सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 27 ( ख ) तैंतीस कोटि देव

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तैंतीस कोटि देव

जो ‘त्रयसिंत्रशतिंत्रशता०’ इत्यादि वेदों में प्रमाण हैं इस की व्याख्या शतपथ में की है कि तेंतीस देव अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य्य और नक्षत्र सब सृष्टि के निवास स्थान होने से आठ वसु। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और जीवात्मा ये ग्यारह रुद्र इसलिये कहाते हैं कि जब शरीर को छोड़ते हैं तब रोदन कराने वाले होते हैं। संवत्सर के बारह महीने बारह आदित्य इसलिये हैं कि ये सब की आयु को लेते जाते हैं। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार 34 वां देव परमपिता परमेश्वर अर्थात महादेव ही है।
उसी परम पिता परमेश्वर महादेव की स्तुति प्रार्थना और उपासना करनी चाहिए। जो व्यक्ति उस परमपिता परमेश्वर को नित्य घ्याता है उसकी आत्मा का बल बढ़ता है और उसके भीतर निर्भयता का गुण विकसित होता जाता है। संसार के बड़े से बड़े तूफान भी उसका मार्ग अवरूद्ध नहीं कर पाते हैं । वह निर्भय होकर आगे बढ़ता जाता है । परमपिता परमेश्वर का सामीप्य उसे हर पल अनुभव होता रहता है।
स्वामी जी महाराज ने इस समुल्लास के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया है कि परमपिता परमेश्वर को संसार में किसी भी काल में अवतार लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह निराकार रूप में ही संसार का संचालन करता है और संसार में उपद्रव मचाने वाले आतंकी लोगों का विनाश करता है। ईश्वर जगत में व्याप्त होने के कारण इसका संचालक है। उससे डरकर अन्यायपूर्वक किसी के धन को हड़पने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। ईश्वर सब के पूर्व विद्यमान सब जगत के स्वामी के रूप में सदा वर्तमान रहता है। वह सनातन जगतकारण और सब धनों का विजय करने वाला और दाता है।

      अहम ब्रह्मास्मि का भावार्थ

उस परमपिता परमेश्वर को हमें वैसे ही पुकारना चाहिए जैसे पिता को संतान पुकारती है। यह हमारे लिए इसलिए भी आवश्यक है कि परमपिता परमेश्वर परमैश्वर्यवान सूर्य के सदृश सब जगत का प्रकाशक है । वह कभी भी पराजय को प्राप्त नहीं होता और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता है। स्वामी जी महाराज लिखते हैं कि “मैं (ईश्वर) परमैश्वर्य्यवान् सूर्य के सदृश सब जगत् का प्रकाशक हूं। कभी पराजय को प्राप्त नहीं होता और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता हूं। मैं ही जगत् रूप धन का निर्माता हूं। सब जगत् की उत्पत्ति करने वाले मुझ ही को जानो। हे जीवो ! ऐश्वर्य प्राप्ति के यत्न करते हुए तुम लोग विज्ञानादि धन को मुझ से मांगो और तुम लोग मेरी मित्रता से अलग मत होओ।”

हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ।।

यह यजुर्वेद का मन्त्र है-

“हे मनुष्यो! जो सृष्टि के पूर्व सब सूर्य्यादि तेजवाले लोकों का उत्पत्ति स्थान, आधार और जो कुछ उत्पन्न हुआ था, है और होगा उसका स्वामी था, है और होगा। वह पृथिवी से लेके सूर्य्यलोक पर्यन्त सृष्टि को बना के धारण कर रहा है। उस सुखस्वरूप परमात्मा ही की भक्ति जैसे हम करें वैसे तुम लोग भी करो।”
ईश्वर के संबंध में स्वामी जी महाराज की वेद अनुकूल मान्यता है कि वह सर्वांतर्यामी है , सर्वव्यापक है। यदि परमपिता परमेश्वर किसी एक देश में रहता तो सर्वांतर्यामी, सर्वज्ञ, सर्वनियंता, सबका स्रष्टा, सबका धर्त्ता और प्रलय कर्ता नहीं हो सकता था।
ईश्वर को स्वामी जी महाराज दयालु और न्यायकारी भी मानते हैं।
कुछ लोगों ने “अहम ब्रह्मास्मि” कहकर जीव और ईश्वर को एक ही मानने की भूल की है। अपनी इस प्रकार की भ्रांतिजनक मानसिकता और मान्यता को इस प्रकार की सोच रखने वाले लोगों ने भरपूर प्रचार प्रसार दिया है। जिससे अनेक जनों को भ्रान्ति का शिकार होना पड़ गया है।
इससे भारतीय इतिहास की दिव्य वैदिक परंपरा भी कहीं ना कहीं प्रभावित हुई है। इसके विषय में स्वामी जी महाराज ने सत्यार्थ प्रकाश के इस समुल्लास के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि यद्यपि जीव और ईश्वर दोनों चेतन हैं पर ईश्वर सृष्टि का सर्जक, पालक और संहारक भी है। जबकि जीव इस प्रकार के काम करने में सर्वथा असमर्थ है। जीव को स्वामी जी महाराज परिच्छिन्न अर्थात सीमित कहकर परिभाषित करते हैं, जबकि परमात्मा को वह विभु अर्थात सर्व व्यापक और सर्वशक्तिमान कहकर परिभाषित करते हैं। परमपिता परमेश्वर को कभी भी शरीर धारण करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह निराकार है और निराकार रहकर ही जगत का पालन ,पोषण, वृद्धि – विकास और संहार कर रहा है।
ईश्वर के संबंध में सर्वशक्तिमान् शब्द का यही अर्थ है कि ईश्वर अपने काम अर्थात् उत्पत्ति, पालन, प्रलय आदि और सब जीवों के पुण्य पाप की यथायोग्य व्यवस्था करने में किञ्चित् भी किसी की सहायता नहीं लेता अर्थात् अपने अनन्त सामर्थ्य से ही सब अपना काम पूर्ण कर लेता है। यदि परमपिता परमेश्वर को अपने कार्यों में किसी और की सहायता लेनी पड़े तो फिर वह सर्वशक्तिमान नहीं हो सकता। सर्वशक्तिमान वही हो सकता है जो अपने काम अपने आप करे।

ईश्वर की स्तुति-

वह परमात्मा सब में व्यापक, शीघ्रकारी और अनन्त बलवान् जो शुद्ध, सर्वज्ञ, सब का अन्तर्यामी, सर्वोपरि विराजमान, सनातन, स्वयंसिद्ध, परमेश्वर अपनी जीवरूप सनातन अनादि प्रजा को अपनी सनातन विद्या से यथावत् अर्थों का बोध वेद द्वारा कराता है। यह सगुण स्तुति अर्थात् जिस-जिस गुण से सहित परमेश्वर की स्तुति करना वह सगुण; (अकाय) अर्थात् वह कभी शरीर धारण व जन्म नहीं लेता, जिस में छिद्र नहीं होता, नाड़ी आदि के बन्धन में नहीं आता और कभी पापाचरण नहीं करता, जिस में क्लेश, दुःख, अज्ञान कभी नहीं होता, इत्यादि जिस-जिस राग, द्वेषादि गुणों से पृथक् मानकर परमेश्वर की स्तुति करना है वह निर्गुण स्तुति है। इस से फल यह है कि जैसे परमेश्वर के गुण हैं वैसे गुण, कर्म, स्वभाव अपने भी करना। जैसे वह न्यायकारी है तो आप भी न्यायकारी होवे। और जो केवल भांड के समान परमेश्वर के गुणकीर्तन करता जाता और अपने चरित्र नहीं सुधारता उसका स्तुति करना व्यर्थ है।
स्वामी जी की मान्यता है कि वेद में शाश्वत, सर्व कल्याणकारी, लोकोपकारी, सार्वकालिक ज्ञान अंतर्निहित है। जिसको ग्रहण करने से मनुष्य का अपना कल्याण तो होता ही है, साथ ही वह संसार के कल्याण में भी सहायक हो जाता है। ऐसे जन संसार में अपने जीवन को धन्य कर जाते हैं। जब शिक्षा मनुष्य को संसार के साथ-साथ परम पिता परमेश्वर से भी जोड़ने में सहायक हो जाती है तो वह शिक्षा अत्यंत पवित्र होने के कारण ज्ञान विज्ञान में परिवर्तित हो जाती है। ऐसी शिक्षा को पाकर व्यक्ति संसार में रहकर भी कीचड़ में कमल के समान रहता है।

