नंबर एक के पायदान पर अमेरिका है चीन नहीं

images (24)

विजय गोखले

नदी के पार चमकता शहर, जिसकी स्काईलाइन रात में रोशनी से नहाई हो और जिसका जोश देखते बनता हो। यह पढ़कर आपमें से कुछ लोगों को इस शहर के न्यूयॉर्क होने का भरम हो सकता है, लेकिन मेरा इशारा शंघाई की ओर है। इसी शहर में जुलाई, 1921 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की माओ त्से तुंग की मौजूदगी में स्थापना हुई थी। इसके बाद के 100 बरसों में शंघाई और पार्टी का उभार साथ-साथ हुआ। इस साल वैश्विक महामारी के बीच भी दोनों पर कोई आंच नहीं आई। उलटे उन्होंने जिस तरह से इस चुनौती का सामना किया, उनकी चमक कुछ और बढ़ी ही है।

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अगले महीने दूसरी सदी में प्रवेश करने जा रही है और चीन महानता के मुहाने पर खड़ा है। शायद पार्टी के महासचिव इसे यूं कहें कि चीन दुनिया के केंद्र में आने के बेहद करीब है। 2020 में 14.72 लाख करोड़ डॉलर जीडीपी के साथ चीन 2025 तक दुनिया के लीडर अमेरिका (22.48 लाख करोड़ डॉलर) के बेहद करीब पहुंच चुका होगा। उसकी सेना 2035 तक वर्ल्ड क्लास हो चुकी होगी। दूसरे देशों को तकनीक और पूंजी देने की स्थिति में होने के कारण चीन की कूटनीतिक पहुंच भी कहीं ज्यादा बढ़ जाएगी। ऐसे में 1914-45 के दो विश्व युद्धों के बाद अमेरिका का जिस तरह से उभार हुआ, उससे चीन की तुलना लाजिमी है।

उस वक्त अमेरिका की इकॉनमी बढ़ती गई। इसके साथ उसका वैश्विक प्रभाव भी बढ़ा, जबकि यूरोप दो विश्व युद्ध के दौरान काफी कमजोर हो चुका था। इसी तरह से शीत युद्ध के बाद अफगानिस्तान और इराक में युद्ध के कारण अमेरिका को अपने सैनिकों की शहादत के साथ अरबों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा। दूरी तरफ, चीन की अर्थव्यवस्था और उसके प्रभाव में बढ़ोतरी होती गई। इसके बाद जब सदी में एक बार आने वाली महामारी ने दुनिया को चपेट में लिया तो चीन और तेजी से उभरा। इसलिए आज हर कोई यही सवाल कर रहा है कि क्या यह सदी चीन की होगी?

हो सकता है कइयों को यह तुलना पसंद न आए, लेकिन यह बेमतलब नहीं है। अमेरिका के वैश्विक महाशक्ति बनने को बाहर से उसकी आर्थिक तरक्की और सैन्य ताकत के जरिये महसूस किया जा सकता था, लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं थी। इस दौरान वहां काफी घरेलू बदलाव भी हुए। पहला, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी राजनीति पर एलीट वर्ग की पकड़ कमजोर हुई। इससे ट्रूमैन, निक्सन और ओबामा जैसे आम पृष्ठभूमि से आने वाले लोग राष्ट्रपति बन पाए और राजनीति में नई सोच पनपी। इसके उलट चीन की राजनीति का दायरा और संकुचित हुआ है। 2013 में वहां पार्टी के लिए जो नए नियम और दिशानिर्देश तय हुए, उनमें मेंबरशिप के लिए योग्यताओं को काफी संकुचित कर दिया गया और राजनीतिक बहस को भी सीमित दायरे के अंदर अनुमति दी गई। फिर 2020 से पार्टी को ‘शुद्ध’ करने की शुरुआत हुई। कई लोगों को निकाला गया। इन सबसे चीन की राजनीति में एलीटों का दखल बढ़ा। चीन में सियासत सिर्फ पार्टी के जरिये हो सकती है और वही तय करती है कि किस तरह की राजनीतिक बात मान्य होगी। दूसरा, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका को ऐतिहासिक नस्लीय मसलों से जूझना पड़ा। इससे जो सुधार हुए, उससे अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय को राजनीति की मुख्यधारा में जगह मिली, जिससे देश मजबूत हुआ। चीन में. आस्था, संस्कृति को लेकर अल्पसंख्यकों का दमन हो रहा है। यहां तक कि संविधान ने उन्हें जो आजादी दी है, वह भी छीनी जा रही है। तीसरा, कुछ समय तक अमेरिका ने प्रवासियों के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह खोल दिए थे। इससे वहां दुनिया भर से बेस्ट टैलंट पहुंचा। इससे अमेरिका की इकॉनमी को फायदा हुआ और पूरी दुनिया में अमेरिकियों के जीने के तरीके का प्रचार हुआ। इसके उलट चीन अपने लोगों और सूचनाओं को सीमा पार जाने से रोकने के लिए वर्चुअल दीवार बना रहा है।

