Categories
हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

ऋषि निर्वाण दिवस पर युगपुरुष स्वामी दयानन्द सरस्वती को कोटि-कोटि नमन !

(ऋषि निर्वाण दिवस)

पावन पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !
एवं

क) संक्षिप्त जीवन-परिचय

स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म- नाम मूलशंकर था। उनका जन्म 12 फरवरी 1824 में टंकारा ( काठियावड़, मौरवी राज्य– गुजरात) में हुआ। उनके पिता श्रीकर्षणजी तिवाड़ी, शिवभक्त औदीच्य ब्राह्मण थे। सन् 1834 में मूलशंकर ने पिता के आदेश पर, शिवरात्रि का व्रत रखा। अर्ध रात्रि में चूहों को मूर्ति पर चढ़े प्रसाद को खाते देख कर, उनका मूर्ति पूजा में विश्वास टूट गया और उन्होंने सच्चे शिव को पाने की ठान ली।

वे 22 वर्ष की आयु में सच्चे शिव की खोज में घर छोड़ कर चले गए। उन्होंने 24 वर्ष की आयु में दाक्षिणात्य दण्डी स्वामी पूर्णानन्द जी ने सन्यास की दीक्षा ली। गुरु महाराज ने उनका नाम स्वामी दयानन्द सरस्वती घोषित किया।

तत्पश्चात स्वामी दयानन्द ने योगी ज्वालानन्दगिरि जी महाराज तथा योगी शिवानन्दगिरि जी महाराज से क्रिया समेत पूर्ण योग विद्या प्राप्त की।

स्वामी जी ने सन् 1860 – 63 में प्रज्ञाचक्षु गुरु विरजानन्द से वेद एवं संस्कृत व्याकरण की शिक्षा प्राप्त की। गुरु ने दक्षिणा में शिष्य दयानन्द से आजीवन वेद तथा आर्ष ग्रथों के प्रचार-प्रसार का प्रण लिया जिसे उन्होंने प्राणों की बलि देकर निभाया।

वेद प्रचार के लिए यजुर्वेद भाष्य, ऋग्वेद भाष्य ( ७ मण्डल सूक्त ६१ मंत्र २ तक), ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, सत्यार्थ प्रकाश, संस्कार विधि आदि कालजयी ग्रंथ हैं।

वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु , उन्होंने 10 अप्रैल 1875 को आर्य समाज की स्थापना की जिसने राष्ट्र निर्माण तथा देश की स्वतन्त्रता के लिए सराहनीय कार्य किया।

स्वामी दयानन्द को उदयपुर राजमहल में जगन्नाथ मिश्र नामक रसोईये ने 29 सितम्बर को दूध में विष मिलाकर पिलया जिससे उनका स्वास्थ्य विगड़ गया। अन्ततः अजमेर में दीपावली के दिन 30 अक्टूबर 1883 को ओ३म् का उच्चारण करते हुए प्राण त्याग दिए और निर्वाण को प्राप्त हुए।

ख) स्वामी दयानन्द को महर्षि क्यों कहा जाता है ?

मुनि यास्ककृत निरुक्त के अनुसार : ” ऋषयो मन्त्रद्रष्टार:” अर्थात् जो वेद मंत्रों के अर्थों का साक्षात्कार करते हैं, उनकी व्याख्या करते हैं, वे ऋषि हैं।

स्वामी दयानन्द ने वेद के मंत्रों की उत्कृष्ट व्याख्या की जिसकी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करते हुए योगी अरविन्द ने अपनी पुस्तक ” वेदों का रहस्य ” में लिखा : ” दयानन्द ने हमें ऋषियों के भाषा- रहस्य को समझने का सूत्र दिया है तथा वैदिक धर्म के मूलभूत सिद्धान्त को रेखांकित किया कि विविध नामों वाले देवता एक ही सत्ता( ईश्वर) की विविध शक्तियों को दर्शाते हैं । “

