वेदों का स्वाध्याय सभी मनुष्यों का मुख्य कर्तव्य एवं परमधर्म

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ओ३म्

मनुष्यों के अनेक कर्तव्यों में से एक कर्तव्य वेदों के सत्यस्वरूप को जानना व उनका नियमित स्वाध्याय करना है। वेदों का स्वाध्याय मनुष्य का कर्तव्य इसलिये है कि वेद संसार का सबसे पुराना व प्रथम ज्ञान है। यह वेदज्ञान मनुष्यों द्वारा अपने पुरुषार्थ से अर्जित ज्ञान नहीं है अपितु सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न आदि ऋषियों को सर्वव्यापक ईश्वर से प्राप्त ज्ञान है जिसे ईश्वर ने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को उनके हृदय स्थित चेतन-आत्मा में प्रेरणा के द्वारा दिया गया था। अध्ययन करने पर पुष्टि होती है कि वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। इसके लिये ऋषि दयानन्द ने ‘‘सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ” में विस्तृत तर्क व युक्तियां दी हैं। इनका अध्ययन करने पर यह निश्चित होता है कि वेद मनुष्य की रचना नहीं अपितु ईश्वरीय ज्ञान है और जो ऋषि दयानन्द ने वेद ज्ञान के आविर्भाव के विषय में कहा है वह सर्वथा सत्य एवं प्रामाणिक है। सृष्टि की रचना अनादि व नित्य, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ एवं सर्वान्तर्यामी सत्ता परमात्मा ने सृष्टि में विद्यमान असंख्य वा अनन्त जीवों को सुख व बन्धनों से मुक्त कर आनन्द से परिपूर्ण मोक्ष प्रदान करने के लिये की है। परमात्मा ज्ञानस्वरूप है। वह सर्वज्ञ है। वह सृष्टि व ज्ञान विषयक प्रत्येक बात को सूक्ष्मता, व्यापकता व समग्रता से जानता है। उसका ज्ञान नैमित्तिक नहीं अपितु नित्य एवं अनादि है। हमारी यह जो सृष्टि दृष्टिगोचर होती है यह प्रवाह से अनादि है। ईश्वर इससे पूर्व अनन्त बार ऐसी सृष्टि की रचना कर चुके हैं और भविष्य में भी परमात्मा द्वारा इसी प्रकार से सृष्टि रचना व प्रलय का चक्र जारी रहेगा। ईश्वर द्वारा सृष्टि बनाने और अल्पज्ञान व अल्प बलयुक्त जीवों को सृष्टि की आदि काल में वेदों का ज्ञान देना उसका कर्तव्य निश्चित होता है। यदि ईश्वर आदि सृष्टि में ऋषियों के द्वारा मनुष्यों को ज्ञान न देता तो मनुष्य भाषा आदि का स्वमेव निर्माण न करने के कारण अद्यावधि अज्ञानी रहते। जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी से घड़ा बनाता है परन्तु मिट्टी को वह नहीं बनाता और न बना सकता है, उसी प्रकार मनुष्य ईश्वर प्रदत्त भाषा ‘वेदों की संस्कृत’ में विकार कर नई भाषा तो बना सकता है परन्तु आदि भाषा ‘वैदिक संस्कृत’, उसकी वर्णमाला, शब्द व पद तथा व्याकरण नियमों में निबद्ध भाषा को नहीं बना सकता। ईश्वर का कर्तव्य था कि वह सभी जीवों को जो मनुष्य व इतर योनियों मे अपने पाप-पुण्य कर्मों का फल भोग रहे हैं, उन्हें सृष्टि के आरम्भ काल से उन्हें भाषा व संसार में दुःखों से बचने व आनन्द की प्राप्ति का ज्ञान प्रदान करता जिससे वह अपना जीवन सुगमता से व्यतीत कर सकें। ईश्वर ने वस्तुतः ऐसा किया भी है। वेद ईश्वर प्रदत्त वही ज्ञान ही है।

