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शिव आख्यान

भाग 8

Dr DK Garg
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बर्फानी बाबा उर्फ शिव बाबा
पौराणिक मान्यता :

भारत के कश्मीर राज्य में अमरनाथ गुफा प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। यहाँ की प्रमुख विशेषता गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है।
जिसको शिव लिंग मानकर पूजा जाता है, इसी को बाबा बर्फानी भी कहते हैं।
पौराणिक मान्यताओं में तो ये तक प्रचारित किया गया है कि इस गुफा में शंकर ने माता पार्वती को अमरत्व और सृष्टि के सृजन का और जीवन और मृत्यु के रहस्य के बारे में बताया था। पार्वती ने इस अमरकथा को सुनने की जिज्ञासा प्रकट की। लेकिन भगवान शंकर उस स्थान की तलाश में थे, जहां कोई तीसरा व्यक्ति सुन न सके। इसलिए उन्होंने इस गुफा को चुना।भगवान शिव जब पार्वती को अमर कथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने अपना नंदी बैल को पहलगाम (बैलग्राम) में, चंदनवाड़ी में चांद, शेषनाग में गले का सर्प, महागुनाश में अपने बेटे गणेश को और पंचतत्‍व (पृथ्‍वी, आकाश, पानी, हवा और अग्‍नी) जिससे मानव बना है को पंचतरणी में छोड़ा और पवित्र गुफा में विराजकर कालाग्‍नी के द्वारा सभी जीवित जीव को नष्‍ट कर मां पार्वती को अमरकथा सुनायी जो अंडे से बना कबूतर ने सुना और अमर हो गया। इस कथा का नाम अमरकथा इसलिए है
कहते है बाबा अमरनाथ दर्शन काशी में लिंग दर्शन और पूजन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हजार गुना पुण्य देनेवाले है।

विश्लेषण : अमरनाथ यात्रा दुर्गम यात्रा मानी जाती है। यहां पहुंचने के लिए दो रास्ते हैं। पहलगाम और बालटाल के जरिए गुफा तक पहुंचा जा सकता है। पहलगाम एक पारंपरिक मार्ग है, यह लंबा और दो दिन का ट्रेक या टट्टू की सवारी करनी पड़ती है। विभिन्न भागों से पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को समुद्र तल से 3,888फुट की ऊंचाई पर कठिन पहाड़ी रास्तों से गुजरना पड़ता है।
हर साल आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक सावन के पूरे माह इस हिमलिंग दर्शन के लिए लाखो श्रद्धालु पहुंचते है।यहां अक्सर बर्फ गिरती रहती है और इस क्षेत्र का तापमान माइनस 5 डिग्री तक पहुंच जाता है। इसी क्रम में कश्मीर के पहाड़ों पर एक स्थान पर सर्दियों में सालाना बर्फ जमकर प्राकृतिक शिवलिंग की आकृति बन जाती है
जिसे असली शिव का लिंग मानकर पूजते है।
शिव की आराधना के नाम पर क्या क्या नहीं है, पत्थर का शिव लिंग पूजा जाता है,बर्फ के बने लिंग के आकार की आकृति को भी शिव लिंग मानकर पूजते है , पंडित लोग कभी कभी आटे का भी शिव लिंग पूजवा देते है।
इससे एक बात तो स्पष्ट है की भक्ति के लिए सच्चे शिव की तलाश में लोग भटक रहे है और सत्य को सामने लाने वाले और समझाने वालो की भारी कमी है और समझने का भी प्रयास नही करते।
उपरोक्त कहानी और मान्यताओं का कोई प्रमाण नहीं है सिर्फ सुनी हुई गप्प कथाएं है।

वैज्ञानिक बताते है की बर्फ वाले शिव लिंग की आकृति प्राकृतिक कारणों से बर्फ़ गिरने और गिरते हुए तापमान पर निर्भर करती है। अमरनाथ गुफा की लंबाई (भीतर की ओर गहराई) 19 मीटर, चैड़ाई 16 मीटर व गुफा 11 मीटर ऊंची है। तकरीबन 150 फुट की परिधि में ऊपर से बर्फ के पानी की बूंदें जगह-जगह टपकती रहती हैं। यहीं पर एक ऐसी जगह है, जिसमें टपकने वाली हिम बूंदों से लगभग 10-22 फुट तक लंबा जमी बर्फ से शिवलिंग की आकृति बनती है।
शिव का अर्थ कल्याणकारी ईश्वर से है जो सर्वत्र है। यदि इस स्थान की बात करे तो यहां की बर्फ से ढकी पहाडियों के बीच कई स्थानों पर सांस लेने के लिए पर्याप्त आक्सीजन तक नहीं मिलती और अनेको श्रद्धालु या तो बीच में वापिस आ जाते है और कुछ की असमय मृत्यु भी हो जाती है। इसके अतिरिक्त समय समय पे यहाँ बर्फीले तूफ़ान भी आते है जिसके कारण यात्रा रोकनी पड़ जाती है।
एक बार अचानक आई बाढ़ के कारण यात्रा रोक दी गई थी और इस घटना में 16 लोगों की जान भी चली गई थी। ऐसी तरह कई बार बारिश से यात्रा बाधित हुई और नुनवान-पहलगाम आधार शिविर से यात्रा रोक दी गई।
दो साल से कोविड के चलते यात्रा बंद थी।
जमी बर्फ की लिंगाकार आकृति को देखने अंधविश्वासी दूर दूर से आते हैं,नाना प्रकार के कष्ट उठाते हैं,कई बार तो पहाडों के खिसकने से कई कई दिन तक हजारों भक्त मार्ग में ही फंस जाते हैं, कई बार भक्तों से भरी बसें गहरी खाई में गिर जाती हैं, कई बार भक्त आतंकबादियों की गोलियों के शिकार हो जाते हैं परन्तु यह कल्पित बर्फानी बाबा कभी अपने भक्तों की रक्षा करने नहीं आते !
ग्लोबल वार्मिंग का असर वहां भी दिखने लगा है और बताया जा रहा है कि लाखों श्रद्धालुओं के आने की वजह से बढ़ता तापमान और बादल फटने से बर्फ का शिवलिंग समय से काफी पहले पिघल जाता है ।
जो बात वैज्ञानिक और बौद्धिक रूप से तथ्यामक ना हो फिर भी धर्म का हिस्सा मान ले तो इसी को धर्मांधता कहते है।
पौराणिक पंडित शिव के लिंग के १०८ नाम बताते हैं और १२ ज्योतिर्लिंग बताये जाते हैं और जिसको कालभैरव ,महाकाल या कालातीत इसलिये बताया जाता है क्योंकि उसका और उसके भक्तों का काल कुछ नहीं बिगाड सकता । यदि यह ठीक है तो थोडा तापमान बढने से शिवलिंग पिघल क्यों जाता है ?
ये हम जानते हैं कि ईश्वर शक्तिशाली है, परम है, सूर्य से ज्यादा तेज है, उसको कोई खत्म नहीं कर सकता ना ही गुफा मे कैद कर सकता है वो सर्व व्यापी है, उसका कोई आकर नहीं है, वो विशाल है,
उसके भक्त काल का शिकार होकर मृत्यु का ग्रास क्यों बन जाते हैं ?
सब का कल्याणकारी होने से सर्वव्यापक निराकार ईश्वर का एक नाम शिव भी है | शिवलिंग पूजा, कांवड, १२ ज्योतिर्लिंग व कथित १०८ नाम व न्यूक्लियर रियक्टर से उनका कुछ लेना देना नहीं है| ये सब पत्थर पूजा को महिमा मण्डित करने के लिये कपोल कल्पित गाथाएं हैं | पुराणों में वर्णित शिवलिंग का इतिहास व गाथाएं पढोगे तो शर्म से सिर झुक जाएगा | शिवजी वा शिव परमात्मा की मूर्ति बना कर पूजना, उसका लिंग बनाना, उस पर जल वा दूध चढाना, उसके सिर से गंगा निकालना, उसके नाम पर भांग पीना, उसके लिये कांवड लाना आदि आदि सब कपोलकल्पित बातें हैं | चारों वेदों में कहीं भी इन बातों का वर्णन नहीं|
अमरनाथ गुफा की छत में छेद है उससे पानी टप टप करके गिरता है तो लिंग के आकार में बर्फ का गोला बन जाता है और कुछ नही ।
वास्तव में ऐसे लिंग बनना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जो हमारे घरों के फ्रिज व अंटलाटिका में सैंकडों हजारों की संख्या में हर रोज बनते हैं.
ईश्वर कण कण में विद्यमान है लेकिन कण कण ईश्वर नहीं है। ईश्वर सर्वत्र है उसको किसी एक गुफा में बैठा देना कहा की बुद्धिमानी है । आज का विज्ञानं का युग है और हिन्दू धर्म ऐसी अंधविस्वास के कारण बदनाम है और दुसरे लोग हमारा मजाक बनाते है।
मेरी बात से जो सहमत न हो तो वो इसका वैज्ञानिक विश्लेषण करवा सकते है। यदि शिवलिंग में इतनी शक्ति है तो भक्तो बी भीड़ या तापमान ज्यादा होने से क्यों पिघल जाता है।
दुनिया में हर जगह पहाड़ो पर जहा पर भी बर्फ पड़ती है वहा पहाड़ो पर बर्फ पड़ने से शिवलिंग के शक्ल के छोटे मोठे शिवलिंग के आकार के ऐसे बनते रहते है कोई छोटा तो कोई विशाल ,ये प्रकृति है जो हर मौसम में अपनी रूप आकार बदलता रहता है सूर्य की सतरंगी किरणे अपनी छटा पहाड़ो पर नदियों में , झरनो में बिखरती रहती है। इसको ईश्वर मानकर पूजना ईश्वर का तिरस्कार ,अवमानना है । धार्मिक भावना को सत्य तक ले जाना ही धर्म है।

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