इस संदर्भ में, स्वामी दयानन्द “मन्त्रद्रष्टा” होने से महर्षि कहलाते हैं।

इसके अतिरिक्त ऋग्वेद (10.26.5) का मंत्राश है :
” ऋषि: स यो मनुर्हित:” ।
अर्थात् ऋषि वही है जो मानवमात्र का हितैषी हो।

स्वामी दयानन्द ने दलितों के प्रति अमानवीय छुआछूत, विधवाओं के प्रति दुर्व्यवहार, सती प्रथा आदि कुप्रथाओं के उन्मूलन के लिए समाज को जागृत किया।

स्वामी जी का देहान्त उनके रसोईए जगन्नाथ द्वारा दूध में विष मिला कर देने से हुआ। जब आभास हुआ कि उन्हें विष दिया गया है, उन्होंने रसोईए को बुलाया। उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। स्वामी जी ने कहा : जगन्नाथ तुम नहीं जानते तुम ने कितनी भारी क्षति की है। मेरी चारों वेदों के भाष्य की इच्छा पूरी नहीं हो पाईं। तत्पश्चात् स्वामी जी ने उसे कुछ पैसे दिए और नेपाल भाग जाने की सलाह दी। जगन्नाथ अश्रुपूर्ण क्षमायाचना व धन्यवाद सहित पेसे ले कर चला गया।

जब सुकरात को विष पिलाया गया तथा ईसामसीह को सूली पर लटकाया गया, उन्होंने दुष्कर्मियों को यह कह कर क्षमा कर दिया कि ये नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। परन्तु स्वामी दयानन्द क्षमादान में इन महापुरुषों से भी आगे चले गए।

अपने हत्यारे पर भी दया करने वाले, उसका हित करने वाले, उसे जीवनदान देने वाले, स्वामी को महर्षि सम्बोधित करना, अनुचित है ?

इस के अतिरिक्त उनके क्रांतिकारी विचारों के लिए, उन्हें 17 बार विष दिया गया जो उन्होंने योग क्रिया से निरस्त कर दिया। कई बार उन पर जानलेवा हमले किए गये , परन्तु वे वेदविहित सिद्धान्तों के प्रचार प्रसार में अडिग रहे।

पाॅल रिचर्ड ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है :

” स्वामी दयानन्द निसंदेह एक ऋषि थे। उन्होंने अपने विरोधियों द्वारा फेंके गए ईद – पत्थरों को शांतिपूर्वक सहन कर लिया। उन्होंने अपने में महान् भूत और भविष्य को मिला दिया। वह मर कर भी अमर हैं। ऋषि का प्रादुर्भाव भारत को कारागार से मुक्त कराने और जाति बंधन तोड़ने के लिए हुआ था । ऋषि का आदेश है ” आर्यावर्त ! उठ, जाग, अब समय आ गया है , नए युग में प्रवेश कर , आगे बढ़।”

ग) स्वतन्त्रता संग्राम में महर्षि दयानन्द का योगदान :

महर्षि दयानन्द सरस्वती उच्च कोटि के राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने देश को एकजुट करने के लिए हिन्दी भाषा को अपनाने का आह्वान किया। मातृभाषा गुजराती होते हुए तथा संस्कृत भाषा के प्रकाण्ड पंडित होते हुए , उन्होंने वेदों का भाष्य तथा अपने कालजयी ग्रन्थ ‘ सत्यार्थप्रकाश ‘ एवं ‘ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ‘ का लेखन हिन्दी भाषा में किया। जन सामान्य को सम्बोधित करने वाले कार्यक्रमों के दौरान वे राजा – महाराजाओं के निवास पर रहते थे, तथा उन्हें वेद और मनुस्मृति के आधार पर राजधर्म का उपदेश दिया करते थे एवं स्वराज्य के लिए प्रेरित किया करते थे। सत्यार्थप्रकाश के अष्टम समुल्लास में उन्होंने लिखा है :

