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शंका-समाधान

ईश्वर, सृष्टि व प्रकृति को लेकर कुछ शंका-समाधान

  • आचार्य अग्निव्रत

शंका— ईश्वर कैसे उत्पन्न हुआ?
समाधान— संसार में कुछ पदार्थ ऐसे भी होते हैं, जो कभी उत्पन्न नहीं होते, वे दूसरों को उत्पन्न करते हैं। ईश्वर कभी उत्पन्न नहीं होता। प्रकृति पदार्थ, जिससे यह सृष्टि बनी है, वह भी कभी उत्पन्न नहीं होता और हम जीवात्मा भी कभी उत्पन्न नहीं होते, शरीर उत्पन्न होता है। कौनसा उत्पन्न होता है और कौनसा नहीं, इस बारे में हम कई बार बता चुके हैं। जो पदार्थ किन्हीं अवयवों से मिलकर न बना हो, वह अनादि हो सकता है और जो पदार्थ किसी से मिलकर बना हो, वह अनादि नहीं हो सकता। सृष्टि सूक्ष्म अवयवों से मिलकर बनी है, इसलिए कभी न कभी बनी है। न ईश्वर सूक्ष्म अवयवों से मिलकर बना है, न मूल पदार्थ सूक्ष्म अवयवों का संयुक्त रूप है और न ही जीवात्मा। इसलिए ईश्वर उत्पन्न नहीं होता।

शंका— सृष्टि के आरम्भ में क्या हम स्वतन्त्र या मुक्त थे?
समाधान— हम मुक्त नहीं थे। हम ऐसे थे, जैसे कि एक पागल व्यक्ति कहीं भी पड़ा रहता है, उसको ज्ञान नहीं होता, उसे कोई चिन्ता नहीं होती, लेकिन वह सुखी नहीं है। इसको सुखी नहीं कहा जा सकता। मुक्ति अवस्था उसे कहा जाता है, जो ज्ञान की अवस्था है और जो किसी कर्म-फल के बन्धन में नहीं है। इसलिए ईश्वर ने मनुष्य की मुक्ति के लिए सृष्टि बनाई।

शंका— ईश्वर ने मनुष्यों को क्यों बनाया? मानव उत्पत्ति का कारण क्या है?
समाधान— मैं मानव उत्पत्ति की बात नहीं कर रहा। यदि मैं प्राणिमात्र की उत्पत्ति की बात करूँ, तो इसमें ईश्वर का अपना कोई प्रयोजन नहीं है। सत्यार्थ प्रकाश में ऋषि दयानन्द के सामने भी यही प्रश्न आया है कि ईश्वर ने दुनिया क्यों बनाई? नहीं बनाता, तो ठीक रहता। ऋषिवर ने कहा कि आँख क्यों देखती है, क्योंकि देखना आँख का स्वभाव है। कान सुनते हैं, क्योंकि सुनना कान का स्वभाव है। अगर आँख, कान का मन व आत्मा से सम्बन्ध है, तो अवश्य देखेंगे व सुनेंगे।

अब यह प्रश्न उठता है कि आँख क्यों देख रही है? अगर मन दूसरी जगह है, तो आँखें भी नहीं देख पायेंगी। मन पढ़ने में लगा है, तो कोई भी व्यक्ति हमारे पास आ जाए, पता नहीं लगेगा, उसके पैरों की आवाज हम नहीं सुन पायेंगे। लेकिन मन के साथ उनका जुड़ाव है, तो आँखें अवश्य देखेंगी, कान अवश्य सुनेंगे। इसी प्रकार परमात्मा का स्वभाव है— सृष्टि बनाना और जीवों की भलाई करना। अगर कोई कहे कि सृष्टि नहीं बनाता, फिर भी जीव तो मुक्त ही थे। उसे मुक्ति नहीं कहते है उसे अज्ञानावस्था कहते हैं। इसलिए जीवों के भोग और मोक्ष दोनों के लिए सृष्टि बनायी। जीव शरीर धारण करके संसार का उपभोग करे और उपभोग करके शरीर के द्वारा साधना करके मोक्ष को प्राप्त होवे, इसलिए ही सृष्टि बनायी।

