अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष : बिना त्याग और तप के योगी बनना असंभव है

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वर्तमान काल में प्रत्येक व्यक्ति योग करना चाहता है।
वास्तव में योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्तमान भाजपा सरकार ने निश्चित कर मान्यता प्रदान करा दी है। इसमें योग को पुनर्जीवित करने में और भारत के लोगों को योग के प्रति जागरूक करने में स्वामी रामदेव जी का भी बहुत बड़ा योगदान है। इसके अलावा राजीव दीक्षित द्वारा भी देश में योग और स्वदेशी का आंदोलन चलाया गया , वह भी काफी महत्वपूर्ण रहा है। इससे बहुत जागृति देश के लोगों में आई है। 21 जून प्रत्येक वर्ष अब अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है। जो भारत के विश्व गुरु होने का प्रथम सोपान है। परंतु हम लोग जिसे योग मानते हैं उसे आप ऐसा मान लें कि केवल पहली या दूसरी कक्षा के स्तर तक का योग है , अर्थात यदि उसको व्यायाम और प्राणायाम का नाम दें तो ज्यादा उपयुक्त होगा । क्योंकि यम ,नियम ,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार धारणा , ध्यान और समाधि – ये योग के आठ अंग हैं । इनमें से यम व नियम पर चलने वाले भी संसार में बहुत कम हैं।
आसन और प्राणायाम को अधिक महत्व दिया जा रहा है ।इससे आगे प्रत्याहार, धारणा ,ध्यान और समाधि के स्तर तक कोई नहीं पहुंच पाता ।इसलिए इसको हम योग नहीं कह सकते । जो इसका करने वाला है उसको योगी नहीं कह सकते। तथापि संतोष अवश्य कर सकते हैं कि उस दिशा में एक प्रयास तो है जो उचित है। वस्तुतः यौगिक क्रियाओं को उस व्यक्ति ने जाना ही नहीं ।केवल उच्चारण ही करता रहता है कि मैं योगी हूं ।मैं योग करता हूं ।परंतु ऐसे व्यक्तियों में अधिकतर सही जानकारी नहीं होती कि योग मार्ग क्या है ? योग में क्या-क्या परिस्थिति मानव के समक्ष आती हैं ? आत्मा के द्वारा क्या-क्या नाना प्रकार के स्थल आते हैं ? जिस मानव ने एक स्थान में विराजमान होकर के गायत्री मंत्र का अच्छी प्रकार पाठ न किया हो उस की साधना न की हो , वह भी कहता है कि मैं योगी हूं। परमात्मा के प्रत्येक ज्ञान और विज्ञान को जानता हूं। वास्तव में यह मानव का केवल अहंकार मात्र है।
गायत्री के अनेक रूप हैं और गायत्री की अनेक प्रकार की साधना करनी पड़ती है। जैसे पुट गायत्री है। छंद गायत्री है ।इस प्रकार नाना गायत्रियों को जानना आवश्यक है। गायत्री नाम गायन का है , जो गाया जाता है। लेकिन वह भी आत्मा के आत्मविभोर होने पर तथा आत्मानुकूल होने पर जो गाया जाता है। उसी का नाम गायत्री माना गया।

गयात्री का गायन करते समय जब आत्मा यह मानने लगे कि मैं उस परमात्मा का बालक हूं और गाते हुए उसकी प्रशंसा करें तब मानो कि अब वह आत्मानुकूल है। ऐसा होने पर ही ईश्वर ऐसे मनुष्य को अपना बालक समझ अपनी गोदी में मां की तरह ले लेते हैं।
जिसने गायत्री के गायन में गंभीरता पैदा नहीं की ,केवल उच्चारण मात्र किया – वह नहीं सुनी जाती , क्योंकि यह भक्ति नहीं है। ईश्वर आपके अंतःकरण में विद्यमान है तो वह आपके अंदर क्या चल रहा है , उसको भी जानता है। आप मन और आत्मा से गा रहे हैं अथवा नहीं , ईश्वर यह भी अच्छी तरीके से पहचानता है। अतः आप ईश्वर को धोखा नहीं दे सकते। वह आपकी त्रुटियों को भी जानता है आपकी अच्छाइयों को भी जानता है । यदि आपने त्रुटियां की हैं तो उनका भोग भोगना अनिवार्य हो जाएगा।
योगी बनने के लिए मानव को गायत्री पर बहुत गंभीरता से सोचना चाहिए ।तभी यौगिक क्रियाओं को धारण कर सकता है। इंद्रियों के कर्मों पर पूर्णतया नियंत्रण रखना। उनकी गलतियों का अनुसंधान कर उनको निकालना आवश्यक होता है।
अब प्रश्न उठता है कि मानव योगी कैसे बन सकता है ?