” कोई कितना ही करें परन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है, वह सर्वोपरि उत्तम होता है।”

i) लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक —

” ऋषि दयानन्द जाज्वल्यमान नक्षत्र थे जो भारतीय आकाश पर अपनी आलौकिक आभा से चमके और गहरी निद्रा में सोए हुए भारत को जागृत किया। ‘ स्वराज्य ‘ के वे सर्वप्रथम संदेशवाहक तथा मानवता के उपासक थे। “

ii) अनन्तशयनम् अय्यंगार —

” गांधीजी राष्ट्र के पिता थे तो महर्षि दयानन्द सरस्वती राष्ट्र के पितामह थे। महर्षि हमारी राष्ट्रीय प्रवृत्ति और स्वाधीनता-आंदोलन के आद्य प्रवर्तक थे। गांधीजी उन्हीं के पद-चिन्हों पर चले। “
“यदि महर्षि दयानन्द हमें मार्ग न दिखाते, तो अंग्रेजी शासन में उस समय सारा पंजाब मुसलमान बन जाता और सारा बंगाल ईसाई हो जाता। महर्षि जी ने सारे विश्व को “आर्य” बनाने की प्रेरणा दी। “

iii) विट्ठलभाई पटेल ( सरदार पटेल के बड़े भाई ; संस्थापक स्वराज्य पार्टी ) :

” बहुत-से लोग महर्षि दयानन्द को सामाजिक और धार्मिक सुधारक कहते हैं परन्तु मेरी दृष्टि में तो वे सच्चे राजनैतिक थे ; 40 वर्ष से कांग्रेस का जो कार्यक्रम रहा है, वह सब कार्यक्रम आज से 60 वर्ष पूर्व ऋषि दयानन्द ने देश के सामने रखा था। सारे देश में एक भाषा, खादी, स्वदेशी – प्रचार, पंचायतों की स्थापना, दलितोद्धार, राष्ट्रीय और सामाजिक एकता, उत्कट देशाभिमान तथा स्वराज्य की घोषणा, यह सब महर्षि दयानन्द ने देश को दिया है। वर्तमान कांग्रेस का प्रत्येक अंश भगवान् दयानन्द ने ही बनाया है। सचमुच हम भाग्यहीन थे। यदि 60 वर्ष पहले, इस कार्यक्रम को समझ कर आचरण किया होता, तो भारतवर्ष कब का स्वतन्त्र हो गया होता। “

घ) वेदोद्धारक दयानन्द

स्वामी दयानन्द के वेद भाष्य के सम्बन्ध में योगी अरविन्द घोष एक निबंध (वैदिक मैग्ज़ीन लाहौर 1916 ) में लिखते हैं : ” दयानन्द की इस धारणा में कि वेद में धर्म और विज्ञान में दोनों सच्चाईयां पाई जाती हैं, कोई उपहासास्पद वा कल्पित बात नहीं। ….. वैदिक व्याख्या के विषय में मेरा विश्वास है कि वेदों की सम्पूर्ण अन्तिम व्याख्या कोई भी हो, दयानन्द को यथार्थ निर्देशों का प्रस्तुतकर्ता का सम्मान दिया जाएगा।…. दयानन्द ने उन दरवाज़ों की कुञ्जी ढूंढी है जिसे काल ने बन्द कर रखा था; तथा बन्द पड़े स्रोत की मोहरों को तोड़ कर फैंक दिया। “

सायण, महिधर आदि भारतीय भाष्यकारों तथा मैक्समूलर आदि पाश्चात्य विद्वानों के भाष्यों ने वेदों के उद्दात्त स्वरूप को विकृत कर दिया। अनेक-ईश्वरवाद, देवी- देवताओं का पृथक अस्तित्व, मूर्तिपूजा, यज्ञों में गाय, अश्व आदि पशुओं की बलि, गोमांस भक्षण आदि का वेदों का वर्णन बता कर, इन भाष्यों ने जन मानस में वेद के प्रति अनास्था पैदा कर दी।