शंका— चार ऋषियों ने वेदों का ज्ञान प्राप्त किया और वे चार ही सबसे बुद्धिमान् हुए। उन्होंने पिछले अर्थात् इस सृष्टि की रचना से पूर्व जो सृष्टि हुई थी, उस समय के कर्मों के आधार पर ज्ञान प्राप्त किया, लेकिन उनसे पूर्व जो सर्वप्रथम सृष्टि रचना हुई, उस समय किसने ज्ञान प्राप्त किया?
समाधान— सर्वप्रथम कोई सृष्टि रचना नहीं है। सृष्टि रचना और प्रलय का क्रम अनादि व अनन्त है, इसलिए जिस प्रकार दिन पहले या रात, इसका कोई उत्तर नहीं होता, उसी प्रकार कोई भी सृष्टि पहली सृष्टि नहीं कही जा सकती और कोई भी प्रलय अन्तिम प्रलय नहीं कही जा सकती। यह अनादि है, सत्य है।

शंका— धरती से मनुष्य के उत्पन्न होने के कितने समय पश्चात् वेद-विद्या आयी?
समाधान— मनुष्य युवावस्था में इस भूमि से निकला। उस समय बिना वेद ज्ञान के भी उसके ज्ञान का स्तर बहुत ऊँचा था, क्योंकि पहली पीढ़ी में वही मनुष्य उत्पन्न होते हैं, जो मुक्ति से आते हैं। इसलिए उनके ज्ञान और चरित्र का स्तर बहुत उच्च था और पहली पीढ़ी में ही अग्नि, वायु, आदित्य व अङ्गिरा ये चारों ऋषि भी थे, उनका ज्ञान तो सर्वोच्च था। उन्होंने वेद मन्त्रों की रश्मियों को पहली पीढ़ी में ही ग्रहण किया। वेद का सम्पूर्ण ज्ञान मात्र उस पहली पीढ़ी के लिए ही नहीं था, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि में आने वाली आगामी पीढ़ियों के लिए भी था। वेद का ज्ञान सनातन व सार्वभौमिक है और सदैव प्रासंगिक है। इस प्रकार वेद का ज्ञान उसी समय आया, जब पहली पीढ़ी उत्पन्न हुई।

शंका— आप कहते हैं कि सृष्टि के प्रारम्भ में चार ऋषियों ने वेेद मन्त्रों को ग्रहण किया, उनके बाद यह परम्परा समाप्त हो गई, सिर्फ थोड़े बहुत ऋषियों ने ही ऐसा किया। तो भगवान् श्रीराम, भगवान् श्रीकृष्ण, देवर्षि नारद, महर्षि वेदव्यास, महर्षि परशुराम, महर्षि याज्ञवल्क्य जैसे योगी वैज्ञानिक, यह जानने के बाद बावजूद भी कि वेदमन्त्र फ्रिक्वेन्सी व वाइब्रेशन के रूप में हर जगह हैं और उन्हें ध्वनि रूप में ग्रहण किया जा सकता है, मन्त्रों को ग्रहण नहीं कर पाए, तो इसका कारण क्या रहा होगा?
समाधान— पहली बात तो यह है कि अग्नि, वायु, आदित्य व अङ्गिरा ने बहुत कुछ ग्रहण कर लिया था, इसके बाद कुछ ग्रहण करने की आवश्यकता ही नहीं थी, गुरु-शिष्य परम्परा चल पड़ी थी। आगे जिन-जिन ऋषियों ने मन्त्रों को ग्रहण किया है, उन्होंने ब्राह्मण ग्रन्थों व श्रौत सूत्रों में उन मन्त्रों को दिया है। अब इन्होंने ग्रहण किया या नहीं किया इसके विषय में कुछ कह नहीं सकते, क्योंकि वर्तमान में भगवान् श्रीराम व श्रीकृष्ण का लिखा हुआ कोई ग्रन्थ नहीं मिलता। भगवान् श्रीकृष्ण की साम्बपञ्चिका, जिसे पण्डित भगवद्दत्त ने उद्धृत किया है, वह मिलती है। देवर्षि नारद का कोई ग्रन्थ नहीं मिलता है। नारद संहिता नाम का एक ग्रन्थ है, लेकिन उसमें क्या-क्या है, मैंने वह नहीं देखा। याज्ञवल्क्य ऋषि ने शतपथ ब्राह्मण लिखा था, उसमें भी कुछ ऐसे मन्त्र हो सकते हैं, जो उन्होंने ग्रहण किये। यह आवश्यक नहीं सभी ग्रहण करें।

