भारत के राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति और उसका निर्वाचन

ब्रिटेन की भांति भारत में भी संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है। जिसमें राष्टï्राध्यक्ष राष्टï्रपति कार्यपालिका का संवैधानिक प्रधान होता है। वास्तविक शक्तियों का प्रयोग प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल के माध्यम से करता है। संवैधानिक व्यवस्था-संविधान के अनु‘छे 52 के अनुसार राष्टï्रपति भारतीय संघ की कार्यपालिका का प्रधान है। संविधान के अनु‘छे 5& के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्टï्रपति में निहित होगी, वह उसका प्रयोग संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ कर्मचारियों द्वारा करेगा। संविधान सभा में संविधान का प्रारूप प्रस्तुत करते हुए डा अंबेडकर ने कहा था कि भारतीय संविधान में राष्टï्रपति को वही स्थिति प्राप्त है जो ब्रिटिश संविधान में सम्राट को। वह राज्य का प्रधान है, कार्यपालिका का नहंी। वह राष्टï्र का प्रतिनिधित्व करता है, राष्टï्र पर शासन नहीं। वह सामान्यतया मंत्रियों के परामर्श को मानने के लिए बाध्य होगा।
राष्टï्रपति पद की योग्यताएं।
कवह भारत का नागरिक हो
कवह &5 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
कलोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
ककिसी सरकारी लाभ (नौकरी) के पद पर न हो। यदि राष्टï्रपति पद का कोई उम्मीदवार राष्टï्रपति, उपराष्टï्रपति, राज्यपाल, केन्द्रीय मंत्री अथवा राज्यमंत्री पर आसीन है तो इसे सरकारी लाभ का पद नहीं माना जाएगा।
कार्यकाल
कसंविधान के अनुसार राष्टï्रपति की पदावधि 5 वर्ष है।
कराष्टï्रपति 5 वर्ष से पूर्व त्यागपत्र देकर पदमुक्त हो सकता है।
वेतन तथा भत्ते राष्टï्रपति को भव्य सरकारी निवास के साथ साथ 50 हजार रूपया प्रतिमाह वेतन तथा भत्ता मिलता है। यह संसद के द्वारा समय समय पर निश्चित किया जाता है।
कार्यकाल के दौरान राष्टï्रपति के वेतन व भत्ते में कमी नहीं की जा सकती।
अवकाश ग्रहण करने पर राष्टï्रपति को 25 हजार रूपये मासिक पेंशन दी जाती है। महाभियोग-संविधान के अनु‘छेद 61 के अनुसार यदि राष्टï्रपति संविधान का उल्लंघन करता है तो उसे महाभियोग द्वारा उसके पद से हटाया जा सकता है। महाभियोग संसद के किसी भी सदन में चलाया जा सकता है।
अभियोग लगाने वाले सदन की समस्त सदस्य संख्या के एक चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर होने आवश्यक हैं। अभियोग लगाने के 14 दिनों बाद अभियोग लगाने वाले सदने में उस पर विचार किया जाएगा। संकल्प प्रस्तावित करने के पूर्व सदन में 14 दिन की स्पष्टï लिखित सूचना देना अनिवार्य है तथा उस सदन की समस्त सदस्य संख्या के दो तिहाई सदस्यों द्वारा ऐसा प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है। जब एक सदन द्वारा अभियोग लगाया जाता है तो दूसरे सदन द्वारा उसकी जांच की जाती है। जांच पड़ताल के बाद यदि दूसरा सदन भी समस्त सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत से यह पारित कर दे कि राष्टï्रपति पर लगाया गया दोष सत्य है तो ऐसी अवस्था में राष्टï्रपति को उसी समय पद त्याग करना होगा।
राष्टï्रपति के विरूद्घ कार्यवाही दो माह का नोटिस देकर ही की जा सकती है।
उन्मुक्तियां – राष्टï्रपति पर कोई दीवानी अथवा फौजदारी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। अपने पद से संबंधित कार्यों और शक्तियों के संबंध में कोई भी न्यायालय उनसे जवाब तलब नहीं कर सकता। न ही कोई न्यायालय राष्टï्रपति के गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी कर सकता है।
नामांकन-राष्टï्रपति राष्टï्र का प्रथम नागरिक होता है। राष्टï्रपति चुनाव लडऩे के लिए आवश्यक है-
कराष्टï्रपति पद के लिए जो उम्मीदवार होंगे उन्हें 2500 रूपये की जमानत राशि जमा करनी होती थी किंतु अब यह राशि बढ़ाकर 15000 कर दी गयी है। यदि उन्हें वैध मतों का छठा भाग नहीं मिलता है तो यह राशि जब्त कर ली जाएगी।
कराष्टï्रपति के निर्वाचन मंडल के दस सदस्य उसके प्रस्ताविक तथा दस अनुमोदक होंगे। हाल ही में राष्टï्रपति ने एक अध्यादेश जारी करके अनुमोदक तथा प्रस्तावक दोनों के लिए संख्या बढाकर 50-50 सदस्य कर दिये हैं।