महर्षि दयानन्द ने अपने वेद भाष्य में इसका अन्त:साक्ष्यों ( Internal Evidences ) से इनका खण्डन किया और वेद को सब सत्य विद्याओं का पुस्तक घोषित किया। उन्होनें वेदों में भौतिक विज्ञान, नाव ( Ship), विमान ( Aeroplane) निर्माण विद्या का वर्णन बताया है। “समुद्रं गच्छ”, “अन्तरिक्ष गच्छ” अर्थात् समुद्र में जाओ , अन्तरिक्ष में जाओं का स्पष्ट वर्णन है।

स्वामी दयानन्द के वेद भाष्य के सम्बन्ध में योगी अरविन्द घोष एक निबंध (वैदिक मैग्ज़ीन लाहौर 1916 ) में लिखते हैं : ” दयानन्द की इस धारणा में कि वेद में धर्म और विज्ञान में दोनों सच्चाईयां पाई जाती हैं, कोई उपहासास्पद वा कल्पित बात नहीं। ….. वैदिक व्याख्या के विषय में मेरा विश्वास है कि वेदों की सम्पूर्ण अन्तिम व्याख्या कोई भी हो, दयानन्द को यथार्थ निर्देशों का प्रस्तुतकर्ता का सम्मान दिया जाएगा।…. दयानन्द ने उन दरवाज़ों की कुञ्जी ढूंढी है जिसे काल ने बन्द कर रखा था; तथा बन्द पड़े स्रोत की मोहरों को तोड़ कर फैंक दिया। “

प्रो.मैक्समूलर तथा स्वामी दयानन्द समकालीन थे। उनका परस्पर संस्कृत में पत्र- व्यवहार होता था। स्वामी जी उन्हें ” मोक्ष मूलर ” सम्बोधित करते थे। स्वामी दयानन्द की ” ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ” पढ़ कर उनका हृदय-परिवर्तन हो गया है । उन्होंने भी स्वीकार कर लिया कि ये इन्द्र आदि ईश्वर के ही नाम हैं। अपने व्याख्यान- संग्रह ‘ भारत हमें क्या शिक्षा दे सकता है ? ‘ में कहते हैं :

” वे ( इन्द्र आदि देवता ) सभी परा को अभिव्यक्त करते हैं, दृश्य के पीछे अदृश्य, सान्त के भीतर अनन्त, लौकिक के ऊपर अलौकिक, दिव्य, सर्वव्यापक तथा सर्वशक्तिमान। “

डं) समाज सुधारक दयानन्द

महर्षि दयानन्द सरस्वती वेद को ही भारतीय संस्कृति और वर्ण-आश्रम समाज व्यवस्था का आधार मानते हैं। कालांतर में वैदिक विचारधाराओं से विमुख होने पर , कुरीतियों तथा कुप्रथाओं ने समाज को घेर लिया। इन में प्रमुख हैं : जन्मना जात-पात, स्त्रियों और शूद्रों को शिक्षा से वंचित रखना, सती प्रथा, विधवा विवाह निषेध, बाल विवाह, दहेज प्रथा, मृतक माता-पिता का श्राद्ध इत्यादि।

स्वामी जी ने वेदों , मनुस्मृति आदि सद्ग्रन्थों के प्रमाणों से, शास्त्रार्थों के माध्यम से, इनका खण्डन किया तथा अपने ग्रंथ ‘सत्यार्थप्रकाश’ में इनका वेद प्रतिपादित यथार्थ स्वरूप उजागर किया।

वर्णव्यवस्था

उन्होंने शास्त्रों से प्रमाणित किया कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का निर्धारण कर्म पर आधारित है न कि जन्म पर। शिक्षा- दीक्षा के उपरान्त आचार्य शिष्य के वर्ण का निश्चय करता है।

स्कन्ध पुराण में भी कहा गया है ” जन्मना जायते शूद्र: संस्कारात् द्विज उच्यते।”
अर्थात् जन्म से सभी शूद्र पैदा होते हैं, संस्कार से/ शिक्षा – दीक्षा के उपरान्त मनुष्य द्विज बनता है। आचार्य उसे दूसरा जन्म देता है, इसलिए वह द्विज कहलाता है।