वास्तव में योग ईश्वर का दिया हुआ एक ऐसा उपहार है , जिसको प्राप्त करके मानव महामानव बन सकता है ।परमात्मा की सृष्टि का ज्ञान प्राप्त कर के उसके दर्शन कर सकता है। योगी अपने शरीर की क्रियाओं को जानकर विचित्र एवं महान बन जाते हैं । शरीर के तीनों रूपों अर्थात स्थूल , सूक्ष्म और कारण को जानने वाले हो जाते हैं । योगी धारणा , ध्यान व समाधि द्वारा मन को इतना शांति में कर लेते हैं कि यह तन्मात्राएं सब मन में लय हो जाती हैं । मन बुद्धि में लय हो जाता है । बुद्धि अंतः करण में लय हो जाती है। ज्ञानेंद्रियां में कर्मेद्रियों के जितने विषय हैं वह सब अंतः करण में लय हो जाते हैं । इन सबका समूह बनाकर यह आत्मा इन सबके ऊपर सवार हो जाता है और जब उसकी इच्छा होती है स्थूल शरीर को त्याग कर सूक्ष्म शरीर द्वारा जहां इच्छा हुई भ्रमण करके आ जाता है । एक योगी की आत्मा दूसरे योगी की आत्मा से संबंध करने जा पहुंचती । परंतु यह कुछ समय के लिए होता है । क्षण दो क्षण के लिए ही ऐसा हो सकता है।
महाभारत काल में कृष्ण जी ने संजय को कोई दिव्य नेत्र प्रदान नहीं किया था । यह वृत्तांत गलत है । इसको आध्यात्मिकता से यदि हम देखें तो जो भी वृत्तांत यंत्रों के द्वारा आता है वह मानव के नेत्रों में भी आ जाता है , लेकिन केवल योगियों के नेत्र में आता है। क्योंकि सूक्ष्म शरीर वाली आत्माओं से आत्मा का सत्संग हो जाता है और उस सत्संग की वाणी योगी के द्वारा मृत मंडल में प्रकट होने लगती है।
योगी बनने के लिए सर्वप्रथम हमको यम (अहिंसा, सत्य ,अपरिग्रह, अस्तेय , ब्रह्मचर्य)और नियम(शौच, तप ,संतोष, स्वाध्याय ,ईश्वर प्राणीधान) के जो 5 – 5 उपांग हैं, को अपने जीवन में धारण करते हुए शेष योग के अंगों को प्राप्त करना होगा।
योगी बनने के लिए सबसे पहले अपने विचारों में अहिंसा, सत्य ,अपरिग्रह , अस्तेय और ब्रह्मचर्य को धारण करना होगा ।तत्पश्चात शौच, तप,संतोष, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणीधान को विचारों में, कार्य में, व्यवहार में लाना होगा ।तभी हम आसन पर शांतिपूर्वक बैठ सकते हैं और जब शांतिपूर्वक बैठ सकते हैं तभी प्राणायाम कर सकते हैं । प्राणायाम करते – करते प्रत्याहार और अन्य योग के स्तरों को क्रमशः प्राप्त करते चले जाएंगे। फलत: हम यह देखते हैं कि योगी बनने के लिए सर्वप्रथम अपने विचारों को यथार्थपरक बनाना होगा। जिसके लिए हमें अपने अंदर ही सुधार करने की आवश्यकता होगी। आत्मावलोकान करना होगा। आत्म परिष्करण, आत्म परिमार्जन करना आवश्यक है। जिसका सीधा सा तात्पर्य है कि अपनी – अपनी त्रुटियों को स्वयं खोज कर जानकर उनको निकालना। दूसरों की त्रुटियों पर नहीं जाना ,क्योंकि जब हम अपनी त्रुटियों को उचित प्रकार से खोज लेंगे तो दूसरे में त्रुटि दिखाई नहीं पड़ेगी। तत्पश्चात धारणा, ध्यान और समाधि में मन लगने लगेगा।