राष्टï्रपति के कृत्यों का निर्वहन-राष्टï्रपति की मृत्यु, त्यागपत्र या महाभियोग द्वारा पद से हटाये जाने की स्थिति में उपराष्टï्रपति राष्टï्रपति का पद ग्रहण कर लेता है।
6 महीने के अंदर राष्टï्रपति का चुनाव हो जाना आवश्यक है।
उपराष्टï्रपति यदि राष्टï्रपति के कार्य कर रहे होते हें, यदि अचानक उनकी मृत्यु हो जाए या किसी कारण से उन्हें पद से हटाना पडे तो ऐसी स्थिति में उ‘चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश राष्टï्रपति पद का कार्यभार संभालेंगे, इस स्थिति में भी छह महीने के अंदर राष्टï्रपति का चुनाव करा लिया जाएगा।
राष्टï्रपति का निर्वाचन
राष्टï्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मण्डल द्वारा होता है जिसमें–
कसंसद के दोनों सदनों (लोकसभा, राज्य सभा) के निर्वाचित सदस्य तथा
कराज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य होते हैं।
निर्वाचन गुप्त मतदान द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर एकल संक्रमणीय मत पद्घति के द्वारा होता है।
भारतीय संसद तथा राज्यों के विधान मंडलों के मनोनीत सदस्यों को राष्टï्रपति के निर्वाचन में भाग लेने का अधिकार प्राप्त नहीं है। राज्यों के विधान परिषदों के सदस्य भी मतदान में भाग लेने के अधिकारी नहीं हैं।
राष्टï्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचक मंडल के सभी सदस्यों के मत का मूल्य समान नहीं होता है।
निर्वाचक मंडल के सदस्यों में से प्रत्येक सदस्य के मतों की संख्या उस अनुपात द्वारा निश्चित होती है जितनी संख्या का वह प्रतिनिधित्व करता है। अभिप्राय यह है कि अधिक आबादी वाले राज्य के प्रत्येक सदस्य को अधिक मत मिलेंगे और कम जनसंख्या वाले सदस्य को कम।
कराज्य की विधान सभा के प्रत्येक सदस्य के मत निकालने का सूत्र–
राज्य की जनसंख्या
उस राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों की कुलसंख्या – भाग-1000
कसंसद के निर्वाचित प्रत्येक सदस्य के मत का मूल्य —
कुल राज्य की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मत मूल्यों का योग
संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या
उपर्युक्त सूत्रों के आधार पर राज्य विधान सभाओं व संसद के निर्वाचित सदस्यों के मतों की संख्या ज्ञात कर ली जाती है। चुनाव में सफलता प्राप्त करने के लिए प्रतयेक उम्मदवार को एक न्यूनतम कोटा प्राप्त करना होता है। न्यूनतम कोटे का सूत्र है—-
न्यूनतम कोटा – कुल वैध मतों की संख्या
निर्वाचित होने वाले प्रतिनिधियों की संख्या प्लस 1
मतगणना-राष्टï्रपति का निर्वाचन गुप्त मतदान द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की एकल संक्रमणीय पद्घति से होता है। वह व्यक्ति निर्वाचित घोषित किया जाता है जिसे कुल मतों का स्पष्टï बहुमत प्राप्त होता है।
इस चुनाव पद्घति के अनुसार मतदाता वरीयता के आधार पर उम्मीदवारों के नाम के सामने 1,2,&,4 लिख कर अपनी पसंद को व्यक्त कर सकते हैं। इस प्रकार के प्रत्येक मतदाता उतने मत दे सकते हैं जितने कि उम्मीदवार हैं। यदि प्रथम वरीयता के अनुसार किसी उम्मीदवार को स्पष्टï बहुमत प्राप्त नहीं होता है तब सबसे कम मत प्राप्त करने वाले उम्मीदवार के मतों को प्रथम करके उसके द्वितीय वरीयता के मत देखे जाते हैं जिन्हें प्रथम वरीयता के मतों में सम्मिलित कर लिया जाता है। यदि अब भी कोई विजयी नहीं होताा हे तो फिर उससे कम मत वाले उम्मीदवार के द्वितीय मत देखे जाते हैं। यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक किसी को पूर्ण स्पष्टï बहुमत प्राप्त न हो जाए।
शपथ ग्रहण-पद ग्रहण करने से पूर्व राष्टï्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश अथवा उसकी अनुपस्थिति में सर्वो‘च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष शपथ लेता है या प्रतिज्ञा करता है कि–
मैं…..(अमुक)…….ईश्वर की शपथ लेता हूं। सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं श्रद्घापूर्वक भारत के राष्टï्रपति का कार्यपालन करूंगा तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण एवं प्रतिरक्षण करूंगा और भारत की जनता की सेवा और कल्याण में रत रहूंगा।

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