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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से भयानक राजनीतिक षडयंत्र राजनीति

लोकतंत्र के हत्यारे बने राजभवन, भाग-2

राजस्थान के राजभवन की घटना
इसके पश्चात दूसरी बार लोकतंत्र की हत्या का यह ढंग राजस्थान के राजभवन में सन् 1967 में दोहराया गया। उस समय राजस्थान के राज्यपाल डा. संपूर्णानंद थे। उनके समय में राजस्थान में यह स्थिति आयी कि चुनावों में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत से कुछ पीछे रह गयी। तब ऐसी परिस्थितियों में सारे विपक्षी दलों ने मिलकर सरकार बनाने का दावा किया और सभी विपक्षी दलों ने मिलकर बहुमत का जुगाड़ करके अपनी संख्या से राजभवन को अवगत भी करा दिया। किंतु डा. संपूर्णानंद जैसा विद्वान और विवेकशील राज्यपाल पार्टी प्रेम में बह गया। उन्होंने विधानसभा को निलंबित कर दिया। इस निलंबन काल में कांग्रेस को विधायकों के क्रय-विक्रय करने का अवसर मिल गया और ‘मोहनलाल सुखाडिय़ा’ के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार ने सत्ता संभाल ली। राजभवन की न्यायप्रियता और निष्पक्षता इस प्रकार राजनीति की दलदल में से निकलकर जब बाहर आयी तो उसके कुरूपित और विद्रूपित चेहरे को देखकर सभी दंग रह गये। यह तो लोकतंत्र का सौभाग्य रहा कि ‘बिकाऊ गधों’ के बल पर सत्ता में आयी यह सरकार चल नहीं पायी और बनने के साथ ही धराशायी हो गयी। कुछ भी हो, सरकार चली या न चली-यह एक अलग बात है, परंतु राजभवन में अपनी निष्पक्षता को तो नीलाम कर ही दिया।
आन्ध्र प्रदेश के राज्यपाल की घटना
इसके पश्चात सन् 1982 में राजनीति की कीचड़ ने आंध्र प्रदेश के राजभवन को बदरंग किया। राज्यपाल थे रामलाल जी और सरकार थी ‘एन.टी. रामाराव’ की। इंदिरा जी की शह पर राज्यपाल श्री रामलाल ने अपने हथियार निकाले और एक असंवैधानिक षडय़ंत्र के अंतर्गत ‘एन.टी. रामाराव’ की चलती हुई सरकार को छुरी मारकर गिरा दिया। कांग्रेस के ‘एन. भास्कर राव’ को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सत्ता का ताज उनके सिर पर रख दिया। परंतु एन.टी. रामाराव भी हार मानने वाले नहीं थे। उन्हें राष्ट्रपति भवन की सहानुभूति मिली और देश की जनता का सहयोग और समर्थन मिला। फलस्वरूप भारी अपयश मिलने के उपरांत राज्यपाल महोदय ने एन.टी. रामाराव को पुन: सत्ता सौंप दी।
कर्नाटक के राज्यपाल की घटना
सन् 1989 में बोम्मई प्रकरण भी इसी प्रकार चर्चा का विषय बना था। यहां पर राज्यपाल महोदय ने बोम्मई महोदय की सरकार को बहुमत सिद्घ करने का अवसर दिये बिना ही अपदस्थ कर दिया था। यह प्रकरण देश के सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा और माननीय न्यायालय ने लोकतांत्रिक परम्पराओं के सम्मानार्थ यह व्यवस्था कर दी कि बहुमत का निर्णय सदन के पटल पर ही किया जाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश का घटनाक्रम सन 1996
इसी प्रकार रोमेश भंडारी का आचरण अधिक घृणा का पर्याय बना। जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के कल्याण सिंह को सरकार बनाने से छह माह तक रोके रखा। उनका यह आचरण भी समाचार पत्रों में उस समय आलोचना का पात्र बना था। उस समय कल्याणसिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। तब कल्याण सिंह की सरकार को विश्वासमत प्राप्त करने के बाद भी राज्यपाल ने बर्खास्त कर दिया।
इसी प्रकार लेफ्टिनेंट जनरल जैकब ने कांग्रेस पार्टी की सरकार को गोवा में बहुमत सिद्घ करने के लिए मात्र ढाई घंटे का समय देकर सभी को चौंका दिया था। इसके पश्चात उन्होंने सरकार को बर्खास्त कर लोकतंत्र को फांसी लगा दी।
बिहार की घटना
अब आइये, सन् 1999 में बिहार का राजभवन देखें। राबड़ी देवी की सरकार जिसे शह थी केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार की। राजभवन में बैठे थे-सुंदर सिंह भंडारी। भंडारी महोदय ने राबड़ी देवी की बहुमत वाली सरकार को बर्खास्त कर दिया था। बाद में भाजपा संसद से अपने इस कृत्य पर मुहर लगवाने में असफल हो गयी। तत्पश्चात बिहार में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गयी राबड़ी देवी की सरकार को पुन: जीवनदान मिल गया। किंतु लोकतंत्र के भक्षक अपना स्वरूप तो उजागर कर ही गये।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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