चीन अगर ऐसा न करता तो विदेशी प्रभाव और विचारों से उसे वर्ल्ड क्लास इकॉनमी बनने में मदद मिलती। हाल यह है कि चीन अपने यहां के निजी बिजनेस को भी नियंत्रित कर रहा है। जैक मा और ऐंट फाइनैंशल जैसी हालिया घटनाएं इसकी मिसाल हैं। यूं तो अमेरिका में भी एंटी-ट्रस्ट कानून हैं, लेकिन वहां इसके जरिये पारदर्शी तरीके से बड़ी कंपनियों को रेगुलेट किया जाता है।

चौथा, अमेरिका ने दुनिया पर अपना सिक्का आसपास के और सहयोगी देशों के साथ अच्छे संबंध रख और दरियादिली दिखाकर जमाया था। यह बात दूरदराज के समुद्री इलाकों तक पहुंची और उसे वहां तक पहुंच मिली। दूसरी ओर, पिछले एक दशक में चीन ने जमीन और समुद्र को लेकर अपने पड़ोसियों के सब्र का इम्तहान लिया है। अमेरिका जब अपनी ताकत के शिखर पर था, तब उसने सहयोगी देशों को जो आर्थिक मदद दी, उसके मुकाबले चीन की बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव परियोजना कहीं महत्वाकांक्षी है। लेकिन सच यह भी है कि चीन ने अभी तक अपने पड़ोसियों का भरोसा हासिल नहीं किया है।

ऊपर से देखें तो चीन की स्थिरता और ग्रोथ बेमिसाल है। उससे ईर्ष्या हो सकती है। लोकतांत्रिक देश इन दोनों को ही लेकर संघर्ष करते आए हैं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का दावा है कि बिना लोकतंत्र के उसने जो विकास हासिल किया है, उस वजह से चीनी लोग उससे मोहब्बत करते हैं। इस तरह से पार्टी विकास के चीनी मॉडल के बेहतर होने का दावा करती है। फिर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सामाजिक-राजनीतिक नियंत्रण पर इतना जोर क्यों देते हैं, यह बात समझ से परे है। वे खुद से अलग विचार रखने वालों को चीन के लिए खतरा क्यों मानते हैं।

जब उनके नेता कहते हैं कि किले में सेंध अंदर से ही लगने के आसार हैं तो इससे उनका डर बाहर आ जाता है। भले ही वे बाहर से खुद के आत्मविश्वासी होने का कितना ही दिखावा करें। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने इस साल दावोस में कहा था कि इतिहास आगे बढ़ रहा है, लेकिन उन्हें इतिहास के सबक पर एक नजर जरूर डालनी चाहिए।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
hititbet
hititbet
Tuzla İpek Kirpik
betnano
hititbet giriş
hititbet
betnano
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
hititbet
hititbet
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betkom giriş
betkom giriş
grandpashabet
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş