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इतिहास के पन्नों से हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

1857 की क्रांति के जनक थे स्वामी दयानंद जी महाराज

महर्षि दयानंद की 200 वी जयंती पर विशेष आलेख
गुजरात प्रांत की भूमि युगों युगों से महापुरुषों को पैदा करती आई है जिसनेअनेक महापुरुष भारत मां की गोद में रतन के रूप में प्रदान किए हैं।

भारतवर्ष का गुजरात प्रांत बहुत ही महत्वपूर्ण रहा है। जिसका क्षेत्रफल बहुत ही विस्तृत, विशाल और विशद था। वर्तमान का मध्य प्रदेश का बहुत सा क्षेत्रफल ,महाराष्ट्र का पर्याप्त क्षेत्रफल, राजस्थान का बहुत बड़ा भूभाग तथा वर्तमान पाकिस्तान के कराची के आसपास से लेकर पश्चिम एशिया के देशों तक फैला हुआ होता था।
द्वापर युग के अंत में जन्मे श्री कृष्ण जी महाराज ने मथुरा में जन्म अवश्य लिया था, परंतु उनकी कर्मभूमि द्वारका गुजरात थी। कृष्ण जी का राज्य शासन पश्चिम एशिया के देश अरब जगत तक फैला हुआ था। इसीलिए गुजरात से श्री कृष्ण जी का भी संबंध है। इसी गुजरात ने हमको 12 फरवरी सन 1824 में टन्कारा ग्राम में ब्राह्मण कुल में पिता श्री कृष्ण चंद्र तिवारी तथा माता अमृत बाई के घर में एक अमूल्य निधि मूल शंकर के रूप में ईश्वर ने प्रदान की थी।
गुजरात प्रांत की पावन एवं वीर प्रस्विनी भूमि ने ही हमको सरदार बल्लभ भाई पटेल जैसे महापुरुष को दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में एक अदम्य साहस का परिचय देते हुए 562 देसी रियासतों को एक झंडे के नीचे एकत्र करने का दुरुह कार्य किया था। जब एक षड्यंत्र के तहत स्वतंत्रता के पश्चात अंग्रेजों द्वारा तत्कालीन सभी रियासतों को स्वतंत्र छोड़ दिया गया था। ऐसे समय में नेहरू के साथ मतभेद होते हुए भी सीमित साधनों में देश पर बहुत बड़ा एहसान किया। नेहरू और गांधी की कुत्सित चालो में न फंस कर अपने कर्तव्य को जिन्होंने प्राथमिकता, प्रधानता और वरीयता दी। वह सच्चे अर्थों में सरदार महापुरुष भी गुजरात पावन धरा की देन है।
वर्तमान में भी गुजरात भारतवर्ष में एक महत्वपूर्ण भूमिका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में अदा कर रहा है।
गुजरात के ऐसे ही एक महापुरुष की आज पुण्यतिथि है। जिसका जन्म भी ऐसी परिस्थितियों में हुआ था जब भारत वर्ष परतंत्र था। जब भारतवर्ष में वेद की विद्या लुप्त हो चुकी थी। जब भारत वर्ष में पोप और पाखंडी अपने उदर पूर्ति में लगे हुए थे।
जब भारत वर्ष में पादरी और मुल्ला जनता का मूर्ख बनाकर धर्म परिवर्तन खुल्लम-खुल्ला करा रहे थे। जब मंदिरों पर मिट्टी के खिलौनों ने ,पत्थर की मूर्तियों ने कब्जा कर लिया था। जब पत्थर की मूर्तियों को पुजारियों ने उदर पूर्ति का अथवा जठराग्नि शांत करने का,धंधा बना लिया था। जब साधक और ईश्वर के मध्य बिचौलिए पैदा हो गए थे। जब पुराणों की कपोल कल्पित कहानियों को सुनकर लोग भ्रमित हो रहे थे। जब भारतवर्ष गहन अंधकार के गर्त में जा रहा था। जब भारतवर्ष में स्त्री शिक्षा पर रोक लगा दी गई थी। जब भारत में शूद्रों को विद्याध्यन से निषेध कर दिया गया था।
जब भारतवर्ष में स्त्री जाति का अपमान होता था। जब भारत वर्ष में स्त्री को पैरों की जूती के समान माना जाता था। जब विधवा स्त्री विवाह नहीं कर सकती थी।
जबकि पत्नी के स्वर्ग सिधारने पर विधुर पुरुष को शादी करने का अधिकार प्राप्त था।
ऐसे समय में समाज का उद्धार करने के लिए भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए जिस महापुरुष ने पदार्पण किया था, वह थे महर्षि दयानंद। जिन की आज पुण्यतिथि पर हम उनको विशेष स्मृति में रखते हुए उनके लिए निम्न प्रकार श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं।

