती है.
द हिंदू समाचारपत्र की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार की ओर से कठुआ जिले में टाटा मेमोरियल कैंसर संस्था की शाखा स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है ताकि इस क्षेत्र के कैंसर मरीज़ों को इलाज के लिए राज्य से बाहर भटकना न पड़े. अब देखने वाली बात यह है कि सरकार कब तक इस हॉस्पिटल को तैयार करती है ताकि इस केंद्र शासित प्रदेश के लोगों को कैंसर के प्रति एक बेहतर इलाज मिल सके. क्योंकि जम्मू कश्मीर में भी कैंसर के मरीजों की गिनती कुछ काम नहीं है. 2018 से 2020 तक की रिपोर्ट के अनुसार 21 हज़ार से अधिक लोगों की कैंसर से मृत्यु हुई है. यह आंकड़ा धीरे धीरे बढ़ता ही जा रहा है. हालांकि सरकार की ओर से कैंसर पीड़ित के बेहतर इलाज के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं हैं, जिनमें देश के किसी भी कैंसर संस्थान में इलाज के लिए मुफ्त रेल यात्रा भी शामिल है. इसके अतिरिक्त आयुष्मान स्कीम के अंतर्गत भी कैंसर पीड़ित को इलाज की सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है. लेकिन जागरूकता की कमी के कारण लोग इन योजनाओं का पूरी तरह से लाभ नहीं उठा पाते हैं.
कैंसर से अपने परिजन को खो चुके जम्मू के सीमावर्ती गांव पुंछ के एक परिवार का कहना था कि उनके मरीज़ पिछले कई वर्षों से ब्लैडर कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे. उनका बहुत इलाज करवाया गया. इस दौरान काफी पैसे भी खर्च हुए, आयुष्मान स्कीम के तहत पांच लाख मदद भी मिली, लेकिन शुरुआत में इस बीमारी को बहुत अधिक गंभीरता से नहीं लेने और उचित इलाज नहीं कराने का परिणाम उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. चार वर्ष पूर्व कैंसर के कारण अपने पिता को खो चुके डीडी न्यूज़ दिल्ली में कार्यरत शम्स तमन्ना कहते हैं कि शुरुआत में कई लक्षणों को सामान्य बीमारी समझ कर नज़रअंदाज़ करना ही उनके पिता की मृत्यु का कारण बना था. जबतक वह इसकी गंभीरता के प्रति सचेत होते तबतक वह अंतिम स्टेज पर पहुंच चुका था.
शम्स कहते हैं कि कैंसर के इलाज के लिए सरकार की ओर से बहुत सारी सुविधाएं हैं, कई गैर सरकारी संस्थाएं भी इस क्षेत्र में काम कर रही हैं. लेकिन यह एक आम आदमी की जानकारी से बाहर है. ऐसे में सरकार और इन संस्थाओं का कर्तव्य बनता है कि वह केवल दिवसों में ही नहीं बल्कि प्रत्येक माह गली कूचों में जन जागरूकता अभियान चलाये और हर सप्ताह स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से लोगों के स्वास्थ्य की जांच करे. केवल योजनाएं बना देना ही समस्या का समाधान नहीं है बल्कि आम लोगों तक इस गंभीर बीमारी के प्रति जागरूकता लाना मुख्य उद्देश्य होनी चाहिए. यही वह माध्यम है जिससे देश को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से मुक्त कराया जा सकता है. पोलियो, हैज़ा और चेचक इसका उदाहरण है, जो आज देश में पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है. (चरखा फीचर)

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