भगवद्गीता में भी कहा गया है :
” चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:”
अर्थात् मैंने गुण और कर्मों के अनुसार चार वर्णों की रचना की है। यहां जन्म का उल्लेख नहीं है।

मनुस्मृति में वर्णों की अदला- बदली का वर्णन इस प्रकार किया गया है :

“शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चेति शूद्रताम् ।

अर्थात् शुभ कर्मो से शूद्र ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर लेता है और बुरे कर्मों से ब्राह्मण शूद्र बन जाता है।

जन्मना जाति प्रथा ने जो देश की क्षति की है, वह अवर्णनीय है। हिन्दुओं का ईसाई तथा इस्लाम मत में धर्मान्तरण का सबसे बड़ा कारण यही है।

स्वामी जी ने स्त्री शिक्षा निषेध का घोर विरोध किया तथा वेदों के प्रमाणों से इसे अवैदिक प्रथा घोषित किया। हर वेद के मंत्र के आगे इसके ऋषि एवं देवता का उल्लेख होता है। बीसियों मंत्रों के आगे ऋषिकाओं का उल्लेख है। क्या वे बिना शिक्षा तथा वेदाध्ययन के ऋषिकाएं बन गईं ?

स्त्री शिक्षा

उपनिषदों में गार्गी, मैत्रेयी आदि विदुषियों की आध्यात्मिक चर्चा का वर्णन है। क्या वे बिना शिक्षा लिए आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा कर पाती थीं ?

अथर्ववेद का मन्त्र है :
” ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्।”
अर्थात् कन्या ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करके, वेदादि शास्त्रों को पढ़ कर युवा पति को प्राप्त करे।

विवाह संस्कार में श्रौतसूत्र का विधान है :
” इयं मन्त्रं पत्नी पठेत् “
अर्थात् यह मन्त्र पत्नी पढ़े। क्या बिना शिक्षा लिए कन्या मंत्र पढ़ सकती थी ?

इस प्रकार स्वामी जी ने स्त्रियों के लिए शिक्षा के द्वार खोले। आज कन्याएँ वेदाध्ययन करती हैं तथा महिलाएं उच्च शिक्षा प्राप्त करके प्रतिष्ठित पदों पर आसीन हैं।

स्वामी जी के इस उपकार का वर्णन करते हुए, 1975 में, आर्यसमाज के शताब्दी उत्सव पर तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी ने कहा था , ” यदि स्वामी दयानन्द ने स्त्री शिक्षा आन्दोलन न चलाया होता, तो मैं आज देश की प्रधानमंत्री न होती। “

पितृश्राद्ध

दिवंगत माता- पिता आदि का पितृपक्ष में ब्राह्मणों को खाना खिलाना, दान देना आदि श्राद्ध कर्म कहलाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धाभाव से किया गया कार्य। स्वामी जी ने कहा है कि जीवित माता- पिता की सेवा करना ही सच्चा श्राद्ध है। मृत्यु उपरान्त उनकी स्मृति में किया गया कोई भी दान आदि शुभ कार्य आपका पुण्य है, जिसका फल आपको मिलेगा, आपके दिवंगत माता- पिता को नहीं। यह समझना कि पितृपक्ष में ब्राह्मणों या अनाथों को खिलाया हुआ खाना, या दिया हुआ दान, आपके दिवंगत माता पिता व अन्य पितरों के पास पहुँच जाएगा, भ्रमित धारणा है।

हम भी तो पूर्व जन्म में किसी के माता पिता थे। वे भी तो पितृपक्ष में हमारे लिए श्राद्ध कर्म कर रहे होंगे। किसी को पितृपक्ष में किसी भी दिन उदरपूर्ति की अनुभूति हुई ?