1857 की क्रांति अथवा प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महर्षि दयानंद का योगदान।

1857 की क्रांति न केवल भारत के राष्ट्रीय इतिहास के लिए अपितु आर्य समाज जैसी क्रांतिकारी संस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण वर्ष है । इस समय भारत के उस समय के चार सुप्रसिद्ध संन्यासी देश में नई क्रांति का सूत्रपात कर रहे थे। इनमें से स्वामी आत्मानंद जी की अवस्था उस समय 160 वर्ष थी। जबकि स्वामी आत्मानंद जी के शिष्य स्वामी पूर्णानंद जी की अवस्था 110 वर्ष थी । उनके शिष्य स्वामी विरजानंद जी उस समय 79 वर्ष के थे तो महर्षि दयानंद की अवस्था उस समय 33 वर्ष थी।
बहुत कम लोग जानते हैं कि इन्हीं चारों संन्यासियों ने 1857 की क्रांति के लिए कमल का फूल और चपाती बांटने की व्यवस्था की थी ।
कमल का फूल बांटने का अर्थ था कि जैसे कीचड़ में कमल का फूल अपने आपको कीचड़ से अलग रखने में सफल होता है , वैसे ही हमें संसार में रहना चाहिए अर्थात हम गुलामी के कीचड़ में रहकर भी स्वाधीनता की अनुभूति करें और अपने आपको इस पवित्र कार्य के लिए समर्पित कर दें । गुलामी की पीड़ा को अपनी आत्मा पर न पड़ने दें बल्कि उसे एक स्वतंत्र सत्ता स्वीकार कर स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए साधना में लगा दें।
इसी प्रकार चपाती बांटने का अर्थ था कि जैसे रोटी व्यवहार में और संकट में पहले दूसरे को ही खिलाई जाती है , वैसे ही अपने इस जीवन को हम दूसरों के लिए समर्पित कर दें । हमारा जीवन दूसरों के लिए समर्पित हो जाए , राष्ट्र के लिए समर्पित हो जाए ,लोगों की स्वाधीनता के लिए समर्पित हो जाए। ऐसा हमारा व्यवहार बन जाए और इस व्यवहार को अर्थात यज्ञीय कार्य को अपने जीवन का श्रंगार बना लें कि जो भी कुछ हमारे पास है वह राष्ट्र के लिए है , समाज के लिए है , जन कल्याण के लिए है।

स्वतंत्रता का प्रथम उद्घोष।

अपने भारतभ्रमण के दौरान देशवासियों की दुर्दशा देख कर महर्षि इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पराधीन अवस्था में धर्म और देश की रक्षा करना कठिन होगा , अंगेजों की हुकूमत होने पर भी महर्षि ने निर्डर,निर्भय होकर उस समय जो कहा था , वह आज भी सत्यार्थप्रकाश में उपलब्ध है , उन्होंने कहा था ,
“चाहे कोई कितना ही करे, किन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है, वह सर्वोपरि उत्तम होता है। किन्तु विदेशियों का राज्य कितना ही मतमतान्तर के आग्रह से शून्य, न्याययुक्त तथा माता-पिता के समान दया तथा कृपायुक्त ही क्यों न हो, कदापि श्रेयस्कर नहीं हो सकता”
(महर्षि दयानंद के विषय में अनेक महापुरुषों के वचन अलग से पढ़े जा सकते हैं)