शंका— जब महर्षि पतञ्जलि ने योगदर्शन को वेद से सीखा, तो पहले अग्नि, वायु, आदित्य व अङ्गिरा ऋषि को समाधि अवस्था में योग का कैसे पता चला?
समाधान— ऐसा नहीं है कि योगदर्शन से पहले कोई योग नहीं जानता था। योग विद्या तो वेद में पहले से ही है। वेद से ही पतञ्जलि ने सीखी और दूसरों ने भी सीखी।

शंका— पुनर्जन्म पर कुछ बताएँ। कर्मों का फल मिलता है अथवा नहीं?
समाधान— जो भी वैज्ञानिक बुद्धि वाले हैं और कारण-कार्य के नियम को जानते हैं कि कारण-कार्य का नियम अटल है, जड़ संसार में और चेतन संसार में भी। जड़ संसार में कारण-कार्य का नियम भौतिकी के लोग मानते हैं और चेतन संसार में यही नियम कर्म-फल के सिद्धान्त के रूप में हमें दिखाई देता है। कर्मों का फल अवश्य मिलता है।

शंका— अलग-अलग पदार्थों में रश्मियों की बहुलता वा न्यूनता कैसे होती है?
समाधान— बहुलता वा न्यूनता प्रयोजन के अनुसार होती है। अगर मैं पूछूँ कि गेहूँ या चावल में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अलग क्यों होती है? तो इसका कोई उत्तर नहीं है। इनकी रचना करने वाले का विशेष प्रयोजन होता है, इसलिए होती है। सारी रचना ईश्वर ने प्रयोजन के अनुसार ही की है और उसी के सानिध्य में यह सारा काम ‘ओम्’ रश्मियों के द्वारा हो रहा है। विज्ञानपूर्वक जिसमें बहुलता की आवश्यकता होती है, उसमें बहुलता होती है और जिसमें न्यूनता की आवश्यकता होती है, तो उसमें न्यूनता होती है। इसको व्याख्यात नहीं किया जा सकता।

शंका— कौनसी रश्मियाँ एक-दूसरे को आकर्षित करती हैं? कौनसी रश्मियाँ एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करती हैं? और ये रश्मियाँ पृथ्वी में किस-किस पदार्थ में कितनी-कितनी मात्रा में होंगी, इस पर प्रकाश डालिए।
समाधान— कौनसी रश्मियाँ आकर्षित करती हैं और कौनसी रश्मियाँ प्रतिकर्षित करती है, इसका कोई निश्चित नियम नहीं है, क्योंकि यह सापेक्ष होता है। इसका एक नियम यह अवश्य है कि इस सृष्टि की कुछ रश्मियाँ पुरुषरूप व्यवहार करती हैं और कुछ रश्मियाँ स्त्रीरूप व्यवहार करती हैं। इन दोनों प्रकार की रश्मियों में आकर्षण होता है और समान प्रकार की रश्मियों में प्रतिकर्षण होता है, यह एक नियम है।

किस पदार्थ में कितनी रश्मियाँ हैं, यह जानना असम्भव-सा कार्य है, लेकिन इतना है कि किसी फोटोन में लगभग 360 प्रकार की रश्मियाँ होती हैं और जिनको आज मूलकण कहा जाता है, जैसे क्वार्क आदि इनमें 360 से 480 के बीच में। किसी भी मोलिक्यूल में लगभग 720 ऐसी रश्मियाँ हैं। यह एक सामान्य मात्रा है, इससे कुछ कम या अधिक भी हो सकती हैं। रश्मियाँ कितने प्रकार की हैं और किसी पदार्थ में कितनी हैं, यह जानना मनुष्य के लिए असम्भव है। हाँ, कोई योगी, जो उच्च कोटि के ऋषि स्तर के हों, वे किसी पदार्थ विशेष के बारे में जान सकते हैं। वैसे योगी नहीं, जैसे आजकल भाषण देकर आँख बन्द करके योगी बन जाते हैं।

