बुलंद भारत बनाने के अपनाये जा रहे खोटे प्रयास

पीके खुराना

सरकार गरीबों के उत्थान के लिए बहुत सी योजनाएं चलाती है। बीपीएल कार्ड, सबसिडी, दलितों के लिए आरक्षण, छात्रवृत्ति आदि उपाय इन योजनाओं में शामिल हैं। यही नहीं, देश भर में कार्यरत लाखों एनजीओ भी गरीबों, वंचितों के उत्थान के लिए कई काम करते हैं। मैं फिर दोहराता हूं कि इन सारे प्रयत्नों के बावजूद गरीबों की संख्या और गरीबी, दोनों घटने के बजाय बढ़े हैं। इसका एक ही अर्थ है कि हमारे प्रयत्नों की दिशा में कहीं कोई मूलभूत गड़बड़ है, जिसके कारण गरीब और गरीबी घटने के बजाय बढ़ रहे हैं। लगातार बढ़ रहे हैं और जब तक ऐसा ही चलेगा, बुलंद भारत का हमारा सपना अधूरा ही रहेगाज्भारतवर्ष के बारे में यह कहना सच ही है कि हमारा देश दो बड़े वर्गों में बंटा है। पहला भाग ‘इंडिया’ और दूसरा भाग ‘भारत’ कहलाता है। ‘इंडिया’ जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, पढ़ा-लिखा है, अंग्रेजीदां है, शहरों में निवास करता है, लैपटॉप, स्मार्टफोन और मॉल की दुनिया में जीता है। पिज्जा और बर्गर खाता है। मध्यम वर्ग, उच्च मध्यम वर्ग, उच्च वर्ग और कुलीन वर्ग (अत्यंत अमीर) आदि इसमें शामिल हैं। जरूरी नहीं कि इनमें से सभी लोग बहुत सुखी जीवन जी रहे हों, पर फिर भी ये ऐसे लोग हैं जो कदरन सुविधा संपन्न जीवन जीते हैं। दूसरी ओर, ‘भारत’ कहलाने वाला वर्ग छोटे कस्बों और गांवों का निवासी है या शहरों में छोटी कालोनियों, मलिन बस्तियों या अवैध कालोनियों में बसता है। इसमें मध्यम वर्ग, निम्न वर्ग, गरीब, पिछड़े, अति पिछड़े और गरीबी रेखा पर तथा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग शामिल हैं। जरू री नहीं है कि इनमें से सारे लोग दुखी हों, क्योंकि सुखी और दुखी होने के लिए पैसा अकेला निर्धारक फैक्टर नहीं है। यह संभव है कि कोई अमीर आदमी भी अत्यधिक दुखी अथवा तनावग्रस्त हो और यह भी संभव है कि कोई गरीब आदमी अपने जीवन से इतना संतुष्ट हो कि उसे दुख का भान ही न होता हो। लेकिन वह एक अलग विषय है। जब हम ‘इंडिया’ और ‘भारत’ की बात करते हैं, तो हमारा आशय सुविधा संपन्न जीवन जीने वाले लोगों और वंचितों से होता है। इसी का दूसरा पहलू है शहर, और छोटे कस्बों तथा गांवों में विकास की गति।बड़े शहरों में चिकित्सा, शिक्षा, परिवहन की बेहतर सुविधाएं होने के कारण वहां उद्योग और व्यापार ज्यादा फलते-फूलते हैं। हिमाचल प्रदेश का सेब अंबाला, कुरुक्षेत्र, करनाल या पानीपत में आने से पहले दिल्ली की मंडी में पंहुचता है और हरियाणा के इन शहरों में दिल्ली से वापस आता है। शहरी सुविधाओं के कारण शहरों में व्यापार और उद्योग के फलने-फूलने के अवसर कुछ ज्यादा होते हैं और इसीलिए बड़े व्यापार और बड़े उद्योग बड़े शहरों में सीमित हो जाते हैं। गांव और कस्बे इस दौड़ में पिछड़ जाते हैं और पिछड़े ही बने रहते हैं। इसी प्रकार, ‘इंडिया’ और ‘भारत’ की अमीरी और गरीबी के सवाल की चर्चा करें तो यह स्पष्ट है कि सारी सरकारी योजनाओं के बावजूद देश में गरीबों की संख्या कम नहीं हुई है। यहां कुछ मुद्दों पर विचार आवश्यक है। सरकार गरीबों के उत्थान के लिए बहुत सी योजनाएं चलाती है। बीपीएल कार्ड, सबसिडी, दलितों के लिए आरक्षण, स्कूलों में मध्याह्न भोजन, छात्रवृत्ति आदि उपाय इन योजनाओं में शामिल हैं। यही नहीं, देश भर में कार्यरत लाखों एनजीओ भी गरीबों, पिछड़ों, वंचितों के उत्थान के लिए कई काम करते हैं। मैं फिर दोहराता हूं कि इन सारे प्रयत्नों के बावजूद गरीबों की संख्या और गरीबी, दोनों घटने के बजाय बढ़े हैं। इसका एक ही अर्थ है कि हमारे प्रयत्नों की दिशा में कहीं कोई मूलभूत गड़बड़ है, जिसके कारण गरीब और गरीबी घटने के बजाय बढ़ रहे हैं। लगातार बढ़ रहे हैं और जब तक ऐसा ही चलेगा, बुलंद भारत का हमारा सपना अधूरा ही रहेगा। मैं यहां एक बात पर खास जोर देना चाहता हूं कि सरकार की सारी योजनाएं बेकार नहीं हैं और ऐसा नहीं है कि उनका कोई असर नहीं हुआ है। इसी तरह सभी एनजीओ सिर्फ ग्रांट के लिए ही काम नहीं करते। सचमुच सेवा भाव से काम करने वाले भी बहुत से एनजीओ हैं और सरकार और एनजीओ के सम्मिलित प्रयत्नों से धरातल स्तर पर बहुत सी जिंदगियां बदली हैं।मैं किसी की आलोचना नहीं कर रहा, मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि हमें अपने प्रयत्नों की दशा ही नहीं, दिशा की भी समीक्षा करने की आवश्यकता है, ताकि हमारे प्रयत्न वांछित परिणाम दे सकें। हमें अपनी शिक्षा नीति में कुछ परिवर्तन करने की आवश्यकता है। शिक्षा में ‘इंडस्ट्री-एकेडमी इंटरफेस’ को नए स्तर पर ले जाने की आवश्यकता है, जहां सिर्फ बिजनेस स्कूलों या आईआईटी में ही नहीं, बल्कि हर स्तर पर और शिक्षा की हर स्ट्रीम में सफल व्यक्तियों, सफल व्यवसायियों और सफल उद्यमियों की शिरकत हो। विद्यार्थी उनके अनुभव से इतना सीख सकें कि वे ‘जॉब-सीकर’ यानी नौकरी मांगने वाले युवाओं के बजाय ‘जॉब-प्रोवाइडर’ यानी रोजगार का सृजन करने वाले व्यक्तियों में शामिल हो सकें। अभी देश के बहुत से बिजनेस स्कूलों, इंजीनियरिंग कालेजों और आईआईटी संस्थानों में सार्थक ‘इंडस्ट्री-एकेडमी इंटरफेस’ चल रहा है, जिसने देश की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दी है। यह प्रयत्न यहीं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि आट्र्स, कामर्स और साइंस के सभी स्ट्रीमों में लागू किया जाना चाहिए।