1857 से लेकर 1859 तक महर्षि दयानंद ने भूमिगत रहकर देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में विशेष योगदान दिया। इसके बाद 1860 में सार्वजनिक मंच पर दिखाई पड़े।
महर्षि दयानंद ने यह बात संवत 1913 अर्थात सन 1855 ई0 में हरिद्वार में उस समय कही थी, जब वह नीलपर्वत के चंडी मंदिर के एक कमरे में रुके हुए थे , उनको सूचित किया गया कि कुछ लोग आपसे मिलने और मार्ग दर्शन हेतु आना चाहते हैं , वास्तव में लोग क्रांतिकारी थे , उनके नाम थे —
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1.धुंधूपंत – नाना साहब पेशवा ( बालाजी राव के दत्तक पुत्र )
.2. बाला साहब .
3.अजीमुल्लाह खान .
4.ताँतिया टोपे .
5.जगदीश पुर के राजा कुंवर सिंह .
इन लोगों ने महर्षि के साथ देश को अंग्रेजों से आजाद करने के बारे में मंत्रणा की और उनको मार्ग दर्शन करने का अनुरोध किया ,निर्देशन लेकर ये सभी बलिदानी क्रांतिकारी अपने -अपने क्षेत्र में जाकर क्रांति की तैयारी में लग गए , इनके बारे में तो सभी जानते हैं।

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महर्षि और रानी लक्ष्मीबाई की भेंट

सन्‌ 1855 ई. में स्वामी जी हरिद्वार से मेरठ होते हुए फर्रूखाबाद पहुंचे। वहॉं से कानपुर गये और लगभग पॉंच महीनों तक कानपुर और इलाहाबाद के बीच लोगों को जाग्रत करने का कार्य करते रहे। यहॉं से वे मिर्जापुर गए और लगभग एक माह तक आशील जी के मन्दिर में रहे। वहॉं से काशी में कुछ समय तक रहे.।स्वामीजी के काशी प्रवास के दौरान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई उनसे मिलने गई .रानी ने महर्षि से कहा कि “मैं एक निस्संतान विधवा हूँ , अंग्रजों ने घोषित कर दिया है कि वह मेरे राज्य पर कब्ज़ा करने की तैयारी कर रहे हैं ,और इसके झाँसी पर हमला करने वाले हैं. अतः आप मुझे आशीर्वाद दीजिये कि मैं देश की रक्षा हेतु जब तक शरीर में प्राण हों फिरंगियों से युद्ध करते हुए शहीद हो जाऊँ ।
महर्षि ने रानी से कहा ,” यह भौतिक शरीर सदा रहने वाला नहीं है , वे लोग धन्य हैं जो ऐसे पवित्र कार्य के लिए अपना शरीर न्योछावर कर देते हैं , ऐसे लोग मरते नहीं बल्कि अमर हो जाते हैं , लोग उनको सदा आदर से स्मरण करते रहेंगे , तुम निर्भय होकर तलवार उठाओ। विदेशियों का साहस से मुकाबला करो।
1857 की क्रांति देश में कई महीने तक स्थान विशेष पर अलग-अलग तिथियों में चलती फैलती रही थी।
उसी क्रम में राजस्थान के कोटा शहर में क्रांतिकारियों ने बर्टन का सिर काटकर कोटा शहर में घुमाया और तोप से उड़ा दिया । इसके बाद सारे कोटा नगर पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया। महाराव गढ़ में अपने कुछ राजपूत सरदारों के साथ असहाय अवस्था में बंद हो गए।विद्रोहियों का कब्जा कोटा नगर 20 अप्रैल 1858 तक 6 माह रहा। महाराज की सेना अंग्रेजी सेना विद्रोहियों के मध्य अनेक लड़ाइयां होती रही। इससे पहले मार्च के महीने में चंबल की तरफ से अंग्रेजी सेना आ चुकी थी और महाराज ने कुछ राजपूत सरदारों को बुला लिया था ।तब 27 अप्रैल 1858 को कोटा पर फिर अंग्रेजों का कब्जा हो गया। अंग्रेजों ने अत्याचार और बढ़ा दिए । लड़ाई में अनेक विद्रोही नेता मारे गए और स्वतंत्रता सेनानियों में भगदड़ मच गई । अधिकतर के सिर कटवा दिए गए। लाला जयदयाल और मेहराब बचकर निकल गए थे। उन्हें मालवा और मध्य भारत की तरफ से गिरफ्तार करके कोटा लाया गया और आजादी के इन दीवानों को अंग्रेजी सरकार ने कोटा में मेहराव पर दबाव डालकर पोलिटिकल एजेंट की उपस्थिति में नयापुरा में फांसी लगाई । जहां अदालत के सामने चौराहे पर शहीद स्मारक बना हुआ है। सच ही तो है :–

जिनकी लाशों पर चलकर यह आजादी आई ।
उनकी याद लोगों ने बहुत ही गहरे में दफनाई।।

विक्टोरिया ब्रिटेन की रानी को जब भारत की रानी बनाया गया।
20 जून 1837 को विक्टोरिया ने यूके की क्वीन का ताज पहना था लेकिन एंप्रेस ऑफ इंडिया या केसर- ए- हिंद का ताज विक्टोरिया ने पहना था 1 मई 1876 को। परंतु इसके ठीक 8 महीने बाद दिल्ली में लगा था उसी का समारोह मनाने के लिए पहला दिल्ली दरबार।

1857 की क्रांति के बाद 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश सरकार ने भारत की सत्ता अपने हाथ में ले ली थी। 1874 में ईस्ट इंडिया कंपनी को भंग करने के बाद ब्रिटेन के तत्कालीन पी. एम. डिजरायली ने क्वीन विक्टोरिया को यह खिताब देने का प्रस्ताव रखा जो स्वीकार हुआ।
दिल्ली में अंग्रेजों के इस पहले दरबार जलसा_ ए_ केसरी को करने के पीछे मंशा थी कि भारत की जनता और राजाओं को अंग्रेजी राज्य की ताकत की झलक भव्य समारोह में दिखाई जाए। रानी को तो आना नहीं था लेकिन उनके नाम का ऐलान भारत की साम्राज्ञी (एंप्रेस ऑफ इंडिया) के तौर पर होना था। राजधानी कोलकाता में होने के बावजूद अंग्रेजों ने दरबार अगर दिल्ली में लगाया तो इसका मतलब है कि अंग्रेज मुगल गद्दी पर अपनी मोहर लगाना चाहते थे।सोने चांदी के स्पेशल मेडल ढलवाए गए। सोने के मेडल्स राजा व बड़े ब्रिटिश अधिकारियों के लिए और चांदी के मेडल छोटे अधिकारियों व अन्य गणमान्य व्यक्तियों के लिए। मेडल पर एक तरफ विक्टोरिया की तस्वीर, नाम और 1 जनवरी 1877 गुदा था तो दूसरी तरफ उर्दू में केसर_ ए हिंद तथा इंग्लिश में इंप्रेस ऑफ_ इंडिया और हिंदी में हिंद- का– कैसर गुदा हुआ था। इसका तात्पर्य अंग्रेजों का यह भी था कि मुगल साम्राज्य का जो सिक्का अभी तक चलता था, जिस पर एक तरफ मुगल बादशाह का नाम गुदा होता था, वह अब बंद कर दिया जाए।

