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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से भयानक राजनीतिक षडयंत्र राजनीति

आर्य (हिन्दू) की व्याख्या और ऊर्जा का अपव्यय, भाग-4

भारत बनाम इण्डिया
जिस प्रकार अंग्रेजों के आगमन से सदियों वर्ष पूर्व से इस देश को इंडिया कहा जाता था, उसी प्रकार मुस्लिमों के आगमन से सदियों पूर्व इसे हिंद भी कहा जाता था। हजरत मोहम्मद साहब से 1700 वर्ष पूर्व हुए प्रसिद्घ कवि ‘लबि बिन अखताब’ की कविताओं का सम्मेलन अब्बासी खलीफा हारून रशीद के दरबारी कवि ‘अस्माई मलेकुस शरा’ ने किया था। जिसमें उन्होंने भारत को हिंद कहा है। उन्होंने कहा-
‘हे हिन्द की पुण्यभूमि! तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझे चुना।’
यहां भारत के लिए हिंद काला काफिर आदि होने के कारण ही कहा जाता तो इस प्रकार की प्रशंसात्मक कविताओं को लिखने का क्या औचित्य था? इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के कपंद्रहवें वें संस्करण में हिंदुत्व की विस्तृत परिभाषा देकर उसे एक जीवन पद्घति माना गया है। साथ ही हिंदुओं को सिंध नदी के क्षेत्र में वास करने वाला माना गया है।
वेब्स्टर शब्द कोष में हिन्दू
इसी प्रकार वेब्स्टर के तृतीय अंतराष्ट्रीय शब्दकोश में हिन्दुत्व की परिभाषा देते हुए कहा गया है-
सामाजिक सांस्कृतिक तथा धार्मिक विश्वासों तथा व्यवहारों का एक ऐसा संपूजन, जो अधिकांशत: उपमहाद्वीप में गतिशील रहा है और कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग द्वारा पुनर्जन्मों के चक्र से मुक्ति में आस्था रखता है।
इस प्रकार हिंदू और हिंदुत्व को विदेशियों के द्वारा भरपूर रूप में प्रशंसित करते हुए सम्मानजनक स्थान प्रदान किया गया है, जिन पर कोई टिप्पणी करना आवश्यक नहीं। जहां तक हिंदू की उत्पत्ति का सिंधु से संबंध है तो बहुत से शब्द इसी प्रकार उत्पन्न होकर समाज में रूढ़ हो जाते हैं तथा उन्हें लोकमान्यता भी मिल जाती है।
समाज में सम्मान भी मिल जाता है बेशक चाहे उनकी उत्पत्ति का कोई वैयाकरणिक आधार भी न हो। जैसे युक्ति से जगती, जगती से जुगत और जुगत से ‘जुगाड़’ बना शब्द ऐसा ही है। लोक में ऐसे और भी बहुत से शब्द हैं। देखिये महर्षि दयानंद का मत है कि-
‘एक भाषा दूसरी भाषा का अपभ्रंश होकर उत्पन्न होती है ऐसे अपभ्रंश कुछ नियमों के अनुकूल होते हैं और कुछ अपभ्रंश यथेष्टाचार से भी होते हैं इनके विषय में विशेष कहना नहीं है।’
इस प्रकार देश, काल और परिस्थिति के अनुसार आर्य को ही हिंदू कहा गया। किंतु एक षडय़ंत्र के अंतर्गत आर्य को विदेशी और हिंदू को एक स्थान विशेष (सिंधु के आसपास तक सीमित) का रहने वाला बताने का प्रयास यहां पर सफलतापूर्वक किया गया।
इस शब्द को अपने मूल से काट दिया गया। मानो पुष्प से उसकी सुगंध छीन ली गयी हो। इस प्रकार सैकड़ों वर्ष के इस षडय़ंत्रकारी लेखन और उद्बोधन से हिंदू नामक पुष्प सुगंधहीन कर दिया गया। जिससे वह स्वयं को हीन समझने लगा। जबकि उसका गौरवमय और अनुकरणीय इतिहास रहा है। संस्कृति रही है, परम्परापएं रही हैं और सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था रही है।
आज इसी गौरवमयी इतिहास, संस्कृति और परम्पराओं व सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था को पुन: प्रतिष्ठित कराने की आवश्यकता है। जो लोक वैदिक काल के आर्य को आज देखना चाहते हैं। उन्हें भारत में जाति व्यवस्था के जन्मगत स्वरूप की जकडऩ को भारत से उखाडऩा होगा।
इस दिशा में कार्य नहीं किया जा रहा है-किसी व्यवस्था व शब्द को लेकर आपस में ही आलोचनाएं की जारही हैं। दूसरे अशिक्षा, अज्ञानता, भ्रष्टाचार, अपने वैदिक साहित्य से अलगाव की बढ़ रही प्रवृत्ति और युवा वर्ग में पश्चिमी संगीत, पश्चिमी साहित्य व पश्चिमी संस्कृति से बढ़ रहे लगाव की प्रवृत्ति पर रोक लगाने की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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