मनुष्य का आत्मा चेतन पदार्थ है जिसमें ज्ञान ग्रहण करने तथा उसके अनुकूल व विपरीत कर्म करने की क्षमता है। ज्ञान से मनुष्य की उन्नति होकर उसे सुख प्राप्त होता है। अज्ञानी मनुष्य दुःख उठाता है और ज्ञानी मनुष्यों को देखकर स्वयं भी उनके जैसा बनना चाहता है। यह स्वाभाविक व प्राकृतिक प्रवृत्ति है। वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान होने से सर्वांश में सत्य एवं मनुष्यों के जानने योग्य व आचरण करने के योग्य है। वेदों का अध्ययन करने से ईश्वर, जीवात्मा तथा सृष्टि का ज्ञान होने सहित मनुष्यों को अपनी उन्नति करने की प्रेरणायें प्राप्त होती है। मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य मोक्ष है। मोक्ष दुःखों की सर्वथा निवृत्ति को कहते हैं और मोक्ष अवस्था प्राप्त होने पर वेद व ऋषियों के ग्रन्थों से इस पर जो प्रकाश पड़ता है उसके अनुसार मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर जन्म व मरण के दुःख व सुखरूपी बन्धनों से मुक्त होकर पूर्ण आनन्द की अवस्था को प्राप्त होता है। इसका रहस्य यह है कि ईश्वर आनन्दस्वरूप है जो कि दुःखों से सर्वथा रहित है। मोक्ष में जीवात्मा को ईश्वर का सान्निध्य, संगति व व्यापक-व्याप्य सम्बन्ध बना रहता है जिससे ईश्वर का आनन्द व ज्ञान जीवात्मा को सुलभ होने से वह पूर्ण आनन्द की अवस्था में रहता है। अतः वेदों से मोक्ष प्राप्ति की प्रेरणा व मोक्ष को प्राप्त करने के साधन यथा ईश्वर का ज्ञान, उसकी उपासना, सद्कर्म, परोपकार, देश व समाज की सेवा, यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान व समाधि द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार कर जीवात्मा जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है। इस मोक्ष की स्थिति को प्राप्त करने के लिये ही सृष्टि के आरम्भ से हमारे सभी ऋषि-मुनि-योगी आदि वेदानुकूल सत्कर्मों को करके मोक्ष की प्राप्ति में सचेष्ट, सावधान व प्रयत्नरत रहते थे। यह वेदज्ञान की ईश्वर की मनुष्यों को सबसे बड़ी देन कही जा सकती है।

वेदों का अध्ययन इस लिये करना भी आवश्यक है कि इससे हम अपनी आत्मा व इसके सत्यस्वरुप को यथार्थ रूप में जानने के साथ अपने अनादि-अनन्त माता-पिता व सृष्टिकर्ता को भी तत्वतः अर्थात् उसके यथार्थरूप में जान पाते हैं। वेदों के बिना ईश्वर, जीवात्मा और सृष्टि के यथार्थ स्वरूप को नहीं जाना जा सकता। यदि हम ईश्वर और जीवात्मा आदि को यथार्थस्वरूप में नहीं जानेंगे तो हमें ईश्वर की उपासना के महत्व व उसकी विधि का ज्ञान नहीं होगा जिससे हम इनसे होने वाले नाना प्रकार के लाभों व सुखों से वंचित हो जायेंगे। इसलिये भी वेदों व वैदिक साहित्य का अध्ययन करना प्रत्येक मनुष्य के लिए अत्यावश्यक है। वेदों का अध्ययन करने से हमें अग्निहोत्र-यज्ञ के स्वरूप तथा उसकी विधि का ज्ञान भी होता है। यज्ञ से मनुष्य अनजाने में होने वाले पापों से मुक्त होता है। यदि मनुष्य यज्ञ-अग्निहोत्र नहीं करेगा तो वह श्वास-प्रश्वास आदि से होने वाले वायु प्रदुषण सहित चूल्हे व चैके से होने वाले सूक्ष्म प्राणियों को दुःखों व प्रदुषण आदि से संबंधित पापों का निदान भी नहीं कर पायेगा। अन्य भी अनेक लाभ यज्ञ करने से होते हैं। वायु व वर्षा जल की शुद्धि से कृषि कार्यों को करके उत्तम अन्न की प्राप्ति यज्ञ-अग्निहोत्र से होती है। यज्ञ स्वास्थ्यवर्धक, रोगमुक्त करने सहित दीर्घायु प्रदान करने वाला होता है। यज्ञ से जड़ व चेतन देवों की पूजा सहित संगतिकरण एवं दान भी साथ-साथ होता है। यज्ञ अग्निहोत्र का स्वरूप तो अल्प होता है परन्तु उससे लाभ अनेक होते हैं जिससे हमें जन्म-जन्मान्तरों में अनेक सुखों की उपलब्धि होती है। यज्ञ विषयक अनेक ग्रन्थ उपलब्ध है जिसमें ‘यज्ञ-मीमांसा’ ग्रन्थ अत्यन्त लाभकारी है। यह ग्रन्थ वेदाचार्य आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार द्वारा रचित है जिसमें यज्ञ के प्रायः सभी पहलुओं पर सारगर्भित प्रकाश डाला गया है।

वेदाध्ययन करने से हम सृष्टि विषयक यथार्थ ज्ञान को प्राप्त होते हैं जिससे हम परजन्मों में पशु-पक्षियों आदि नीच योनियों में जन्म लेकर उनमें होने वाले दुःखों से बच जाते हैं। यदि हम वेदाध्ययन नहीं करेंगे तो हमें अपने कर्तव्य-अकर्तव्यों का ज्ञान नहीं होगा। ऐसी स्थिति में हम जो कर्म करेंगे उनका परिणाम परजन्म में नीच क्षुद्र दुःखों से पूरित योनियों में हमारा जन्म हो सकता है। जब हम वेद और ऋषियों के सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका सहित दर्शन एवं उपनिषद आदि ग्रन्थों को पढ़ते हैं तो यह हमारा शुभ कर्म होता है जिसका परिणाम सुख व उन्नति के रूप में प्राप्त होता है। वेदाध्ययन करने से हमारा ईश्वर प्रदत्त वैदिक-सत्य-धर्म वर्तमान एवं भावी युगो में भी सुरक्षित रहेगा जिससे कोटि-कोटि मनुष्यों को कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध होकर लाभ प्राप्त होगा। वेदाध्ययन से सात्विक प्रवृत्तियों का विस्तार होने सहित आसुरी प्रवृत्ति के विस्तार में बाधा उत्पन्न होगी। इससे मानव जाति को लाभ होगा अन्यथा आसुरी प्रवृत्तियों में वृद्धि से समाज व देश में अनेक हिंसात्मक प्रवृत्तियों में वृद्धि होकर सज्जन पुरुषों को अनेकानेक दुःख प्राप्त हो सकते हैं। वेदाध्यय व इसकी प्रवृत्ति का एक लाभ यह भी होगा कि लोग ईश्वर के स्वरूप व उपासना को जानकर ध्यान व समाधि प्राप्त करके ईश्वर का साक्षात्कार कर सकेंगे। यज्ञ आदि करके वायु व जल आदि की शुद्धि से संसार में सुखों की वृद्धि व रोगों का शमन होगा। लोग धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की प्राप्ति में कृतकार्य हो सकते हैं। वैदिक धर्म व संस्कृति का एक प्रमुख लाभ यह भी है कि इसमें लोग परस्पर सुख-दुःख बांटते हैं और किसी को विपत्ति व दुःख आ जाये तो तन-मन-धन से उसकी सहायता करते हैं। वेदाध्ययन से मनुष्य कर्म के महत्व को जानकर पाप कर्मों को करने से स्वयं को रोकेंगे। इससे वह दुःखों से बचेंगे और इसके प्रचार से अन्य सभी मनुष्यों को भी लाभ होगा।

आधुनिक युग में ऋषि दयानन्द सरस्वती (1825-1883) ने विलुप्त वेद और वेदज्ञान का पुनरुद्धार किया है। उन्होंने यजुर्वेद सम्पूर्ण तथा ऋग्वेद का आंशिक संस्कृत हिन्दी में भाष्य व भाषानुवाद भी किया है। अनेक आर्य विद्वानों ने भी ऋषि दयानन्द की वेदभाष्य पद्धति का अनुसरण करके अवशिष्ट तथा सभी वेदों पर हिन्दी में भाष्य किये हैं। ऋषि दयानन्द ने वेद विषयक ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका की रचना करने के साथ एक प्रमुख ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश की रचना भी की है। इस ग्रन्थ से वेदों का महत्व तथा वैदिक मान्यताओं, विचारधारा तथा सिद्धान्तों को समझने में सहायता मिलती है। सत्यार्थप्रकाश धर्म ग्रन्थ जैसा विश्व साहित्य में अन्य ग्रन्थ नहीं है। जिस मनुष्य द्वारा इसे पढ़ा जाता है उसका जीवन धन्य हो जाता है। इसे पढ़ने से पूर्व स्वयं को सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त रखना पड़ता है तभी इस ग्रन्थ का लाभ होता है। ऋषि दयानन्द जी ने इन ग्रन्थों सहित संस्कारविधि, आर्याभिविनय एवं अन्य अनेक वेद व्याकरण आदि वेदांग प्रकाश ग्रन्थों की भी रचना की है। यह सब वेदों के सत्य ज्ञान का प्रकाश करने कराने में सहायक एवं आवश्यक हैं। ऋषि दयानन्द के यह सभी ग्रन्थ वेदाध्ययन एवं मनुष्यमात्र का कल्याण करने में उनकी सबसे उत्तम देन हैं। संसार की अन्य सब सम्पत्तियां इन ग्रन्थों के सम्मुख तुच्छ है। वैदिक स्कालर पं. गुरुदत्त विद्यार्थी ने सत्यार्थप्रकाश को 18 बार पढ़कर कहा था कि इसे बार-बार पढ़ने पर नये-नये अर्थों का बोध होता है। यह ग्रन्थ इतना महत्वपूर्ण है कि यदि इसके लिए उन्हें अपनी सारी सम्पत्ति बेचनी पड़ती तो वह उसे बेच कर सत्यार्थप्रकाश को क्रय करते। सौभाग्यवश सत्यार्थप्रकाश के दो संस्करण उपलब्ध हैं। एक सन् 1875 में प्रकाशित आदिम सत्यार्थप्रकाश एवं दूसरा सन् 1884 में प्रकाशित संशोधित संस्करण है। दोनों ही महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। ऋषि दयानन्द जी के सभी ग्रन्थों का अध्ययन कर वेदाध्ययन से होने वाले सभी लाभों को प्राप्त किया जा सकता है। स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, पं. लेखराम, महात्मा हंसराज तथा स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती जी आदि का जीवन इस ग्रन्थ को पढ़कर ही बना था। हम अपनी बुद्धि के अनुसार वेदाध्ययन के महत्व व लाभों के बारे में लिख चुके हैं। पाठकों को वेदाध्ययन कर लाभान्वित होना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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