आखिर मोटे अनाज की ओर क्यों लौट रहे हैं लोग ?

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रवि शंकर

देश और दुनिया में मोटे अनाजों को बढ़ावा दिया जा रहा है। हाल ही में मोटे अनाज को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए संसद में मिलेट्स फूड फेस्टिवल का आयोजन किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद रहे। बड़े-बड़े होटलों से लेकर संसद के मेन्यू तक में इसे शामिल किया गया है। मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को मिलेट ईयर (मोटा अनाज वर्ष) घोषित किया है, जिसका प्रस्ताव भारत ने ही रखा था।

अरसे बाद जब ये सुपरफूड के रूप में विदेशों से लौटे और धनाढ्य वर्ग की थाली की शोभा बढ़ाने लगे, तो इनके प्रति दिलचस्पी बढ़ी। सरकार भी इनके उत्पादन के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रही है। मोटे अनाज की कैटिगरी में ज्वार, बाजरा, रागी (मंडुआ), जौ, कोदो, सामा, बाजरा, सांवा, कुटकी, कांगनी और चीना जैसे अनाज आते हैं। सवाल यह है कि भारत सहित दुनिया के देश मोटे अनाज की खेती पर जोर क्यों दे रहे हैं? असल में, मोटापा, दिल की बीमारियों, टाइप-2 डायबीटीज, कैंसर से पीड़ित लोगों को डायटीशियन मोटे अनाज को अपने भोजन में शामिल करने की सलाह देते हैं। इनमें कई गुना अधिक पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसीलिए मोटे अनाज को सुपर फूड भी कहा जाता है। मोटे अनाज में फाइबर ही नहीं, विटामिन-बी, जिंक, आयरन, मैग्नीशियम और कई तरह के एंटीऑक्सिडेंट्स पाए जाते हैं। मोटे अनाजों से बने उत्पाद- बेबीफूड, बेकरी, ब्रेकफास्ट आदि बेचकर चीन मोटी कमाई कर रहा है। यह तब है जब वह दुनिया का मात्र 9 फीसदी ही मोटा अनाज पैदा करता है।

मोटे अनाज में बढ़ रही है दिलचस्पी

एक समय मोटे अनाज की चपाती, इडली, डोसा बनाए जाते थे। आधुनिक किस्म के स्नैक्स और प्रचलित स्वाद के अनुसार मोटे अनाज की खपत बढ़ाई जा सकती है। ऐसे में मोटे अनाज पर आधारित प्रोसेस्ड फूड की इकाइयों में व्यापक स्तर पर निवेश करना फायदेमंद हो सकता है। मोटे अनाज की खेती देश के गरीब किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं। इसमें महंगे रासायनिक खाद और कीटनाशकों की जरूरत नहीं पड़ती। मोटे अनाज देश के पर्यावरण के लिए भी अनुकूल हैं। हाल के वर्षों में मोटे अनाजों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसके उत्पादक किसानों को अपनी उपज का बेहतर दाम भी मिल रहा है।

मोटे अनाजों की फसलें प्रतिकूल मौसम को भी झेल सकती हैं। अच्छी फसल के लिए ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है। भारत में तो हजारों साल से ये अनाज भोजन का अनिवार्य हिस्सा रहे हैं। हमारी पीढ़ी जो पांच-छह दशक पहले बड़ी हो रही थी, उनमें से बहुतों ने बचपन में ज्वार, बाजरा, जौ, मक्का की चूल्हे पर सिंकी स्वादिष्ट रोटियां खूब खाई हैं। बाजरे की खिचड़ी, घी मिलाकर बनाए इसके लड्डू, समा के चावल भी भोजन का हिस्सा रहे हैं। गेहूं की रोटी में भी चने का आटा मिलाकर खाया जाता था, जिसे मिस्सा आटा कहते थे।

वैश्विक स्तर पर मोटे अनाज के उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी है। भारत ने कुछ मोटे अनाजों को हजारों साल पहले अपना लिया था। इनका जिक्र प्राचीन वैदिक साहित्य में भी मिलता है। यजुर्वेद में प्रियंगव, श्याम-मक्का और अनवा का उल्लेख है। लेकिन हरित क्रांति के बाद गेहूं और धान जैसे अनाजों की पैदावार में भारी इजाफा हुआ। नतीजतन मोटे अनाज की खेती के प्रति किसानों का रुझान घटता चला गया। बहरहाल, गेहूं-चावल की बढ़ी हुई पैदावार का हमारे परंपरागत खान-पान की आदतों पर भी बहुत प्रभाव पड़ा।

केन्द्र सरकार की तरफ से किसानों को मोटे अनाज की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि ज्यादा उत्पादन हो और मोटा अनाज हर वर्ग की पहुंच में आ जाए। केंद्र सरकार ने बाजरा सहित संभावित उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने और पोषक अनाजों की सप्लाई चेन की मुश्किलों को दूर करने के लिए पोषक अनाज निर्यात संवर्धन फोरम का गठन किया है।

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