महर्षि मनु की तपस्थली में चार दिन

पिछले दिनों 19 जून से 23 जून तक हिमांचल प्रदेश के कुल्लू-मनाली एवं रोहतांग क्षेत्र का प्राकृतिक नजारा देखने और उसका आनंद लेने का अवसर मिला। मनाली दिल्ली से 533 किमी की दूरी पर बसा है। हिमांचल प्रदेश पहले पंजाब का ही एक भाग था। 1971 में भाषायी आधार पर जब पंजाब प्रदेश का विभाजन किया गया तो हिम के आंचल में अर्थात बर्फ की गोद में स्थित होने के कारण तत्कालीन पंजाब के इस पहाड़ी क्षेत्र का नाम हिमांचल रखा गया। वैसे महाभारत में भी इस प्रदेश का वर्णन है। आजकल के कुल्लू को उस समय कुलूत कहा जाता था। कालांतर में कुलूत अपभ्रंशित होकर कुल्लू हो गया। आजकल यह कुल्लू हिमांचल प्रदेश का एक प्रसिद्घ पर्यटक स्थल बन चुका है। महाभारत काल में यहां का राजा वृहन्त था जिसे अर्जुन ने दिग्विजय यात्रा के दौरान जीता था। इसकी जानकारी हमें महाभारत के सभा पर्व 27/5 से 11 तक में मिलती है। संस्कृत के कवि राजशेखर ने भी कन्नौजाधिपति महीपाल (9वीं शती) के द्वारा जीते गये प्रदेशों में कुलूत का वर्णन किया है।af

विलासपुर के विषय में :- हिमांचल के विलासपुर के विषय में बताया जाता है कि इस नगर की नींव राजा दीपचंद ने 1653 में डाली थी। इस राजा ने महर्षि व्यास से प्रभावित होकर इस नगर का नाम व्यासपुर रखा था। यही व्यासपुर काल के प्रवाह में बहते बहते विलासपुर हो गया। स्थानीय लोगों का मानना है कि कभी व्यास जी ने यहीं तपस्या की थी। उनकी व्यास गुफा आज भी है। विलासपुर से लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर महर्षि मार्कं डेय का आश्रम है। व्यासजी की तपस्या स्थली तथा महर्षि मार्कं डेय का आश्रम एक गुफा से जुड़े हुए हैं। यहां के अधिकांश मंदिरों का निर्माण पांडवों के द्वारा किया गया माना जाता है। वैसे प्राचीन विलासपुर नगर तो भाखड़ा नांगल बांध के कारण जलमग्न हो चुका है। उसी के नाम पर वर्तमान विलासपुर दूसरे स्थान पर आबाद हुआ है। इस प्रकार विलासपुर का अपना महत्व है, और उसका इतिहास बड़ा ही रोचक है।

प्राकृतिक छटाएं :- हिमांचल प्रदेश अपनी प्राकृतिक छटाओं के लिए प्राचीन काल से ही प्रसिद्घ रहा है। आज भी इसका प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है। हमारा 16 यात्रियों का जत्था मनाली में सेवों की घाटी में स्थित शासनी होटल में रूका। वहां नीचे व्यास नदी बड़ी तीव्रता से बहती है। दोनों ओर की ऊंची पहाड़ियों पर देवदार के लंबे लंबे वृक्षों के कारण प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है। सेवों की घाटी में छोटे-छोटे पेड़ों पर भी सेवों की भरमार है जिससे दृश्य और भी मनोहारी बन जाता है।

मनाली के विषय में :- मनाली की जनसंख्या 2001 की जनगणना के समय 6265 थी। जो अब बढ़कर तीस हजार के लगभग हो गयी है। वैसे मनाली का भी अपने आप में एक गौरवमयी इतिहास है। जब धरती पर प्राचीन काल में जलप्लावन हुआ था और उस जलप्लावन से मैदानी क्षेत्र की प्रजा का अंत ही हो गया था, तब महर्षि मनु (जिसे कुछ लोगों ने बाबा आदम कहा है, आदम मनु का ही पर्यायवाची है, मनु से मानव शब्द बना है और आदम से आदमी बना है, इस प्रकार मनु आदम का और मानव आदमी का पर्यायवाची है। जबकि बाबा अक्सर महर्षियों व संतों के लिए आज तक भी प्रयोग होता है, इसी मनु को कुछ लोगों ने नूह भी कहा है, कुल मिलाकर जलप्लावन की इस घटना को अपने अपने ढंग से अधिकांश धर्मग्रंथ दोहराते हैं) ने यहीं से नई सृष्टिï का शुभारंभ किया था । मनुवाली घाटी ही आजकल मनाली कही जाती है। यह समुद्र तल से 1950 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। अंग्रेजों के काल में इस क्षेत्र में पर्यटन का शौक बढ़ा। परंतु उस समय यहां पर्यटन के लिए जाना बड़ा कठिन था क्योंकि रास्तों की समस्या बड़ी ही विकट थी। 1980 में यहां के लिए सड़कों की व्यवस्था की गयी। तब से हिमांचल प्रदेश का यह पर्वतीय दुर्गम क्षेत्र देश के अन्य मैदानी भागों से प्रमुखता से जुड़ा।

रोहतांग दर्रा के विषय में :- रोहतांग दर्रा क्षेत्र में तापमान रात्रि में जून में भी शून्य से 2-4 डिग्री नीचे चला जाता है। जिससे बर्फ गिरती है, जबकि दिन का तापमान फरवरी के से महीने का हो जाता है। यहां पर बादल नीचे तथा पर्वत ऊपर दिखायी देने का बड़ा प्यारा दृश्य उपस्थित होता है। हिमांचल के लाहौल स्पीति से यह रोहतांग दर्रा हमें जोड़ता है। सामान्यत: मई से अक्टूबर तक यहां पर्यटकों का जोर रहता है। लेकिन दुख की बात ये है कि यहां नीचे से जाने वाले पर्यटकों के द्वारा जो गाड़ियां या वाहन ले जाये जा रहे हैं, उनसे जो प्रदूषण फैल रहा है वह इस क्षेत्र के लिए घातक सिद्घ हो रहा है। बर्फ की सफेदी को प्रदूषण ने मटमैला करके रख दिया है। उसके मटमैलेपन को देखकर दुख होता है कि कहीं प्रदूषण और पर्वतों के साथ जारी छेड़छाड़ के कारण प्रकृति कहीं यहां भी कभी ‘केदारनाथ’ की सी स्थिति उत्पन्न न कर दे। यहां की सरकार ने बाहरी लोगों के लिए जमीन खरीदकर कारोबार करने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। यह इसलिए किया गया है ताकि यहां के मूल निवासियों के उजड़ने की संभावना न बन पाए। इसका अच्छा प्रभाव भी पड़ा है, लोगों को खुशहाली के दर्शन हुए हैं।

और भी कुछ करने की आवश्यकता है :- हिमांचल प्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देकर यहां के लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए अभी बहुत कुछ किये जाने की संभावना है। यहां की सड़कों का चौड़ीकरण आवश्यक है, साथ ही यात्रियों के ऊपर फंस जाने की स्थिति में उन्हें किसी दूसरे वैकल्पिक मार्ग से निकालने की व्यवस्था पहले ही बनानी आवश्यक है। केदारनाथ की घटना ने काफी कुछ हमें बताया है-हम ही न चेते तो इसमें प्रकृति का क्या दोष है? मनाली से लद्दाख और वहां से कराकोरम मार्ग के आगे तारीम बंसिन में पारकंद और खेतान तक के एक अति प्राचीन व्यापारिक मार्ग का हमें ज्ञान होता है। तनिक कल्पना करें कि प्राचीन काल में जब सड़कें नही थीं तब व्यक्ति को कितनी कठिनाईयों से इस क्षेत्र में व्यापार करना पड़ता होगा?

सप्तर्षि मंडल :- मनाली मनु से जुड़ी होने के कारण सप्तर्षियों का क्षेत्र भी कहा जाता है। जैसे सप्तर्षि मण्डल आसमान में दीखता है वैसे ही प्राचीन काल में किन्हीं सात ऋषियों की तपस्या स्थली होने के कारण धरती के इस स्वर्ग को भी सप्तर्षि मण्डल का नाम दिया गया। प्राचीन काल में इस घाटी में कांगड़ा (कांगरा) घाटी की ओर से लोगों का आगमन हुआ था। यहां सेव के पेड़ों की शुरूआत ब्रिटिश काल में हुई अंग्रेजों ने यहां बड़ी संख्या में सेव के पेड़ लगाये। बताया जाता है कि इन पेड़ों पर इतनी बड़ी संख्या में सेव लगे कि वजन के मारे उनकी डालियां झुक गयी थीं। वैसे छोटे पौधों की स्थिति तो अब भी ये ही थी। छोटे पौधों पर बड़े पौधों की अपेक्षा अधिक सेव लगे हुए थे। मनाली एन.एच. 21 और एन.एच. 1 से दिल्ली से जुडा हुआ है। यह सड़क मार्ग लेह तक जाता है। दिल्ली से मनाली तक हरियाणा के पानीपत, अम्बाला, चण्डीगढ़ (केन्द्र शासित प्रदेश) पंजाब का रोपड़ और हिमाचल का बिलासपुर, सुंदरनगर व मंडी शहर आते हैं। मनाली में हिमाचल पहुंचने वाले कुल सैलानियों का एक चौथाई हिस्सा प्रतिवर्ष पर्यटन के लिए पहुंचता है। यहां पाल राजाओं का नाग्गर किला स्थित रहा है, जो कि आजकल एक होटल में परिवर्तित कर दिया गया है। 1553 में यहंा हिडिम्बा देवी का मंदिर स्थापित किया गया। यह मंदिर पाण्डु पुत्र भीम की पत्नी हिडिम्बा के लिए उनके भक्तों ने बनवाया है। यह पूरी तरह लकड़ी से बनाया गया था। आज भी इसका अधिकांश भाग लकड़ी से ही बना हुआ है। यहां पर हिडिम्बा मंदिर के पास ही संग्रहालय भी स्थित है। जिसमें लकड़ी और मिट्टी के वर्तन तथा रसोई का सामान देखने लायक है। सचमुच आज की जवान होती पीढ़ी के लिए पुराने समय के बर्तन और रसोई का सामान जिज्ञासा और कौतूहल का विषय है।

मेरी खुशफहमियां :- मनाली का मौसम बड़ा ही खुशगवार रहता है। मुझे कई बार अक्टूबर के अंतिम सप्ताह तथा नवंबर के प्रारंभ की सी भ्रांति यहां हो जाता थी कि जैसे हम इन महीनों में जा चुके हों।

रोहतांग था कभी भृगुतुंग :– अब थोड़ा रोहतांग के विषय और भी कुछ जानें। यह दर्रा हिमालय का एक प्रमुख दर्रा है। इस स्थान का पुराना नाम भृगु-तुंग रहा है। भृगुतुंग से बिगड़कर ब्रिटिश काल में रोहतांग हो गया। यह स्थान मनाली से 51 किलोमीटर आगे है। समुद्री तल से यह 4111 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसे लाहौल स्पीति जिलों का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। हर वर्ष यहां हजारों की संख्या में पर्यटक पहुंच रहे हैं, लेकिन प्रदूषण की स्थिति यहां भयंकर होती जा रही है। नवंबर से अप्रैल तक भारी बर्फ बारी रहने के कारण यहां के निवासी शेष देश से और संसार से कट जाते हैं। इससे कई बार तो स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित होती हैं। क्योंकि कई बार तो खराब मौसम के कारण यहां हैलीकॉप्टर तक का पहुंचना भी कठिन हो जाता है। यहां पर्यटन के लिए जून से अक्टूबर तक का मौसम ही उत्तम है। यहीं पर व्यास नदी का उदगम स्थल है। जो कि दो दो चार चार फीट की जलधाराओं से निर्मित होकर यहां से चलती हैं और धीरे धीरे कुछ अन्य झरनों के आ मिलने से एक उफनती फुंकारती विशाल नदी बन जाती है। यह नदी पंजाब को सींचती हुई पाकिस्तान से निकलकर अरब सागर में जा पड़ती है। प्राचीन काल में लाहौल स्पीति को कुल्लू मनाली से जोड़ने के लिए शिवजी ने अपने त्रिशूल से भृगुतुंग पर्वत को काटकर यह मार्ग बनवाया था। यह महाभारत के रचनाकार वेदव्यास जी की तपस्या स्थली भी रही है। वशिष्ठ, मनु, नारद, विश्वामित्र, पाराशर, कण्व, परशुराम और व्यास जैसे कई ऋषियों ने यहां आकर तपस्या की और मोक्ष प्राप्त किया।

हमारा यात्री दल :- हमारे यात्री दल ने इन सभी स्थलों का बड़ी सूक्ष्मता से, मनोविनोद और मौजमस्ती के साथ अध्ययन किया। सभी ने यहां के प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लिया। हमारे यात्री दल में लेखक स्वयं, लेखक की पत्नी श्रीमति ऋचा आर्या, पुत्री श्रुति आर्या, श्वेता आर्या व श्रेया आर्या, पुत्र अमन आर्य व उनके ममेरे भाई विकास सहित श्री रहीसराम भाटी उनकी धर्मपत्नी श्रीमती जयंती भाटी पुत्र अनिल भाटी पुत्री निर्मल भाटी व प्रीति भाटी तथा श्री सुबेक सिंह व उनकी धर्मपत्नी श्रीमती शिमलेश तथा पुत्री हिमाली व आरती थे। यात्री दल पूरा आनंद लेकर 24 जून 2013 की सुबह दिल्ली के महाराणा प्रताप अंतर्राज्यीय बस अड्डे पर समय 7.52 प्रात: पर सकुशल लौट आया। यात्रा में परिजनों में पूज्य अग्रज वी.एस. आर्य जी तथा श्री डी.एस. आर्य जी के व आदरणीय बहन श्रीमती सुमन बंसल जी के तथा अपने मित्र श्रीनिवास एडवोकेट जी ज्येष्ठ भ्राता समय रामकुमार वर्मा सहित कई लोगों के फोन उत्साह वर्धन करते रहे। सारी यात्रा बड़े ही आनंद के साथ पूर्ण हुई। जिसमें ईश्वर की कृपा हर स्थान पर हमारे साथ रही। – राकेश कुमार आर्य

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