स्वामी दयानन्द के समाज-सुधार की सूची काफ़ी लम्बी है। स्थानाभाव के कारण अधिक विवरण सम्भव नहीं।

प्रतिष्ठित महानुभावों की स्वामी दयानन्द को श्रद्धाञ्जलियां :

i) सरदार वल्लभ भाई पटेल —

” स्वामी दयानन्द जी के राष्ट्र प्रेम के लिए मुझे उनके प्रति आदर है।… हमारे समाज में उस समय जो जो त्रुटियाँ, कुरीतियां, वहम, अज्ञानता और बुराइयां थी, स्वामी जी ने उनको दूर करने के लिए बल लगाया। यदि स्वामी जी न होते तो हिन्दू समाज की क्या हालत होती, इसकी कल्पना भी कठिन है। आज देश में जो भी कार्य चल रहे हैं , उनका मार्ग स्वामी जी वर्षों पूर्व बना गए थे। शताब्दियों में ऐसे विरले महापुरुष मिलते हैं। समाज में जब बुराइयां घर कर जाती हैं , तब ईश्वर ऐसी विभूतियों को भेजता है।”

“यदि आर्य समाज 1938-39 में निज़ाम हैदराबाद में सत्याग्रह नहीं करता, तो हैदराबाद स्वतन्त्र भारत का अंग कदापि न बन पाता ।”

ii) राजगोपालाचार्य —

स्वामी दयानन्द की शिक्षाएं महान् हैं। वे हिंदुत्व में स्थायी स्थान प्राप्त कर चुकी हैं। स्वामी जी की शिक्षाओं को अपनाने से हिंदुत्व परिपक्व होगा। स्वामी जी को हिंदुत्व का उद्धारक कहा जा सकता है। “

iii) वीर सावरकर —

” महर्षि दयानन्द स्वाधीनता – संग्राम के सर्वप्रथम योद्धा और हिन्दूजाति के रक्षक थे। महर्षि जी का लिखा अमर ग्रन्थ ‘ सत्यार्थ प्रकाश ‘ हिन्दूजाति की रगों में उष्ण – रक्त का संचार करने वाला है । ‘ सत्यार्थ प्रकाश ‘ की विद्यमानता में, कोई विधर्मी अपने मज़हब की शेख़ी नहीं मार सकता।”

iv) पट्टाभि सीतारमैय्या ( कांग्रेस अध्यक्ष ) —

” स्वतन्त्रता संग्राम में 80% लोग आर्य समाजी थे।”

निष्कर्ष

तत्कालीन राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने कहा था कि स्वामी दयानन्द की समाज-सुधार की सभी कार्ययोजनाओं को संविधान में समाहित किया गया है।

इतना ही नहीं, पौराणिकों ने भी आर्य समाज के कार्यक्रमों को अपना लिया है : जैसे मुसलमानों की शुद्धि करके पुनः हिन्दू धर्म का आलिंगन ( घर वापसी ) , विधवा विवाह, बालिकाओं / महिलाओं की शिक्षा, सती प्रथा का बहिष्कार, बाल-विवाह से परहेज़, दलित-आदिवसी जिन्हें वे अछूत कहते थे, उनसे मेल-मिलाप, वैवाहिक व सामान्य जीवन में जन्मना जातिप्रथा में शिथिलता इत्यादि।

पौराणिक धीरे-धीरे आर्यसमाज के पथ पर चल रहे हैं। पाखण्डवाद के प्रति भी वे जागरूक हो रहे हैं।

देश व समाज के प्रति स्वामी दयानन्द सरस्वती के योगदान के लिए ,उनके निर्वाण दिवस पर कोटि कोटि नमन।
………………
विद्यासागर वर्मा
पूर्व राजदूत
……………..

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betpark giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
mavibet giriş
mavibet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betorder giriş
mavibet giriş
mavibet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
timebet
timebet
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
realbahis giriş
realbahis giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
vaycasino
vaycasino giriş
gobahis giriş
gobahis giriş
vdcasino giriş
pusulabet giriş
betorder giriş
betorder giriş
ikimisli
ikimisli
ikimisli
hititbet giriş
hititbet giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betplay
betplay
hititbet giriş
hititbet giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
meritking giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş