इदन्न मम्-यह मेरा नहीं है

जिस प्रकार किसी महान शासक के राज प्रासादों के ध्वंशावशेषों को देखकर कोई भी जिज्ञासु और अन्वेषणशील प्रवृत्ति का इतिहासकार उस शासक के उक्त राजप्रासादों की भव्यता और शोभा का अनुमान लगा सकने में सक्षम होता है उसी प्रकार किसी महान संस्कृति के पतन होने पर उसके साहित्य में, अथवा लोक प्रचलित भाषा में प्रयुक्त शब्द उसकी भव्यता का अनुमान कराने में सहायक होते हैं। यदि लोक भाषा में अथवा उक्त संस्कृति के साहित्य में बार बार कोई शब्द अथवा शब्द समूह प्रयुक्त हो रहा है अथवा होता हुआ मिलता है तो इसका सीधा सा अर्थ यही है कि वह शब्द अथवा शब्द समूह उक्त विलुप्त अथवा पतनोन्मुख संस्कृति का कभी अवश्यमेव मूलाधार रहा होगा। भारतीय संस्कृति में और उसके साहित्य में ऐसे शब्दों अथवा शब्द समूहों की भरमार है जैसे कृण्वंतो विश्वमाय्र्यम्, वसुधैव कुटुम्बकम् आदि शब्दों अथवा शब्द समूहों की इसी परंपरा में हमको अपने संस्कृत साहित्य में वैदिक वांग्मय में जिस समता मूलक समाज की संरचना के मूलाधार शब्द समूह के दर्शन होते हैं, वह शब्द समूह है इदन्न मम। अर्थात, यह मेरा नहीं है। कितनी सुंदर और अनुकरणीय सामाजिक व्यवस्था है कि जो भी मेरे पास है वह मेरा नहीं है, किसी का दिया हुआ है। इसलिए उस पर मेरा कोई अधिकार नहीं है और जो मिला है वह केवल मेरे अकेले के प्रयासों का प्रतिफल नहीं है, अपितु उसमें अन्यों का भी सहयोग प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रूप में रहा है। इसलिए उसके उपभोग का एकाधिकार भी मेरा नहीं है, अपितु सांझा उपभोगाधिकार है। मेरे थोड़े से प्रयासों से बहुत कुछ मिला है। प्रयास थोड़ा और फल अधिक ऐसा किसी की कृपा का प्रतिफल है, इसलिए उस कृपाल दयालु के चरणों में अपना सर्वस्व सादर समर्पित करते हुए भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का आस्थावान साधक कह उठता है- इदन्न मम। हर किसान अपने खेत में बहुत थोड़ा अन्न बतौर बीज के डालता है किंतु प्राप्त करता है ढेरों मन अनाज। माली अपने बाग में पेड़ पौधों की निराई, गुड़ाई, भराई आदि पर अल्पमूल्य व्यय करता है, किंतु प्राप्ति अत्यधिक मात्रा में करता है। एक अदृश्य शक्ति की अदृश्य सत्ता की अनुभूति हमें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इस प्रकार कदम कदम पर होती है। हमारी हर अभिलाषा की पूर्ति और समस्या का समाधान हमारे थोड़े से प्रयासों से हमारे समक्ष उपस्थित आ होता है यह सब किसी असीम दया के सागर कृपा सिंधु का ही खेल नहीं तो और क्या है?
हमारे जीवन में सांसों का सिलसिला कितना महत्वपूर्ण है, इसका अनुमान किसी ऐसे व्यक्ति को देखकर लगाया जा सकता है जो मरणासन्न हो और एक एक सांस को खींचकर लेने का प्रयास करते हुए अपना अंतिम संदेश दुनिया में अपनों के लिए देने का प्रयास कर रहा हो। हर व्यक्ति सांसों के खेल को अति सामान्य सी घटना समझ कर जारी रहने देता है। जबकि स‘चाई यही है कि हमें हर क्षण, हर पल और हर सांस के साथ नया जीवन मिलता है। इसलिए भारतीय मनीषियों ने आदिम काल से ही सांस तक के विषय में भी यही कहा – इदन्न मम। इस श्वांस को भी उन्होंने किसी अदृश्य सत्ता की ही देन स्वीकार किया और उसी को समर्पित कर दिया। यह शस्य श्यामला सुंदर वसुंधरा अपने पुनीत पयोधर से अनंत काल से मनुष्य को उसके सभी अभिलक्षित पदार्थों की पूर्ति करती आ रही है। गर्वोन्मत्त मनुष्य इस भूमि को अपने कृषक उपयोग अथवा राज्य क्षेत्र के आधार पर बांटकर अपना अपना राग अलापने लगता है, किंतु अगले ही क्षण वह जैसे ही काल के गाल में समाहित होता है तो उसका अपना किसी और का होकर यहीं रह जाता है, किंतु योगी जन पहले ही इस वास्तविकता को जानकर कह देते हैं इदन्नमम। यह भूमि का विशाल खंड और यह महल चौबारे कुछ भी तो मेरा नहीं है।
संसार की असारता और शरीर की नश्वरता में बंधा जीव संसार में शुभ कर्मों के लिए आता है। यहां प्रेम की सृष्टिï करना मानो उसका परम लक्ष्य हो। इसके लिए कुछ तो उसे माता पिता, बंधु-बाधव आदि के रूप में जन्मना अपने मिलते हैं और कुछों को मित्रों संबंधियों के रूप में वह अपना बनाता है। इस प्रकार इन अपनों का दायरा उसके लिए अपनी एक दुनिया का रूप ले लेताा है। किंतु अगले ही क्षण हम देखते हैं कि इन अपनों को अपना सब कुछ मानने वाला व्यक्ति इन्हीं के साथ छल कपट ईष्र्या द्वेष घृणा और नफरत की बातें करने में मशगूल हो जाता है। कहीं वह स्वयं ऐसा करता है तो कहीं ऐसी बातों का स्वयं शिकार होता है अर्थात उसके अपने उसके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं। संसार का साधारण मनुष्य अपना सर्वस्व लुटाकर दुनिया से ऊबता है और निराशा के भाव से कहता है कि यहां कोई भी व्यक्ति किसी का नहीं है।

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