शूद्र ब्रह्मा के पैरो से उत्पन हुए*

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भारतीय संस्कृति एवं धर्मग्रंथो के प्रति दुष्प्रचार

भाग-१

डॉ डी के गर्ग

दुष्प्रचार 1
शूद्र ब्रह्मा के पैरो से उत्पन हुए

उत्तर: उपरोक्त कथन का प्रयोग भारत में और विदेशी लोग आपस में फुट डालने के लिए प्रयोग करते है ताकि भारतीय समाज को अलग अलग गुटों में बाँट दे ,इसका लाभ विदेशी ताकतें ,कुछ राजनेता, और अम्बेडकरवादी ले रहे है ताकि समाज का वैफतान हो और इसे, बुद्धिस्ट पंथ में उनको लाया जा सके।
वेदो में शूद्र किसे कहा है ?
कम्युनिस्ट और पूर्वाग्रह ग्रस्त भारतीय चिंतकों की भ्रामक कपोल कल्पनाओं ने पहले ही समाज में अलगाव के बीज बो कर अत्यंत क्षति पहुंचाई है । अभाग्यवश दलित कहे जाने वाले लोग खुद को समाज की मुख्य धारा से कटा हुआ महसूस करते हैं, फलतः हम समृद्ध और सुरक्षित सामाजिक संगठन में नाकाम रहे हैं।इस का केवल मात्र समाधान यही है कि हमें अपने मूल, वेदों की ओर लौटना होगा और हमारी पारस्परिक (एक-दूसरे के प्रति) समझ को पुनः स्थापित करना होगा । इस लेख में हम शूद्र के यथार्थ अर्थ का आकलन करेंगे
१. वेदों में मूलतः ब्राहमण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र पुरुष या स्त्री के लिए कहीं कोई बैरभाव या भेदभाव का स्थान नहीं है ।
२. जाति की अवधारणा यदि देखा जाए तो काफी नई है । जाति के पर्याय के रूप में स्वीकार किया जा सके या अपनाया जा सके ऐसा एक भी शब्द वेदों में नहीं है । जाति के नाम पर साधारणतया स्वीकृत दो शब्द हैं कृ जाति और वर्ण । किन्तु सच यह है कि तीनों ही पूर्णतया भिन्न अर्थ रखते हैं ।
हर जाति विशेष के प्राणियों में शारीरिक अंगों की समानता पाई जाती है । एक जन्म-जाति दूसरी जाति में कभी भी परिवर्तित नहीं हो सकती है और न ही भिन्न जातियां आपस में संतान उत्त्पन्न कर सकती हैं। अतः जाति ईश्वर निर्मित है ।
जैसे विविध प्राणी हाथी, सिंह, खरगोश इत्यादि भिन्न-भिन्न जातियां हैं।इसी प्रकार संपूर्ण मानव समाज एक जाति है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र किसी भी तरह भिन्न जातियां नहीं हो सकती हैं क्योंकि न तो उनमें परस्पर शारीरिक बनावट (इन्द्रियादी) का भेद है और न ही उनके जन्म स्त्रोत में भिन्नता पाई जाती है ।
बहुत समय बाद जाति शब्द का प्रयोग किसी भी प्रकार के वर्गीकरण के लिए प्रयुक्त होने लगा और इसीलिए हम सामान्यतया विभिन्न समुदायों को ही अलग जाति कहने लगे।जबकि यह मात्र व्यवहार में सहूलियत के लिए हो सकता है।सनातन सत्य यह है कि सभी मनुष्य एक ही जाति हैं ।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिए प्रयुक्त किया गया सही शब्द वर्ण हैकृ जाति नहीं । सिर्फ यह चारों ही नहीं बल्कि आर्य और दस्यु भी वर्ण कहे गए हैं ।वर्ण का मतलब है जिसे वरण किया जाए (चुना जाए) । अतः जाति ईश्वर प्रदत्त है जबकि वर्ण अपनी रूचि से अपनाया जाता है । जिन्होंने आर्यत्व को अपनाया वे आर्य वर्ण कहलाए और जिन लोगों ने दस्यु कर्म को स्वीकारा वे दस्यु वर्ण कहलाए। इसी प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण कहे जाते हैं । इसी कारण वैदिक धर्म ‘वर्णाश्रम धर्म’ कहलाता है
३.बौद्धिक कार्यों में संलग्न व्यक्तियों ने ब्राहमण वर्ण को अपनाया है ।समाज में रक्षा कार्य व युद्धशास्त्र में रूचि योग्यता रखने वाले क्षत्रिय वर्ण के हैं । व्यापार-वाणिज्य और पशु-पालन आदि का कार्य करने वाले वैश्य तथा जिन्होंने इतर सहयोगात्मक कार्यों का चयन किया है वे शूद्र वर्ण कहलाते हैं । ये मात्र आजीविका के लिए अपनाये जाने वाले व्यवसायों को दर्शाते हैं, इनका जाति या जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है ।
अतः हम भी समाज में व्याप्त जन्म आधारित भेदभाव को ठुकरा कर, एक दूसरे को भाई-बहन के रूप में स्वीकारें और अखंड समाज की रचना करें ।हमें गुमराह करने के लिए वेदों में जातिवाद के आधारहीन दावे करनेवालों की मंशा को हम सफल न होने दें और समाज के अपराधी बनाम दस्युदासराक्षसों का भी सफाया कर दें ।
वेदों में कोई जाति व्यवस्था नहीं है ।

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