इसीलिए 1857 में अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी के 100 वर्ष पूरे होने के जश्न मनाने की पूरी तैयारी कर रहे थे।
इस दरबार को आयोजित करने का जिम्मा थॉमस हेनरी थॉनर्टन को सौंपा गया था। यह आयोजन जिस जगह पर हुआ था उसे आज बुराड़ी रोड पर कोरोनेशन पार्क के नाम से जानते हैं ।
1903 और 1911 के दरबार भी यही हुए। कई अंग्रेजों की मूर्तियां आप यहां पर देख सकते हैं। 1911 में तो खुद किंग जॉर्ज पंचम क्वीन मैरी के साथ आए थे। पहले दरबार में कुल 68000 लोग मौजूद रहे। जिसमें ब्रिटिश ताकत दिखाने के लिए 15000 की तो केवल फौज ही थी।
वॉइस राय लिटल एवं गवर्नरों के अलावा 63 राजा नवाब इसमें शामिल थे। भोपाल की बेगम, कोल्हापुर महारानी के अलावा कश्मीर, हैदराबाद ,त्रावणकोर, रामपुर ,दरभंगा आदि के शासक भी थे ।उन लोगों के अलावा अन्य गणमान्य लोग भी थे। सेवकों का लाव लश्कर था ।हर राजा की हैसियत और रैन्क के हिसाब से उन्हें तोपों की सलामी दी गई ।फिर रानी का संबोधन अंग्रेजी उर्दू में पढ़कर सब को सुनाया गया। जिसमें रानी ने समानता, शिक्षा, रोजगार का समान अधिकार तथा अवसर देने, धार्मिक स्वतंत्रता में दखल न देने का वायदा किया। राज्यों का बिल आधा करने का भी वायदा किया गया ।सब ने रानी की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना की। राजाओं के गणमान्य नागरिकों को मेडल दिए गए। उनको उपाधियां दी गई। रानी की एक बड़ी सी पेंटिंग लगाई गई थी। कई राजाओं ने लिटन के साथ उस पेंटिंग का भी झुक कर अभिवादन किया था।

जब स्वामी दयानंद सरस्वती भी दिल्ली पहुंचे।

यही अनाधिकारिक रूप से कांग्रेस की नींव रखी गई। बाद में कांग्रेस देश का प्रमुख संगठन बनी। सार्वजनिक सभा के गणेश वासुदेव जोशी ने एक मांग रखी कि भारतीयों को भी अंग्रेजों की तरह राजनीतिक और सामाजिक दर्जा दिया जाए, जिसे अनसुना कर दिया गया ।इसी दौरान स्वामी दयानंद सरस्वती दिल्ली आ चुके थे ।इस मौके पर वह राजाओं के बीच आर्य समाज के प्रचार में इस्तेमाल करना चाहते थे। कश्मीर के राजा रणबीर सिंह से व शुद्धि आंदोलन के सिलसिले में मिलना चाहते थे, लेकिन मिलने नहीं दिया गया। हां इंदौर के तुकाराम होल्कर ने जरूर राजाओं के लिए स्वामी जी का प्रवचन कराने की कोशिश की ।पर राजा तो अंग्रेजों की मेहमान नवाजी में मस्त थे। स्वामी जी ने फिर सर सैयद अहमद खान ,मुंशी कन्हैयालाल अलखधारी ,नवीन चंद्र राय आदि को लेकर एक सर्वधर्म सभा करने में कामयाबी पाई।
यहां यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि जिस समय दिल्ली दरबार लग रहा था उस समय आधा भारत भयंकर अकाल से पीड़ित था और उस काल में 5500000 लोगों की मौत हो चुकी थी ।समारोह के खर्च से काफी जाने बच सकती थी ।
एक दौर आया जब विक्टोरिया की दिल्ली में एकलौती मूर्ति
दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट के एक कोने में पड़ी रही। कान्से की इस मूर्ति को इस समारोह की याद में बना कर चांदनी चौक में टाउन हॉल के पास लगाया गया था। आजादी के बाद वहां स्वामी श्रद्धानंद की मूर्ति लगाकर इसे कोरोनेशन पार्क में भेज दिया गया और फिर दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट में भेज दिया।

