रूस यूक्रेन युद्ध में दोनों देशों को कितना हुआ नुकसान

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गौतम मोरारका

रूस-यूक्रेन युद्ध को एक साल पूरा हो गया है। इस युद्ध ने दोनों देशों को बड़ा नुकसान पहुँचाया है। दोनों देशों के लगभग डेढ़ लाख सैनिक मारे गये हैं, यूक्रेन में बमबारी से हजारों इमारतें और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान जमींदोज हो चुके हैं, हजारों लोग मारे गये हैं, लाखों लोग यूक्रेन छोड़कर अन्य देशों में शरणार्थी जीवन जीने को मजबूर हो गये हैं, जिस युद्ध का परिणाम एक सप्ताह में ही निकल आने की उम्मीद थी वह एक साल तक खिंच चुका है और अभी यह पता नहीं है कि यह कितना लंबा खिंचेगा। देखा जाये तो यह युद्ध अब रूस और यूक्रेन के बीच का युद्ध रह ही नहीं गया है। बल्कि यह रूस और पश्चिमी देशों के बीच का युद्ध है जिसमें माध्यम की भूमिका यूक्रेन निभा रहा है। इस युद्ध से सिर्फ यही दो देश प्रभावित हुए हों, ऐसा नहीं है। इस युद्ध की वजह से सप्लाई चेन बाधित हुई है जिसका असर पूरी दुनिया झेल रही है। दुनिया भर में तेल, गैस और अन्य वस्तुओं की महंगाई बढ़ गयी है जिससे पहले ही महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्थाएं और दबाव झेलने को मजबूर हो गयी हैं।

युद्ध के परिदृश्य पर गौर करें तो यूक्रेन को सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि यूरोप के 27 नाटो राष्ट्र भी पूरी मदद दे रहे हैं। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन कीव के दौरे पर आये थे। उनसे पहले फ्रांस के राष्ट्रपति इम्नुएल मैक्रों, जर्मन चासंलर ओलफ शुल्ज, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और वर्तमान प्रधानमंत्री ऋषि सुनक भी कीव जाकर वोलोदोमीर जेलेंस्की की पीठ थपथपा चुके हैं और उन्हें अपना समर्थन जता चुके हैं।

देखा जाये तो इस युद्ध में अब तक जानमाल का सर्वाधिक नुकसान भले यूक्रेन को हुआ हो लेकिन प्रतिष्ठा का नुकसान सर्वाधिक रूस को हुआ है। रूसी सेना के हाथ से कई जीते हुए इलाके निकल गये, रूसी सेना की रणनीतियां कई मोर्चों पर नाकामयाब रहीं, रूसी सेना के बड़े-बड़े कमांडर युद्ध में मारे गये, युद्ध के बीच में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को सैन्य नेतृत्व में बदलाव तक करने पड़ गये, जो रूस दुनिया के कई देशों को हथियार देता है उसे ईरान और चीन से भी हथियार लेने पड़ें तो रूस के महाशक्ति होने पर सवाल उठेंगे ही।

वर्तमान में देखा जाये तो यूक्रेन का पलड़ा भारी बना हुआ है, भले ही रूस के सशस्त्र बलों ने हाल ही में दोबारा कुछ रफ्तार हासिल की हो। लेकिन आने वाले महीनों में कीव को दो प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। सबसे पहले उसे अपने स्वयं के आक्रामक अभियानों का संचालन करना होगा साथ ही उसे रूसी हमलों को झेलने के लिए पश्चिमी देशों के भारी हथियारों, लंबी दूरी की मारक क्षमताओं और संभवतः वायु शक्ति की आवश्यकता होगी। दूसरा, यूक्रेन को यह सुनिश्चित करने के लिए निरंतर अंतर्राष्ट्रीय सहायता और समर्थन की आवश्यकता होगी कि आर्थिक पतन के परिणामस्वरूप उसकी सामाजिक व्यवस्था नहीं टूटे और वह अपने महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को और अधिक नुकसान को कम करने में सक्षम हो सके।

इसके विपरीत, रूस को अपने सशस्त्र बलों के निराशाजनक प्रदर्शन को उलटना होगा। देखा जाये तो यूक्रेन के दक्षिण पूर्व में वुहलेदार पर हाल के रूसी हमले की विफलता पुतिन के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं है। देखा जाये तो रूस की पूरी जमीनी सेना का अनुमानित 80 प्रतिशत अब संघर्ष में शामिल है, साथ ही दसियों हज़ारों की संख्या में नई लामबंदी सामने आ रही है। ऐसे में सैन्य नेतृत्व के शीर्ष पर बैठे लोगों पर तेजी से परिणाम हासिल करने का दबाव बढ़ रहा है। माना जा रहा है कि व्लादिमीर पुतिन घरेलू मोर्चे पर कुछ बड़े फैसले लागू कर सकते हैं और चीन के इरादों को भी परख सकते हैं, क्योंकि वह मास्को को हथियारों की आपूर्ति करने पर विचार कर रहा है। 2023 में युद्ध के हालात यह भी तय करेंगे कि धमकियों के खिलाफ खड़े होने का पश्चिम का दृढ़ संकल्प वास्तव में कितना विश्वसनीय है। यह भी देखना होगा कि क्या पश्चिम हर लिहाज से कीव का समर्थन करने की दिशा में आगे बढ़ेगा या फिर सहायता में कमी करेगा।

वहीं दूसरी ओर यूक्रेन के राष्ट्रपति की बात करें तो वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की एक नायक के रूप में उभरे हैं। पिछले 12 महीनों में ज़ेलेंस्की की प्रतिष्ठा देश और विदेश दोनों में बदल गई है। हम आपको बता दें कि जब 100000 से अधिक रूसी सैनिक यूक्रेन पर आक्रमण करने के लिए तैयार थे, तो इस बड़े पैमाने के युद्ध के दौरान ज़ेलेंस्की की अपने देश का नेतृत्व करने की क्षमता के बारे में पश्चिम में व्यापक संदेह था। लेकिन यूक्रेन और ज़ेलेंस्की दोनों ने इस संघर्ष में अपने प्रदर्शन की पराकाष्ठा को पार कर लिया है। ज़ेलेंस्की ने न केवल यूक्रेन पर शुरुआती हमले का विरोध किया, बल्कि पिछले साल फरवरी से रूस द्वारा कब्जा किए गए 54% क्षेत्र को फिर से हासिल करने में भी वह कामयाब रहे हैं। पूरे युद्ध के दौरान ज़ेलेंस्की के व्यक्तिगत साहस और दृढ़ संकल्प के प्रदर्शन ने दुनिया भर में प्रशंसा हासिल की है। यहां तक कि अमेरिका के राष्ट्रपति भी कीव जाने और ज़ेलेंस्की के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए हवाई हमले का जोखिम उठाने को तैयार हो गए।

बहरहाल, देखा जाये तो युद्ध के दौरान जान और माल का नुकसान तो होता ही है, लेकिन उससे परे युद्ध विश्व की तस्वीर बदलने का काम भी करते हैं। युद्ध कुलों, संस्कृतियों और नेताओं के साथ-साथ समाजों और राज्यों के समग्र भाग्य को बदल देते हैं। 24 फरवरी, 2022 को अकारण आक्रमण के एक साल बाद, यूक्रेन अपने अस्तित्व के लिए लड़ाई लड़ रहा है और रूस इस बात से खुश है कि अगर वह यूक्रेन को जीत नहीं पाया तो उसे नष्ट कर देगा। अगर सवाल यह है कि यह युद्ध कब खत्म होगा तो इसका जवाब यह है कि यह युद्ध चलता रहेगा क्योंकि इससे पश्चिमी देशों की हथियार कंपनियों की चांदी जो हो रही है।

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