शंका— शब्द आकाश का गुण है, पर आप कहते हैं कि शब्द पदार्थ है।
समाधान— वैशेषिक दर्शन पढ़कर देखें। क्रिया, गुण और द्रव्य तीनों को ही पदार्थ कहा जाता है और हम जहाँ शब्द को पदार्थ कहते हैं, वास्तव में वह हलचल करता हुआ मनस्तत्त्व होता है, वही रश्मि होता है और उसका गुण शब्द है। आकाश स्वयं रश्मियों से मिलकर बना है। जैसे प्रकाश अग्नि का गुण है और अग्नि एक पदार्थ है, वैसे ही शब्द उन तरंगों का गुण है, जो आकाश में कम्पित हो रही हैं, जो मनस्तत्त्व में हैं। शब्द मध्यमा ध्वनि का ही आधार है। वैखरी और मध्यमा आकाश का गुण है। परा और पश्यन्ती आकाश का गुण नहीं है।

शंका— ब्रह्माण्ड का अन्त कब होगा? क्या ईश्वर ब्रह्माण्ड की रचना करते हैं?
समाधान— हाँ, जिस प्रक्रिया से यह सृष्टि बनी है या बनती है, उसी का उल्टा रूप या उन्हीं रिवर्स स्टेप्स् के द्वारा इसका प्रलय भी होता है। जैसे कोई मकान एक-एक ईंट चिन कर बनता है और एक-एक ईंट निकालकर वह मकान बिखर भी जाएगा, वैसा ही होता है। सृष्टि, फिर प्रलय, फिर सृष्टि और फिर प्रलय, यह चक्र अनादि व अनन्त है। हाँ, ईश्वर ही इस सृष्टि का रचयिता, संचालक व प्रलयकर्त्ता है।

शंका— ईश्वर की प्रार्थना न करें, तो क्या होगा? क्या उससे ईश्वर नाराज होगा?
समाधान— ईश्वर न तो प्रार्थना करने से खुश होता और न ही ईश्वर प्रार्थना नहीं करने से नाराज होता, क्योंकि वह ऐसा नहीं है। हम ईश्वर की प्रार्थना नहीं करेंगे, तो धीरे-धीरे उसे भूल जायेंगे और भूल जायेंगे, तो उच्छृंखल बन जायेंगे। उच्छृंखल बन गये, तो गलत काम भी करेंगे और गलत काम करेंगे, तो दु:ख पायेंगे और फिर अलगे जन्म में उनका फल भोगना पड़ेगा। ईश्वर की उपासना न करने वाला अगर अच्छे काम करता है और ईश्वर की उपासना करने वाला बुरे काम करता है, तो ईश्वर की उपासना न करने वाला अधिक अच्छा है। उसको अच्छा फल मिलेगा। उपासना का कोई परिणाम होना चाहिए, तभी उपासना काम की है, अन्यथा नहीं।

शंका— क्या वेद मे इतिहास भी है?
समाधान— वेदों में कोई भी मानवीय इतिहास नहीं है। वेदों में कहीं परीक्षित, अर्जुन, कृष्ण आदि शब्द आ गये, इसका अर्थ यह नहीं है कि वेदों में इतिहास हो गया। वेद में से शब्दों को लेकर लोगों ने अपने नाम रखे, क्योंकि उन्होंने भाषा भी वेद से सीखी और ज्ञान भी वेद से सीखा। इसलिए वेदों से हमारे पूर्वजों ने नाम ग्रहण किये, इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वेद में हमारे पूर्वजों का इतिहास है। वेद में किसी ऐतिहासिक व्यक्ति का नाम नहीं, किसी देश का नाम नहीं, किसी नदी का नाम नहीं, बल्कि इनके नाम हमने वेदों से रखे।

शंका— हमें किस प्रकाशन वा लेखक का वेद अध्ययन करना चाहिए?
समाधान— यह मेरे सामने भी बहुत बड़ी चुनौती है। अगर कुछ पढ़ सको, तो महर्षि दयानन्द का वेदभाष्य पढ़ो। दूसरे भाष्यों में कई जगह भ्रम हैं, उनमें अच्छाइयाँ कुछ एक मिलेंगी, बुराइयाँ अनेक मिलेंगी। मैं विवश हूँ, मुझे अवसर मिला, तो मैं स्वयं करने का प्रयास करूँगा। यदि आप मेरी मानें, तो अभी वेदभाष्य मत पढ़िए, बल्कि पहले महर्षि दयानन्द की ऋग्वेदादि-भाष्य-भूमिका और सत्यार्थ प्रकाश पढ़िए।

शंका— क्या वेद में दलितों व स्त्री के प्रति घृणा है?
समाधान— वेद मानवमात्र के लिए हैं। जो कहते हैं कि वेद किसी के भी प्रति घृणा उत्पन्न करते हैं, वे वेद को नहीं समझते। महिलाओं की पूजा इस देश में ही होती है। किसी भी देश में महिला के नाम के पीछे देवी नहीं लगता है, यह केवल भारत में हिन्दुओं में ही लगता है। जो हमें स्त्री के अधिकार का पाठ पढ़ाते हैं, वे पहले अपनी सभ्यता को देखें। वे तो नारी में आत्मा ही नहीं मानते थे। उनके यहाँ महिलाओं को वोट देने के अधिकार भी नहीं थे। भारत में पहले राजा के सिंहासन के पास ही रानी का सिंहासन होता था। युद्ध में महिलाएँ साथ में जाया करती थीं, साथ पढ़ा करती थीं और शोध किया करती थीं।

ऐसा बताने वाले उपदेशक कहाँ से आ गए? वेद में तो कोई दलित शब्द है ही नहीं। शूद्र श्रमिक को कहा गया है। श्रमिक हो चाहे पूँजीपति, विद्वान् हो या राजा, वेद में सबको समान अधिकार है। अगर कोई श्रमिक इतना बुद्धिमान् है कि वेद पढ़ सकता है, तो उसे अवश्य पढ़ना चाहिए। वेद स्वयं कहता है— ‘यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य:’, इस मन्त्र में कहा है— शूद्र अति शूद्र अर्थात् श्रमिक और उससे भी नीचे सबके लिए वेद का उपदेश करो। जब वेद स्वयं कहता है कि सबको पढ़ना चाहिए, तो यह कहने वाला दूसरा अधिकारी कौन होता है कि किसको पढ़ना चाहिए और किसको नहीं।

शंका— वेदों में सब घुमा-घुमा कर बताया गया है। इसलिए समझना मुश्किल होता है।
समाधान— वास्तव में सब वेदभाष्य ऐसे हैं कि वे स्पष्ट नहीं हैं, संक्षेप में हैं और ऋषि दयानन्द का भाष्य भी बहुत संक्षेप में है, इसलिए मुश्किल तो होगा। वेद इतना सरल भी नहीं है कि कोई भी समझ ले। उसके लिए बहुत तैयारी करनी पड़ती है, बहुत पढ़ना पड़ता है, इसके साथ ईश्वरप्रदत्त प्रज्ञा, साधना व प्रभुकृपा भी अनिवार्य है।

शंका— जब ईश्वर की प्रार्थना आदि अच्छे कर्म करता हूँ, तो लोग कहते हैं कि यह सब पागलपन क्यों करते हो? मुझे मेरे मार्ग में खड़े दुर्व्यसनों को छोड़े एक वर्ष हो गया है, लेकिन अब मैं धर्मपथ पर आगे बढ़ना चाहता हूँ। ऐसी स्थिति में क्या करूँ?
समाधान— आज समय ऐसा है कि जो व्यक्ति अच्छे मार्ग पर चलेगा, उसे लोग पागल ही कहेंगे, क्योंकि पागलखाने में जो पागल लोग रहते हैं, वे अच्छे लोगों को पागल ही समझते हैं। एक सेठ पागलखाने को देखने गए कि वहाँ कैसी व्यवस्था है? लेकिन वहाँ कुछ पागल बैठे थे, वे सेठ को देखकर जोर-जोर से बोलने लगे, देखो, एक और पागल आ गया। हमारे साथ भी वैसी ही स्थिति है और संसार की भी। किसी की चिन्ता न करते हुए आगे बढ़ते रहिए। कभी समय आएगा कि जो आज पागल कहते हैं, वे तुम्हारे पीछे आयेंगे।

शंका— मुस्लिम कुरान को मानते हैं, वेद को नहीं। हिन्दू वेद को मानते हैं, कुरान को नहीं। ईसाई बाइबिल को मानते हैं, वेद व कुरान को नहीं। तो किस ग्रन्थ पर विश्वास किया जाए? अगर मैं हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध व जैन नहीं हूँ।
समाधान— सबके ग्रन्थ पढ़ लो। मैंने ‘ईश्वर का प्रथम उपदेश यही क्यों?’ में एक वेद मन्त्र का भाष्य किया है। कुरान की पहली आयत पढ़ लेना, बाइबिल की भी पढ़ लेना, ऐसे ही अन्य ग्रन्थों की भी पढ़ लेना, फिर अपने आत्मा व बुद्धि से विचार करना कि कौनसा ग्रन्थ सही है। मैं कहूँगा कि वेद सही है, तो लोग कहेंगे कि अपना-अपना ग्रन्थ तो सब सही ही बताते हैं, इसलिए सबकी दो-दो लाइन पढ़के पता चल जाएगा। इस पुस्तक में मैंने एक मन्त्र की ही व्याख्या की है। मैं सारे मन्त्रों की व्याख्या करके भी बता सकता था, लेकिन एक मन्त्र से ही मालूम पड़ जाएगा। जब खिचड़ी बनाते हैं, तो सारे चावल नहीं देखते हैं, केवल एक चावल देखकर पता करते हैं कि चावल पके हैं या नहीं?

