सूखे की मार के प्रति पूरी तरह उदासीन सरकार

धर्मेन्द्रपाल सिंह

बीती तीस सितंबर की तारीख दो लिहाज से बहुत महत्त्वपूर्ण थी। पहला कारण है मौसम विभाग ने इस दिन मानसून के लौटने की अधिकृत घोषणा कर दी और मान लिया कि लगातार दूसरे साल देश सूखे की चपेट में है। दूसरा कारण है इसी दिन केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को दी गई खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने की समय-सीमा खत्म हो गई। ताजा जानकारी के अनुसार मुल्क के कुल छत्तीस राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से केवल सोलह ने गरीब जनता के जीवन-मरण से जुड़ा यह कानून लागू किया है। बार-बार आग्रह और आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश, गुजरात और केरल सहित बीस सूबे कान में तेल डाल कर बैठे हैं।

सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी यह बात जानता है कि जब देश में सूखे की स्थिति हो तब खाद्य सुरक्षा कानून ही गरीब जनता का सुरक्षा कवच होता है। केंद्र के निर्देशानुसार जिन राज्यों ने दो बरस पहले 2013 में पारित यह कानून अब तक लागू नहीं किया है, वे भविष्य में सस्ती दर पर अनाज पाने के हकदार नहीं रहेंगे। खाद्य सुरक्षा कानून देश की सड़सठ फीसद आबादी को हर महीने पांच किलो गेहूं, चावल या कोई अन्य मोटा अनाज एक से तीन रुपए प्रति किलो की दर पर मुहैया करने की गारंटी देता है। खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने का जिम्मा मुख्य रूप से राज्य सरकारों का है, जिनके ढीले रवैये से स्थिति संकटपूर्ण बनती जा रही है। रियायत बरत कर केंद्र यदि गरीबी रेखा (बीपीएल) से नीचे और अंत्योदय योजना (सर्वाधिक गरीब) के अंतर्गत आने वाली जनता को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने पर राजी हो भी जाए, तब भी शेष बचे राशनकार्ड धारकों के लिए राज्य सरकारों को अतिरिक्त करोड़ों रुपए खर्च कर महंगा अनाज खरीदना पड़ेगा। इससे उनका वित्तीय बोझ बढऩा लाजिमी है।

बात आगे बढ़ाने से पहले सूखे से जुड़ा सच जानना जरूरी है। हमारे यहां एक जून से तीस सितंबर तक यानी चार माह के दौरान मानसून सक्रिय रहता है। दुख की बात यह है कि आजादी के अड़सठ वर्ष बाद भी देश की करीब पचास प्रतिशत खेती मानसून की मेहरबानी पर मुनस्सर है। मौसम विभाग के अनुसार इन चार महीनों में यदि 8.875 सेंटीमीटर बारिश हो जाए तो उसे सामान्य माना जाता है। इस साल चौदह फीसद कम, मतलब 7.706 सेंटीमीटर बारिश हुई है। जून माह में वर्षा सामान्य से सोलह प्रतिशत अधिक थी, जबकि जुलाई और अगस्त में क्रमश: सोलह और बीस फीसद कम थी। यों तो पिछले वर्ष भी सूखा पड़ा था लेकिन तब अपेक्षया बेहतर वर्षा (7.817 सेंटीमीटर) दर्ज की गई थी। तथ्य गवाह है कि वर्ष 2009 के बाद पहली बार इंद्रदेव इतनी बुरी तरह रूठे हैं।

