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आओ कुछ जाने

*दुदुम्भी से बंब, बंब से नगाड़ा* ।

लेखक आर्य सागर खारी🖋️।

कथित समृद्धि व आधुनिकता के शोर में लुप्त हो रहा है, नगाड़ों का नाद।

रणभेरी ,दुदुम्भी व शंख यह सभी युद्ध वाद्य थे। तीनों का ही महाभारत में उल्लेख मिलता है कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरव पांडव दल की ओर से यह युद्ध में बजाए जाते थे। सैन्य दल में ऊर्जा सजगता, शौर्य वीरता का संचार करने के लिए। रणभेरी व शंख बांसुरी की तरह सुषिर वाद्य है। मुख से हवा फूंक कर बजाए जाते हैं लेकिन दुदुम्भी अवनद्ध वाद है ऐसा वाद्य जो लकड़ी के किसी अर्ध गोलाकार या पूर्ण गोलाकार या बेलनाकार सरंचना पर चमड़े को मढ कर (तानकर) बनाए जाते हैं। यह आघात से बजाए जाते हैं आघात हाथ से भी दिया जा सकता है या लकड़ी की किसी स्टिक से जिसे कही कही ‘ चोब ‘भी कहते है। दुदुम्भी मूल संस्कृत का नाम है जो हिन्दी अपभ्रंश मे बंम हो गया ध्वनि बोधक इसी बंम शब्द से अंग्रेजी का Bomb शब्द भी बना है। नगाड़ा शब्द अरबी के नक्कार शब्द से निकला है जो अरबी की नक् धातु से बना है जिसका अर्थ होता है चमड़े को पीटना।

बंब या नगाड़ा वाद्यन पूरे भारत में होता है कहीं इसका आकार बड़ा तो कहीं छोटा होता है पहाड़ी राज्य हिमाचल, उत्तराखंड में यह छोटे आकार में उपलब्ध है तो मैदानी राज्यों उत्तर प्रदेश हरियाणा मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ के वनवासी आंचल में यह छोटे से लेकर विशाल अनेकों आकार में उपलब्ध है। छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश राजस्थान में अधिकतर परंपरागत समुदाय नगाड़ा का निर्माण दीपावली के पश्चात से ही करने लगते हैं होली के आसपास इसकी खरीदारी होती है ।पहले भारत में फागुन के पूरे महीने में नगाड़ा बजाया जाता था लेकिन देश के अन्य हिस्सों का तो पता नहीं दिल्ली एनसीआर में नगाड़ा वाद्यन की परंपरा लुप्त हो रही है नगाड़ा कोई साधारण वाद्य यंत्र नहीं है इसे बजाने के लिए शारीरिक बल के साथ साथ बौद्धिक लय ताल का भी ज्ञान होना चाहिए। फागुन के महीने में किसान की गेहूं आदि की फसल पकती है फसल के रूप में उसकी मेहनत का फल उसे दिखाई देने लगता है कृषि का कोई विशेष कार्य रहता नहीं है कृषि कार्य से फुर्सत मिल जाती थी तो ऐसे में पूरे महीने ग्रामीणों के द्वारा उत्सव मनाया जाता था। दिल्ली एनसीआर के गांवों में नगाड़ा वाद्यन की परंपरा स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा प्रतियोगिता रही है चाहे गुर्जर बिरादरी हो या जाट या अहीर लगभग अन्य कृषि से जुड़े सभी सम्मानित समाज समुदायों में नगाड़ा वादन की परंपरा रही है। ग्राम स्तर पर मोहल्ले या पट्टियों में नगाड़ा वाद्यन की टीमें होती थी।जिनमे प्रतियोगिता होती थी फिर गांवों के बीच फिर अंतर्जनपदीय प्रतियोगिता भी होती थी। ऐसे बलशाली लोग भी हुए हैं जो अनवरत 24 घंटे नगाड़ा वाद्यन करते थे इसके लिये भुजाओं में कितना बल होना चाहिए यह आप समझ सकते हैं। घंटा जैसा घनवाद्य भी बजाया जाता था।

आज बंब या नगाड़ा बजाना अनौपचारिकता मात्र रह गया है। होली के पर्व की पूर्व संध्या पर या अगले दिन प्रतीकात्मक तौर पर रस्मपुर्ती मात्र कर ली जाती है स्वाभाविकता उत्साह नदारद हो गया है। बंम बजाना महज मनोरंजन का साधन नहीं था यह भारत की लोक कहे या शास्त्रीय संगीत विधा जो ‘सामवेद’ से निकली उसका भी सामुदायिक वंशानुगत संरक्षण था। भारत ने दुनिया को शून्य ,गणना पद्धति ,अनंत का विचार, दर्शन अध्यात्म ही नहीं दिया संगीत की सौगात भी दी।

बंम या नगाड़े के पर्दे को ऊंट या भैंस की चर्म से बनाया जाता था, कुछ एनिमल एक्टिविस्ट कहेंगे यह तो पशुओं पर अत्याचार हुआ तो हम कहना चाहेंगे यह अत्याचार नहीं था मृत पशुओं की ही खाल प्रयोग में लाई जाती थी पहले इंसानों की अपेक्षा पशु बहुतायत में थे और आज तो खाल का विकल्प अन्य मटेरियल ने ले लिया है ।उसे सुरक्षित रखने के लिए परंपरागत आयुर्वेद का ज्ञान को भी प्रयोग में लाया जाता था ।हल्दी ,काला तिल सहित अनेकों मसालों औषधियों का लेप नगाड़े के पर्दे पर किया जाता था क्योंकि चर्म चाहे इंसान की हो या पशुओं फंगस बैक्टीरिया के लिए वह एक उत्तम भोजन है।

आर्य सागर खारी✍।

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