दूसरी बात, आरक्षण जैसी सुविधा का होना आवश्यक है, होना सिर्फ यह चाहिए कि पात्र लोगों को मिले। ऐसी किसी भी सुविधा का लाभ देने को आधार आर्थिक स्थिति हो या फिर मैरिट। कहने का अर्थ यह है कि छात्रवृत्ति दो ही तरह के विद्यार्थियों को मिलनी चाहिए। पहले वे जो गरीब हैं और जिन्हें आर्थिक सहायता की आवश्यकता है और दूसरे वे जो पढ़ाई में आगे हैं और जो अच्छे अंक ले रहे हैं। इसके साथ ही यह समीक्षा भी होनी चाहिए कि पढ़ाई में पीछे रहने वाले विद्यार्थी पढ़ाई में आगे क्यों नहीं आ पा रहे हैं और उन्हें किस तरह की सहायता की आवश्यकता है कि पढ़ाई में आगे बढ़ सकें। इसके साथ ही हमें यह देखना होगा कि गांव में समृद्धि क्यों नहीं आ रही है, सारी समृद्धि बड़े शहरों और महानगरों में ही क्यों सिमटती जा रही है। दरअसल, हमारी अर्थव्यवस्था, आर्थिक नीतियां तथा सामाजिक-आर्थिक तानाबाना ही ऐसा है कि हमने कस्बों और गांवों की उन्नति में सहायक होने वाली अर्थव्यवस्था और आर्थिक नीतियों का विकास नहीं किया है।हम गांवों में और ग्रामीणों के लिए छोटे उद्योगों की बात करते हैं और ऐसे स्वरोजगार की बात करते हैं, जिसमें आय सीमित है। चूंकि लक्ष्य छोटा होता है, इसलिए बड़ा बनने या ऊंचा उठने की बात मन में आती ही नहीं। हमें सरकारी नीतियों में, स्वयंसेवी संस्थाओं के नजरिए में और अपनी योजनाओं में इस सीमा के अतिक्रमण की जुगत भिड़ानी होगी, तभी गांवों का विकास होगा, तभी गांवों से शहरों की ओर पलायन रुकेगा, तभी सुविधा संपन्न लोग भी गांवों में रहना पसंद करेंगे। इनमें से कोई भी काम आसान नहीं है।

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