यह मन आत्मा व प्राणों सहित जब उच्चता की ओर बढ़ता है तब शरीर के सभी चक्रों में पहुंचता हुआ अनेक प्रकार की उलझनों को तथा बाधाओं को शांत करता हुआ आगे को बढ़ता है । इसी प्रकार आगे बढ़ता _बढ़ता ईश्वर के स्थलों में पहुंच जाता है ।जहां मानव का जीवन महान से महानतम और पवित्र बन जाता है।
इस प्रकार जब हम अपनी त्रुटियों को गंभीरता से आत्मावलोकन और आत्म परिष्करण कर लेंगे तो उस समय हम को यह ज्ञान हो जाएगा कि संसार कौन से विस्तार वाला है ? उस समय योगी होने के अहंकार से दूर हो जाएंगे और वास्तव में योगी होने की प्रक्रिया में तथा रास्ते पर चल पड़ेंगे अर्थात अहंकार को दूर करके हमें निराभिमानी होना होगा। विद्या से परिपूर्ण एवं परिपक्व होना होगा ।अनंत विद्याओं को प्राप्त करना होगा ।ईश्वर की शरण में पहुंचकर ईश्वर को महत्व प्रदान करना होगा । ईश्वर की शरण में हम तभी पहुंच सकते हैं कि जब हम अहंकार को या ‘मैं’ को त्याग देंगे । यदि ऐसा नहीं कर पाएंगे तो कभी भी योगी नहीं बन पाएंगे। फिर संसार के आवागमन में ही पड़े रहेंगे ।नाना योनियों में भोग भोगते रहेंगे। इन सबको यदि पार पाना है तो केवल अभिमान को त्यागना है।
योग के लिए यौगिक क्रिया में जब यह आत्मा प्राणों सहित कुंभक और रेचक क्रियाओं से मूलाधार में पहुंचता है तो वहां प्राणों की ऊंची प्रगति हो जाती है। यहां मानव को अनुभव होने लगता है कि हमारा शरीर किन – किन तत्वों से बना है ? उस स्थल पर क्या-क्या कार्य हो रहा है ? आगे बढ़ता हुआ यह आत्मा नाभि चक्र में पहुंचता है। जिसे शरीर का केंद्र माना है। जहां बहुत सारी नस और नाड़ी विचित्र एवम् महान है। परमात्मा ने इनको कैसे बनाया है ? – यह ज्ञान होगा ।लेकिन इससे भी आगे बढ़ता हुआ आत्मा ऐसे तत्वों को अनुभव कर लेता है जो नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं हो पाते। इसके बाद हृदय चक्र, घ्राण चक्र ,ब्रह्मरंध्र और शून्य चक्रों में आत्मा व प्राण पहुंच जाता है ।उस समय योगी को परमात्मा की शक्ति का अनुभव हो जाता है। ऐसी स्थिति में ही योगी एक स्थान पर बैठे हुए लोक लोकांतर की जानकारी प्राप्त कर लेता है। योगी बनने के लिए त्याग और तप की आवश्यकता है । बिना त्याग और तप के योगी बनना असंभव है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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