सुभाष चंद्र बोस व आज़ाद हिंद फ़ौज के प्रति नेहरू सरकार का अत्याचार

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——————————————- २१ अक्तूबर का दिन भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में एक स्वर्णिम दिन है। इस दिन सन १९४३ में जब अंडमान निकोबार द्वीप समूह का नियंत्रण सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फ़ौज के नियंत्रण में आया तब सुभाष चंद्र बोस ने अखंड भारत की पहली स्वाधीन सरकार की स्थापना की जिसे बिश्व के ९ ताकतवर देशों यथा जापान,जर्मनी, इटली व अन्य ६ शक्तिशाली देशोंने स्वीकृति प्रदान की। भारत को स्वाधीनता देनेवाले ब्रिटेन के प्रधान मंत्री एटली जिन्होंने अपने प्रधानमंत्रीत्व के समय भारत को स्वाधीनता प्रदान की। ऊनसे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने उनके भारत सफ़र के समय में पूछा, ब्रिटेन तो द्वीतीय बिश्व युद्ध जीत चुका था,भारत छोड़ो आंदोलन भी असफल हो गया था,फिर उनके साथ क्या मजबूरी हुईँ की ब्रिटेन को भारत को स्वतंत्रता देनी पड़ी। एटली ने इसका उत्तर दिया सुभाष चंद्र बोस व ऊनके आज़ाद हिंद फ़ौज के संग्राम ने भारतीय सैनिकों की वफ़ादारी बदल दी। वे ब्रिटिश सरकार के प्रति वफ़ादार नही रहे। अगला प्रश्न राज्यपाल महोदय ने किया भारत को स्वाधीन कराने में गाँधी का क्या अवदान रहा। वे हंसे और जवाब दिया mi-ni-mal.एटली के कहने के अनुसार हम यही समझते है,सुभाष चंद्र बोस व आज़ाद हिन्द फ़ौज के स्वतंत्रता संघर्ष ने भारत की सेना जिसके बलबूते अंग्रेज भारत पर शासन करते थे। वह उनके प्रति वफ़ादार नही रहकर उनके विरुद्ध हो ग़यी,इसलिए ऊनको भारत छोड़ना पड़ा। गाँधी ने सुभाष चंद्रा बोस को चुनौती दी थी,वे कभी सफल नही होंगे,वे यदी सफल हुवे,तो वे स्वयम ऊनका स्वागत करेंगे। जब भारत की धरती पर इम्फ़ाल में आज़ाद हिंद सेना पहुँच गयी,तब गाँधी को सुभाष बाबू ने अपनी सफलता का संदेश दिया की मेरी सेना भारत की धरती पर पहुँच कर लड़ रही है। उनको उनका पूराना वादा याद दिलाया की वे उनका साथ दे। इसके उत्तर में गांधी ने नेहरू को असम भेज कर अपना संदेश दिया,सुभाष आगे बढ़ेंगे तो उनको ऊनसे लड़ना पड़ेगा। यही गाँधी जब आज़ाद हिंद सेना के गौरवपूर्ण व वीरतापूर्णसंघर्ष की बाते भारतीय जनता को क़ैद करके लाए आज़ाद हिंद सेना के सिपाहियों से ज्ञात हुवि,भारत की जनता उनके स्वागत के लिए रास्ते पर उतर गयी। आज़ाद हिंद सेना की इस राष्ट्र ब्यापी ख्याति का लाभ उठाने के लिए गांधी ने कांग्रेस में INA Defence & Rehabilitation Commitee गठन किया।नेहरू कालाकोट पहन कर लालक़िले में आज़ाद हिंद फ़ौज के सिपाहियों पर चल रहे मुक़दमे में वकील की हैसियत से पहुँचे। जनता ने इस फंड में खुलकर पैसा दिया। वही नेहरू ने आज़ाद हिंद फ़ोज के प्रतिनिधि मण्डल से,प्रधान मन्त्री बनने के बाद,तुम गंवार जापानी एजेंट कह,कर मिलने से इंकार कर दिया। कांग्रेस के हाथ में देश की सत्ता आने के बाद नेहरू सरकार जी कांग्रेस द्वारा स्थापित INA Defence & Rehabilation Commitee के कार्य को सम्पूर्ण करने के लिए,आज़ाद हिन्द सेना के सिपाहियों की भारतीय सेना में पुनः बहाल करना चाहिए था,क्योंकि वे सभी ब्रिटिश सेना के ही तो भारतीय सिपाही थे। पाकिस्तान ने मुसलमान सैनिकों को पुनः बहाल किया,पर नेहरू ने पुनः बहाल करना तो दूर,उनके प्रतिनिधि मण्डल से गँवार जापानी एजेंट कह कर मिलने से इंकार कर दिया। नेहरू सरकार ने हद तो तब करदी जब नेहरू सरकार ने सेना के बम्बई मुख्यालय ने १६ फ़रवरी १९४९ के आदेश संख्या एस१५५२११-१ द्वारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस के चित्रों को भी किसी जगह लगाने-दिखाने और चिपकाने की मनाही कर दी गयी। मुझे एक पत्र INA की रानी झाँसी रेजिमेंट की डॉक्टर लक्ष्मी सहगल ने लिखा, वह मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ।

कितना बेदना दायक है की भारत सरकार की निगाह में देश को स्वाधीन करने वाली आज़ाद हिंद फ़ौज “देश द्रोही” है।
पहली बार भारत के किसी प्रधानमंत्री ने २१ अक्तूबर को लालक़िले पर तिरंगा फहरा कर अखंड भारत की आज़ाद हिंद सरकार को सम्मान दिया था। यह काम प्रधान मंत्री मोदी जी को प्रत्येक वर्ष करना चाहिए। तभी हम आज़ाद हिंद फ़ौज को उचित सम्मान दे पाएँगे।

सुभाष चंद्र बोस व आज़ाद हिन्द फ़ौज के प्रति नेहरू का अत्याचार- कृपया उपरोक्त लेख में पढ़े।

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