कुल मिलाकर हालात काफी खराब हैं। सरकार ने भी स्वीकार कर लिया है कि देश का उनतालीस प्रतिशत क्षेत्र सूखे की चपेट में है। प्रशासन उस इलाके को सूखाग्रस्त मानता है जहां वर्षा सामान्य से बीस प्रतिशत कम होती है। जिन इलाकों में बारिश का आंकड़ा सामान्य से पचास फीसद या इससे अधिक कमजोर हो, उन्हें भीषण सूखाग्रस्त कहा जाता है। इस कसौटी पर देखें तो आज हिंदुस्तान के 614 में से 302 जिले सूखे या भीषण सूखे का संकट झेल रहे हैं। इससे पहले, वाजपेयी सरकार के दौरान वर्ष 2002 में 383 जिले सूखे की चपेट में आए थे। फिलहाल अठारह अठारह राज्यों के छियासठ करोड़ लोगों के सिर पर संकट मंडरा रहा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मौसम विभाग ने पूरे देश को जिन छत्तीस मौसम उपसंभाग में बांट रखा है, उनमें से सत्रह में इस साल औसत से कम वर्षा हुई है। सर्वाधिक मार देश के सबसे उपजाऊ इलाकों पर पड़ी है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना के करोड़ों किसान बर्बादी के कगार पर खड़े हैं। गंगा-यमुना का जरखेज इलाका, जहां कल तक खेत सोना उगलते थे, आज वहां धूल उड़ रही है। लगातार दो साल सूखा पडऩे से भू-जल स्तर गिरना तो तय है, साथ ही ज्यादा चिंता की बात देश के इक्यानवे बड़े जलाशयों का घटता जल स्तर है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार मानसून खत्म होने पर इन जलाशयों में भंडारण क्षमता का महज सतहत्तर फीसद पानी था। दक्षिण में स्थिति और भी विकट है। वहां के तालाबों और झीलों में मात्र चौंतीस प्रतिशत पानी है, जिससे पूरे एक साल पेयजल, सिंचाई और बिजली उत्पादन का काम चलाना पड़ेगा। मानसून की वक्रदृष्टि के कारण खरीफ की फसल गहरे संकट में है। कमजोर खरीफ का अर्थ है धान, मोटे अनाज, दहलन और तिलहन की कम पैदावार, जिसका सबसे ज्यादा असर आम आदमी पर पड़ेगा। दालों की कीमत में लगातार इजाफा, आने वाले तूफान का संकेत है। कृषि मंत्रालय के अग्रिम अनुमान (जो फसल बुआई के वक्त लगाया जाता है) के अनुसार इस साल खरीफ की पैदावार 12.4 करोड़ टन रहने की संभावना है, जो पिछले वर्ष से दो फीसद कम होगी। सूखे के बावजूद वर्ष 2014 में खरीफ की पैदावार 12.63 करोड़ टन थी। चूंकि जुलाई के बाद बारिश लगातार घटती गई है, इसलिए अग्रिम अनुमान का आंकड़ा गिरना तय है।

एक बात और। सरकारी गोदामों में जमा खाद्यान्न भंडार इस एक सितंबर को पंद्रह प्रतिशत गिर कर 5.09 करोड़ टन रह गया था। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 6.06 करोड़ टन था। वैसे इस बात का कमजोर मानसून से कोई वास्ता नहीं है। खाद्यान्न भंडार घटने की दो वजहें हैं। पहली है, पिछले साल अन्न पैदावार में आई 4.7 प्रतिशत की कमी, और दूसरी है, सरकार द्वारा खरीद-मूल्य में समुचित वृद्धि न करना। चिंता की बात यह है कि सरकार के पास अब इतना ही अनाज बचा है, जिससे किसी तरह खरीफ की फसल बाजार में आने तक काम चलाया जा सके। अगर खरीफ की फसल के समर्थन-मूल्य में पर्याप्त वृद्धि नहीं हुई तो सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए समुचित मात्रा में अनाज मिलना कठिन हो सकता है।

अब जरा पीडीएस व्यवस्था का जायजा लिया जाए। घरेलू गैस पर मिलने वाली सबसिडी का पैसा उपभोक्ता के खाते में सीधा हस्तांतरित (डीबीटी) करने संबंधी योजना की सफलता से उत्साहित सरकार ने अब पीडीएफ को भी इसकी जद में लाने का मन बना लिया है। केंद्र ने सभी राज्य सरकारों से कहा है कि इस साल के अंत तक यह काम शुरू हो जाना चाहिए। रसोई गैस पर डीबीटी नवंबर 2014 से लागू है। सरकार 14.19 करोड़ उपभोक्ताओं के बैंक खाते में सबसिडी का 25447.93 करोड़ रुपया सीधे जमा करा चुकी है और हेराफेरी पर अंकुश लगा कर उसने पंद्रह हजार करोड़ रुपए की बचत भी कर ली है। यह योजना जब राशन की दुकानों से मिलने वाले गेहंू-चावल पर लागू होगी तब अंदाजा है कि सरकार करीब पचास हजार करोड़ रुपए और बचा लेगी।

सरकार का मानना है कि पूरे देश में लाखों राशन कार्ड जाली हैं। जब सभी कार्डों की बायोमैट्रिक पुष्टि हो जाएगी और राशन की एवज में पैसा सीधे उपभोक्ता के खाते में जमा होने लगेगा या उसे कूपन मिलने लगेगा, तब भ्रष्टाचार पर स्वत: अंकुश लग जाएगा।

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