धनपति और पृथ्वीपति, कहला गये अनेक

बिखरे मोती-भाग 191

गतांक से आगे….
यदि वाणी में आकर्षण नहीं अपितु विकर्षण है तो परिजन, मित्र बंधु-बांधव, अनुयायी, भृत्य और प्रशंसक ऐसे छोडक़र चले जाते हैं जैसे सूखे वृक्ष को छोडक़र पक्षी चले जाते हैं। इसलिए श्रेष्ठता का ताज व्यक्ति की वाणी पर टिका है, क्योंकि वाणी ही व्यवहार का आधार होती है। सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के राज्याभिषेक के समय महर्षि चाणक्य ने चंद्रगुप्त को सचेत करते हुए कहा था-”चंद्रगुप्त! यह राजमुकुट तुम्हारे सिर पर नहीं, अपितु तुम्हारी वाणी पर टिका है। इसके गुरूतर दायित्व को समझना ज्ञान में गंभीरता और वाणी के संयम का सर्वदा ध्यान रखना।”
अत: व्यक्ति चाहे छोटा हो या बड़ा हो, उसे अपने ताज (बड़प्पन) की रक्षा करनी है तो वाणी परिष्कृत होनी ही चाहिए, तभी व्यक्ति का यश फैलता है, अन्यथा अपयश का भागी बनता है। वाणी के संदर्भ में ऋग्वेद का ऋषि मनुष्य को उपदेश देते हुए कितने सुंदर शब्दों में कहता है :-”या ते जिह्वा मधुमती सुमेधा अग्ने देवेषूच्यत उरूची।” ऋ 3/57/5 अर्थात ‘हे मनुष्य! तू मीठी और सद्बुद्घियुक्त वाणी का प्रयोग कर।’ ब्राह्मण ग्रंथों में आता है कि यज्ञ की सफलता की कामना करने वाले हे मनुष्य! तू यज्ञ में मानुषी वाणी का प्रयोग न कर। वैष्णवी अथवा दैवी वाणी बोल। इसके दो तात्पर्य हैं-एक तो यह कि यज्ञ में परमात्मा की दैवी वाणी अर्थात वेदवाणी का प्रयोग कर, दूसरा यह है कि देववाणी जो दिव्यभावयुक्त वाणी है-उसे बोल। आसुरी वाणी तो कभी मत बोल। तभी तेरा जीवन-पथ सफल होगा अन्यथा नहीं। भाव यह है कि तेरा वर्चस्व (श्रेष्ठता) तभी अक्षुण्ण रहेगा अन्यथा नहीं।
धनपति और पृथ्वीपति,
कहला गये अनेक।
वारिस बदलते ही रहें,
स्ववान शिव एक ।। 1123 ।।
व्याख्या :-संसार में यह देखकर कौतूहल भी होता है और करूणा भी आती है, कि मनुष्य इस अल्पावधि के नश्वर जीवन के लिए प्रभु प्रदत वस्तुओं पर अपना अधिकार जमाता है। जैसे गाय, भैंस, गधे, घोड़े, हाथी, ऊंट, बैल, पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री, बंधु-बांधव इसके अतिरिक्त चल-अचल संपत्ति मकान-दुकान, कार-कोठी, जमीन जायदाद इत्यादि को अपना कहता है और इन पर अधिकार जमाता है। अधिकार जितना बढ़ता जाता है अहंकार का दानव भी उसी अनुपात में बढ़ता चला जाता है, किंतु याद रखो, तुमसे पहले इस संसार में ऐसे बहुत से लोग हो गुजरे जो धन के कुबेर और भूमंडल के चक्रवर्ती सम्राट कहलाते थे, फिर भी वे प्रभु-प्रदत्त वस्तुओं के मालिक अथवा स्वामी न बन सके। वे वारिस रहे और उनके वारिस बदलते रहे। यह क्रम सृष्टि में अनवरत रूप से चल रहा है। ईशावास्योपनिषद् का ऋषि इस संदर्भ में कितना सुंदर कहता है:-
ऊं ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मां गृध:कस्य स्विद्घनम्।।
अर्थात-यह सब कुछ ईश्वर का है। इसके प्रत्येक अणु में, परमाणु में और परमाणु के प्रत्येक खण्ड में ईश्वर विद्यमान है। इसलिए त्यागपूर्वक भोग करो। किसी दूसरे के धन की आकांक्षा मत करो। यह धन परमात्मा के सिवाय किसी का नहीं है। अत: उपरोक्त मंत्र के भावार्थ से स्पष्ट हो गया कि प्रभु प्रदत्त वस्तुओं पर तुम्हारा कोई स्वामित्व नहीं है।
क्रमश:

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