शंका— वेदों में यदि विज्ञान होता, तो मनुष्य को चाँद पर जाने में इतने साल क्यों लग गए? अब तक तो ब्रह्माण्ड के सभी ग्रहों पर मनुष्य को पहुँच जाना चाहिए था।
समाधान— इसको कहते हैं— अनावश्यक अपने ही पूर्वजों की आलोचना करना अर्थात अपने पूर्वजों के प्रति कृतघ्रता व दूसरों की दासता की पागलपन तक पहुँच चुकी पराकाष्ठा। जो मेरे पूर्वज है, वे आपके भी हैं और जो आपके पूर्वज हैं, वे मेरे भी हैं। कुछ लोग अपने ही पूर्वजों को मूर्ख मानने में अपनी बुद्धिमानी अनुभव करते हैं। अपने ही पूर्वजों को पिछड़ा मानने में अपनी प्रगतिशीलता अनुभव करते हैं। आपने यह कैसे जान लिया कि चाँद पर पहले कोई नहीं जाता था? इतिहास सुरक्षित नहीं रहा, तो क्या हुआ। अमेरिका के वैज्ञानिक की एन्टी ग्रेविटी पुस्तक है, उसने पूरा खुलासा किया है कि भारत में किस प्रकार की विमान विद्या थी, कहाँ-कहाँ किस प्रकार से लोग जाया करते थे और कैसे-कैसे विमान थे। लेकिन आप लोग दुनिया को ढोल बजाकर बताते रहिये कि हमारे पूर्वज मूर्ख थे, क्योंकि आपने यही पढ़ा है कि हम मूर्खों और बन्दरों की सन्तान हैं। जो सभ्यता अपने को पशुओं की सन्तान मानती है, वह अपने पूर्वजों को बुद्धिमान् कैसे मान लेगी?

शंका— मैं प्रतिदिन टी.वी. पर देखता हूँ, सब इतिहास की बात करते हैं, लेकिन आर्य समाज के किसी भी व्यक्ति की कोई बात नहीं होती, जबकि आर्यसमाज में बहुत से क्रान्तिकारी हुए।
समाधान— यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि हमारी सत्ता ऐसे लोगों के हाथ में चली गई, जो मात्र शरीर से ही भारतीय थे और शिक्षा पद्धति भी उन्हीं की आ गई। दुर्भाग्य से आज भी आर्य समाज और ऋषि दयानन्द को याद करने वाला कोई नहीं है। जो अपने को राष्ट्रवादी कहते हैं, उन्हें यह भी पता नहीं है कि राष्ट्रवाद की यथार्थ परिभाषा क्या है? वे यह भी जानने का प्रयास नहीं करते कि राष्ट्र को स्वतन्त्र किसने कराया? यह दुर्भाग्य की बात है और यह आर्यसमाज की ही कमी है। वे भी ऋषि दयानन्द के आदर्शों पर कहाँ चल पाए। वे स्वयं ही नहीं चलेंगे, तो उनको सम्मान कौन देगा? ये वर्तमान राष्ट्रवादी लोग इस राष्ट्र के प्राचीन इतिहास, विज्ञान व संस्कृति से सर्वथा अनभिज्ञ हैं, परन्तु मात्र मध्यकालीन भारत की परम्परा के स्वल्प ज्ञान के बल पर स्वयं को भारत का निर्माता समझने लगे हैं। ऐसे लोगों से भारत के दूरगामी विनाश की पूरी आशंका है। ईश्वर इन्हें सद्बुद्धि दे।

—आचार्य अग्निव्रत
(ईश्वर का प्रथम उपदेश यही क्यों? पुस्तक से उद्धृत)

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