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Dr D K Garg

काल्पनिक कथा : एक समय महाराजा भस्मासुर को इच्छा जागृत हुई कि मैं तपस्वी होऊं ।कुछ काल पश्चात उन्हें देव ऋषि नारद के दर्शन हुए ,तो नारद ने कहा अवश्य तपस्वी बनो। वह शिव की तपस्या करने लगे तो शिव आ पहुंचे। शिव ने कहा कि भस्मासुर क्या चाहते हो?
भस्मासुर ने कहा कि भगवान आपके पास जो कंगन है ,इस कंगन को मुझे अर्पित कर दीजिए। अब भगवान शिव ने वह कंगन दे दिया।उस कंगन में यह विशेषता थी की यदि वह मस्तिष्क के ऊपर ले भाग में हो तो वह मानव भस्म हो जाता है।
महाराजा शिव तो कैलाश पर जा पहुंचे और भस्मासुर को अभिमान आ गया। जिस को भस्म करने की इच्छा होती उसे कंगन द्वारा भस्म कर देते ।एक समय वह भ्रमण करते हुए कैलाश जा पहुंचे ।
वहा माता पार्वती के दर्शन करते ही पार्वती पर मोहित हो गए और मोहित होकर के महाराजा शिव से कहा कि या तो मुझे पार्वती को अर्पित करो अन्यथा इस कंगन से मैं आप को भस्म कर दूंगा ।
अब महाराजा शिव ने यह विचारा कि क्या करना चाहिए? उसी काल में उन्होंने कहा कि अरे भस्मासुर मुझे कुछ समय प्रदान किया जाए जिसके लिए भस्मासुर राजी हो गया।
परेशानी से मुक्ति के लिए शिव ने ब्रह्मा से मिलने का समय मांगा और कैलाश को त्याग करके ब्रह्मा के द्वार जा पहुंचे। ब्रह्मा ने उनकी बात को सुना लेकिन सहायता करने से इंकार कर दिया।
यानि कि भस्मासुर के आगे ब्रह्मा भी हथियार डाल चुके थे। इसी प्रकार विष्णु के यहां पहुंचे तो विष्णु ने भी सुनकर मदद से इनकार कर दिया। इससे सिद्ध हुआ कि विष्णु भी भस्मासुर को नष्ट नहीं कर सकते थे। इंद्र के पास पहुंचे तो इंद्र ने भी सहायता नहीं की।
इसका तात्पर्य ये हुआ कि सारे देवता असफल हो चुके थे और शिव जी के सहायता नहीं कर पा रहे थे।अंत में निराश होकर भ्रमण करते हुए पुनः कैलाश पर आ गए और पार्वती से कहा कि देवी अब क्या करना चाहिए ? यह तो मर्यादा का विनाश होने चला है यदि मर्यादा का विनाश हो गया तो देवी हमारा जीवन व्यर्थ हो जाएगा !उस समय पार्वती ने कहा कि प्रभु यदि आप मेरे कहे वाक्य को स्वीकार कर लें तो मैं आपको कुछ कह रही हूं ।महाराज शिव ने कहा कि कहो, देवी उच्चारण करो।
देवी ने कहा कि भस्मासुर से कह दो और आप मेरा और भस्मासुर का नृत्य करा दीजिए ।जब नृत्य होगा तो जहां जहां मेरा हाथ जाएगा वही वही भस्मासुर का हाथ जाएगा।जब भस्मासुर का हाथ मस्तिष्क के ऊपर के विभाग में जाएगा तो कंगन से भस्मासुर समय नष्ट हो जाएगा ।
माता पार्वती के इस वाक्य को शिव ने स्वीकार कर लिया। अब महाराज शिव ने भस्मासुर से कहा कि हे भस्मासुर! तुम पार्वती के साथ नृत्य करो।
भस्मासुर ने प्रसन्न होकर के यह बात स्वीकार कर लिया और दोनों का नृत्य होने लगा । इस प्रकार योजना के तहत भस्मासुर का अंत उसी कंगन से करा दिया गया।

कथा का वास्तविक भावार्थ: यह तो अज्ञानियों की कहानी थी। तनिक विचार करिए कि शिवजी अपनी पत्नी को प्राप्त करने के लिए द्वार द्वार भटक रहे हैं। यदि शिव परमात्मा थे ,अर्थात सर्वशक्तिमान थे, तो उनके पृथ्वी पर उत्पन्न होने की आवश्यकता नहीं थी और न ही वह नष्ट होते।
कथानक का संदेश ये हैं की जब मानव के विनाश का समय आता है तो इसी प्रकार की बुद्धि बन जाती है ।उसी प्रकार के कारण बन जाते हैं ।भस्मासुर के जब विनाश का समय आया तो वह भ्रमण करते हुए कैलाश पर जा पहुंचा।
देखिए भस्मासुर वही होता है जो संसार में अभिमानी होता है तथा अपनी बुद्धि ,शक्ति और धान आदि का दुरूपयोग करने लगता है। ऐसे व्यक्ति, विद्वान और राजनेता आदि का अहंकार जब सर पे चढ़कर बोलने लगता है तो ऐसे व्यक्ति को भस्मासूर कहते है, जिनके द्वारा समाज और देश का विनाश होना निश्चित है लेकिन वो कितना भी पूजा पाठ कर ले परंतु ईश्वर उनकी रक्षा नही करता।
वर्तमान परिपेक्ष्य में देखे तो आज हमारे वैज्ञानिको ने अपनी योग्यता से तो जो शस्त्र बनाये है ,जो नाना प्रकार के कंगन रूपी यंत्र एकत्र किए जाते हैं जैसे अग्नियास्त्र हैं तो कहीं ब्रह्मास्त्र हैं ये अपनी रक्षा के लिए है,ना की किसी को भी नष्ट करने के लिए, इनके सदुपयोग का भी ध्यान रखना चाहिए। अन्यथा दुसरे को भस्म करने की चाह में स्वयं भी नष्ट हो जायेंगे।
आज के मशीनी और भौतिकवादी युग में जिसको भी धन और शक्ति का अभिमान हो रहा है ,इसी अभिमान को हमारे यहां भस्मासुर कहते हैं।
ईश्वर तो अजन्मा और अनादि एवं नित्य है । वह जन्म मरण में आता ही नहीं। न हीं वह अवतार धारण करता। न हीं पार्वती के साथ विवाह संस्कार करते ,तथा नहीं संतानोत्पत्ति करते और ना ही पार्वती के कारण ब्रह्मा विष्णु और इंद्र से सहायता नहीं मांगते ,क्योंकि ईश्वर तो सर्वशक्तिमान है ।
अपने महायोगियों को, अपने मनीषियों को, अपने तपस्वीयों, को मनस्वीयो को विधर्मीयो के द्वारा लान्छित करने का तथा अपमानित करने का अवसर हम स्वयं देते हैं। जब हम महायोगी शिव के विषय में ऐसी कपोल कल्पित कल्पनाएं, बनाकर समाज में प्रस्तुत करते हैं तो हमारे महा योगियों का मजाक तो उड़ेगा ही।
इसीलिए महर्षि दयानंद ने सच्चे शिव की खोज करने का प्रण लिया था। संसार के समक्ष सत्य को स्थापित किया था।इस कथा का वास्तविक, वैदिक और अभिप्राय यही है।

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