महर्षि दयानंद के कारण अंग्रेज चित्तौड़गढ़ नहीं ले पाए थे।

“भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आर्य समाज का योगदान” पुस्तक के विद्वान लेखक आचार्य सत्यप्रिय शास्त्री अपनी इस पुस्तक में प्रष्ठ संख्या 40 से 48 पर बड़ी महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए लिखते हैं कि जब स्वामी जी महाराज चित्तौड़गढ़ में थे और अंग्रेज गवर्नर जनरल भी चित्तौड़ आए हुए थे,यह घटना सन 1882 की है तो गवर्नर जनरल ने महाराजा सज्जन सिंह से कहा कि चित्तौड़ का किला आप सरकार को दे दें। इस पर महाराणा तो चुप रहे परंतु जब स्वामी दयानंद जी को इस बात का पता लगा तो उन्होंने उदयपुर के सरदारों को जो वहां इकट्ठे हुए थे बुलाकर समझाया कि बारी- बारी जाकर गवर्नर से मिलें और कहें कि चित्तौड़ का किला केवल महाराणा का ही नहीं है। इस पर राजपूतों का भी हक है । तथा सब की सहमति के बिना महाराणा को कोई हक नहीं है कि इसके विषय में कोई बातचीत करें। तब गवर्नर जनरल समझ गया कि हमारी मांग को नहीं मानते तो उन्होंने कहा कि मैंने वैसे ही महाराजा साहब से जिक्र किया था। हमने किला लेकर क्या करना है।
इस प्रकार चित्तौड़ को अंग्रेजो के कब्जे में जाने से महर्षि दयानंद की कूटनीति ने रोक लिया।

महर्षि दयानंद का चिंतन।

रेमजे मैकडोनाल्ड ने भारत का वास्तविक दर्शन पढ़ लिया था। महर्षि दयानंद जी के पश्चात ऋषि के अनुयायियों तथा मानने वालों ने जिन गुरुकुल़ो की स्थापना की उनका उठना बैठना ,खाना पीना ,सोना जागना सभी अपने देश तथा देशवासियों के लिए था ।उन्होंने शांति की खोज की परंतु क्रांति के साथ। उन्होंने शांति को क्रांति का और क्रांति को शांति का प्रतीक बना दिया था। उन्होंने शांति में मुक्ति का ,स्वतंत्रता का सनातन सत्य खोज लिया था। इसलिए उनकी शांति भी क्रांति और स्वतंत्रता प्रेमी थी ।इसी क्रांति में शांति और स्वतंत्रता प्रेमी भावना का विस्तार और विकास भारत में होते देखना चाहते थे ।पर इसमें अंग्रेज बाधक थे ।इसलिए उनका अंग्रेजों की विभेदकारी एवं दमनकारी नीतियों से लडना अनिवार्य था। वे जानते थे कि जहां लड़नाअनिवार्य हो जाता था वहीं से शांति का शुभारंभ हो जाता था। यह सारी देन महर्षि दयानंद के दिव्य चिन्तन की। जिन के विषय में देवेंद्र बाबू मुखोपाध्याय जी ने निम्न प्रकार लिखा है।
“इस सन्यासी के हृदय में वह प्रबल इच्छा और उत्साह था कि सारे भारतवर्ष में एक शास्त्र प्रतिष्ठित हो । एक देवता अर्थात परमपिता परमात्मा एक ईश्वर पूजित हो ।एक जाति संगठित हो और एक भाषा (हिंदी जिसका मूल रूप संस्कृत है वह ,)प्रचलित हो यही नहीं उन्हें केवल सदिच्छा और उत्साह ही था। वरन् वह इस इच्छा और उत्साह को किसी अंत तक इस कार्य में परिणत करने में भी कृतकार्य हुए थे ।अतः स्वामी दयानंद केवल सन्यासी ही नहीं थे ,केवल वेद व्याख्या ही नहीं थे, केवल शास्त्रों का मर्म उद्घाटन करने में ही निपुण नहीं थे ,केवल तार्किक ही नहीं थे, केवल दिग्विजय पंडित ही नहीं थे, वरन वह भारतीय एकता और जातीयता, राष्ट्रीयता के प्रतिष्ठाता भी थे ।इसलिए भारत की आचार्य मंडली में दयानंद का स्थान विशिष्ट एवं अद्वितीय है।
भाई परमानंद, डॉक्टर माणिकलाल बैरिस्टर, डॉक्टर चिरंजीव भारद्वाज, स्वामी भवानी दयाल ,स्वामी स्वतंत्रतानंद ,पंडित अमीचंद विद्यालंकार , गोपेंद्र नारायण ,स्वामी शंकराचार्य, जैसे राष्ट्रभक्तों को स्वामी जी के विचारों से प्रेरणा मिली।
जिन्होंने विदेशों में स्वतंत्रता की ज्योति को जलाए रखा।
विदेशों के अतिरिक्त देश के अंदर भी कोने कोने में आर्य समाजी सन्यासी वृंद और भजन उपदेशकों ने वेद धर्म की धूम मचा कर लोगों को देश की स्वतंत्रता के राष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। देश में राष्ट्रधर्म की ज्योति जगाने वाले आर्य समाजी सन्यासियों में स्वामी विश्वेश्वरानंद जी, स्वामी नित्यानंद जी, स्वामी दर्शनानंद जी ,स्वामी सत्यानंद जी,( जो पूर्व में जैनी गुरु थे )स्वामी सर्वानंद जी, स्वामी ओंकार सच्चिदानंद जी ,स्वामी अनुभवानंद जी, स्वामी मुनीश्वर आनंद जी ,पंडित गणपति शर्मा, स्वामी अच्युतानंद जी ,पंडित तुलसीराम स्वामी आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इस प्रकार आर्य समाज ने अध्यात्म वाद को पूर्ण राष्ट्रवाद की तरफ परिणत कर दिया था। महर्षि दयानंद की भूमिका महत्वपूर्ण प्राथमिक है।

अंतिम घड़ियां

जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह के दरबार में महर्षि दयानंद गए हुए थे। वहां एक वेश्या राजा के मन को अधिक भायी हुई थी । सन्यासी जो होते हैं वह राजाओं से बड़े होते हैं। इसलिए महर्षि दयानंद ने राजा को सन्मार्ग पर लाने के बहुत सारे प्रयास किए परंतु राजा का चाल चलन नहीं बदल सका । एक दिन वेश्या की पालकी को राजा ने जब कंधा दिया तो यह दृश्य देखकर ऋषि दयानंद को बहुत ही ग्लानि हुई। और उन्होंने राजा को यह कह दिया कि तुम एक शेर पुत्र होकर एक कुत्तिया पर मरते हो। इस बात को सुनकर वह वेश्या बदले की भावना से क्रोधित हो गई और उसने साजिश के तहत महर्षि के रसोइए पर दौलत बरसा दी तथा ऋषि को दूध में मिलाकर पारा दिलवा दिया गया। जो बहुत सारे उपचार के उपरांत भी ठीक नहीं हो पाए थे और अंत में दीपावली के दिन महर्षि दयानंद की आत्मा ईश्वर की विधि तथा व्यवस्था के अनुसार मोक्ष को प्राप्त हो गई थी।
दीपावली का पर्व महर्षि दयानंद की पुण्यतिथि के रूप में भी जाना जाता है। हृदय उनके लिए श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है।
शत शत नमन।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट चेयरमैन होता भारत समाचार पत्र

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