जब काशी की ‘मनु’ ने पस्त किए थे अंग्रेजों के हौंसले,

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जब काशी की ‘मनु’ ने पस्त किए थे अंग्रेजों के हौंसले, ऐसे हुई थी रानी लक्ष्मीबाई की शहादत

अनन्या मिश्रा

प्रथम स्वाधीनता संग्राम की अमर वीरांगना, स्वाभिमान की ओजस्वी ललकार महारानी लक्ष्मीबाई आज के दिन यानी की 18 जून को वीरगति को प्राप्त हुई थीं। 18 जून को रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस के तौर पर मनाया जाता है। अपने जीवन की अंतिम लड़ाई में लक्ष्मीबाई ने ऐसी वीरता का दिखाई कि दुश्मन भी उनके कायल हो गए थे। हालांकि रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु डेट को लेकर मतभेद है। कई लोगों का मानना है कि रानी लक्ष्मीबाई 17 जून को वीरगति को प्राप्त हुई थीं। तो एक मत 18 जून की ताऱीख बताता है। लेकिन अंग्रेजों के दांत खट्टे किए और अंतिम सांस तक लड़ने को लेकर किसी तरह का कोई विवाद नहीं है। आइए जानते हैं रानी लक्ष्मीबाई के जीवन से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में…

जन्म

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 19 नवंबर 1828 को लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ था। लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम मणिकर्णिका था। लेकिन सब लोग उन्हें प्यार से मनु बुलाते थे। लक्ष्मीबाई के पिता मोरोपंत तांबे पत्नी यानी की लक्ष्मीबाई की मां की मौत के बाद उन्हें पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में ले जाने लगे। जहां पर वह शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्र की शिक्षा भी लेने लगीं।

शादी

साल 1842 में लक्ष्मीबाई का विवाह झांसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ। इस तरह वह झांसी की रानी बन गईं। विवाह के बाद मनु का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। साल 1851 में उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन महज 4 महीने बाद ही पुत्र की मौत हो गई। वहीं साल 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ गया। जिस पर उन्हें दत्तक पुत्र लिए जाने की सलाह दी गई। दत्तक पुत्र गोद लिए जाने के बाद साल 1853 में राजा गंगाधर का निधन हो गया। वहीं दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया।

अंग्रेजों ने नहीं माना वारिस

उस दौरान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के गोद लिए बालक को गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी की नीति के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी ने वारिस मानने से इंकार कर दिया। जिसके बाद रानी लक्ष्मीबाई ने भी अंग्रेजों को दो टूक जवाब दिया कि वह अपनी झांसी किसी को नहीं देंगी। लक्ष्मीबाई के इस ऐलान के बाद युद्ध भी निश्चित हो गया। जिसके लिए लक्ष्मीबाई भी तैयार थीं। कैप्टन ह्यूरोज को रानी के विद्रोह को खत्म करने के लिए जिम्मा दिया गया था।

झांसी छोड़ने को मजबूर हुईं लक्ष्मीबाई

साल 1858 में अंग्रेजों ने रानी लक्ष्मीबाई की झांसी पर हमला कर दिया। लेकिन इस दौरान करीब 1 महीने तक लक्ष्मीबाई तात्या टोपे की मदद से युद्ध में जमी रहीं। वह अंग्रेजों को 13 दिनों तक झांसी में घुसने से रोकती रहीं। लेकिन युद्ध के 14वें दिन यानी की 4 अप्रैल को अंग्रेजों की सेना झांसी में घुसने में कामयाब रही। जिसके बाद रानी लक्ष्मीबाई ने अपने पुत्र दामोदर राव के साथ झांसी छोड़ दिया।

ग्वालियर में जमाई ताकत

रानी लक्ष्मीबाई ने महज 24 घंटे में मील की दूरी तय कर काल्पी पहुंचीं। यहां पर उनकी मुलाकात नाना साहेब पेशवा, राव साहब और तात्या टोपे से हुई। फिर यह सभी ग्वालियर पहुंचे। ग्वालियर के रादा जयाजीराव सिंधिया अंग्रेजों के साथ थे। लेकिन राजा सिंधिया की फौज बागियों के साथ यानी की लक्ष्मीबाई आदि के साथ हो गई। लक्ष्मीबाई का पता लगाते हुए अंग्रेजी सेना ग्वालियर पहुंच गईं। जहां पर लक्ष्मीबाई और अंग्रेजों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।

17 जून का दिन था अहम

रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम युद्ध 17 जून को शुरू हुआ। हालांकि उनकी मृत्यु को लेकर अलग-अलग मत हैं। लॉर्ड केनिंग की रिपोर्ट सबसे ज्यादा विश्वसनीय मानी जाती है। ह्यूरोज की घेराबंदी और संसाधनों की कमी के कारण लक्ष्मीबाई अंग्रेजी सेना से घिर गईं। इस दौरान ह्यूरोज ने रानी लक्ष्मीबाई को पत्र लिख समर्पण करने के लिए कहा। लेकिन वह अपना किला छोड़कर मैदान में पहुंच गईं। लक्ष्मीबाई का इरादा स्मिथ की टुकड़ी और तात्या टोपे द्वारा दूसरी अंग्रेजी सेना की टुकड़ी को घेरने का था। लेकिन कहते हैं कि तात्या समय पर नहीं पहुंच सके। जिसके कारण लक्ष्मीबाई मैदान में अकेली पड़ गईं।

युद्ध में मिले कई जख्म

कैनिंग की रिपोर्ट के अनुसार रानी लक्ष्मीबाई को युद्ध के समय गोली लग गई थी। जिसके बाद वह अपने सबसे भरोसेमंद सैनिकों के साथ ग्वालियर शहर के मौजूदा रामबाग तिराहे से नौगजा रोड़ पर आगे बढ़ रही थीं। लक्ष्मीबाई स्वर्ण रेखा नदी की ओर बढ़ रही थीं। तभी नदी के किनारे उनका घोड़ा अड़ गया। लेकिन दूसरी बार प्रयास करने के बाद भी उनका घोड़ा नदी के किनारे अड़ा रहा। गोली लगने की वजह से लक्ष्मीबाई का काफी खून बह चुका था। जिसके बाद वह मूर्छित होने लगीं।

ऐसे हुई शहादत

इस दौरान अंग्रेज की तलवार के वार से लक्ष्मीबाई के सिर को एक आंख समेत अलग कर दिया। इस तरह से रानी लक्ष्मीबाई शहादत को प्राप्त हुई। लेकिन मृत्यु से पहले लक्ष्मीबाई ने अपने सैनिकों से कहा था कि उनका शरीर अंग्रेजों के हाथ नहीं लगना चाहिए। जिसके बाद लक्ष्मीबाई की सेना उनके पार्थिव शरीर को झांसी की शाला में ले आए। जहां पर उनका फौरन अंतिम संस्कार कर दिया गया था। कई मत लक्ष्मीबाई की शहादत की तारीख 17 जून बताते हैं तो कुछ मत उनकी शहादत की तारीख 18 जून बताते हैं।

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