कर्मशील जीवन जीते रहो

अपने कामों को परमपिता परमेश्वर के भरोसे छोड़ कर निकम्मा, आलसी और प्रमादी नहीं होना चाहिए। कर्मशील जीवन जीते रहने का संकल्प हमको लेना चाहिए। भारत में जब मूर्ति पूजा का प्रचलन प्रबलता से बढ़ा तो लोग अकर्मण्य, आलसी, प्रमादी हो गए। उन्होंने सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि देश गुलाम हो गया। हमें सात्विक भावों को अपनाकर सात्विक प्रार्थना के माध्यम से अपने जीवन की उन्नति करने के प्रति सतत संघर्षशील रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त संसार के कल्याण के लिए भी अपने आप को समर्पित करके चलना चाहिए। परमपिता परमेश्वर से लोक कल्याणकारी बुद्धि की प्रार्थना हमें नित्य प्रति करनी चाहिए। उससे कहना चाहिए कि आप प्रकाशस्वरूप हैं, कृपा कर मुझ में भी प्रकाश स्थापन कीजिये। आप अनन्त पराक्रम युक्त हैं इसलिये मुझ में भी कृपाकटाक्ष से पूर्ण पराक्रम धरिये। आप अनन्त बलयुक्त हैं इसलिये मुझ में भी बल धारण कीजिये। आप अनन्त सामर्थ्ययुक्त हैं, मुझ को भी पूर्ण सामर्थ्य दीजिये। आप दुष्ट काम और दुष्टों पर क्रोधकारी हैं, मुझ को भी वैसा ही कीजिये। आप निन्दा, स्तुति और स्वअपराधियों का सहन करने वाले हैं, कृपा से मुझ को भी वैसा ही कीजिये।
हे परमगुरो परमात्मन्! आप हम को असत् मार्ग से पृथक् कर सन्मार्ग में प्राप्त कीजिये। अविद्यान्धकार को छुड़ा के विद्यारूप सूर्य को प्राप्त कीजिये और मृत्यु रोग से पृथक् करके मोक्ष के आनन्दरूप अमृत को प्राप्त कीजिये। अर्थात् जिस-जिस दोष वा दुर्गुण से परमेश्वर और अपने को भी पृथक् मान के परमेश्वर की प्रार्थना की जाती है वह विधि निषेधमुख होने से सगुण, निर्गुण प्रार्थना। जो मनुष्य जिस बात की प्रार्थना करता है उस को वैसा ही वर्त्तमान करना चाहिये अर्थात् जैसे सर्वोत्तम बुद्धि की प्राप्ति के लिये परमेश्वर की प्रार्थना करे उस के लिये जितना अपने से प्रयत्न हो सके उतना किया करे। अर्थात् अपने पुरुषार्थ के उपरान्त प्रार्थना करनी योग्य है।
परम पिता परमेश्वर से कभी भी अपने ही लाभ की प्रार्थना नहीं करनी चाहिए। वेद के शाश्वत ज्ञान का हमें लाभ लेना चाहिए क्योंकि वेद का यह ज्ञान सभी लोगों का भला करने वाला है। वेद की शिक्षा परम पवित्र शिक्षा है । जिसके ग्रहण करने से जीवन में भी पवित्रता का आभास स्पष्ट झलकने लगता है।
स्वामी जी महाराज ने इसी समुल्लास के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया है कि वेद की भाषा किसी देश या विशेष जाति की भाषा नहीं है अपितु यह मानव मात्र की भाषा है। वेद की इसी भाषा अर्थात संस्कृत से ही संसार की समस्त भाषाओं का जन्म हुआ है। संस्कृत भारत के इतिहास को ऊर्जा प्रदान करती है। उसको जीवंतता और सार्थकता का बोध कराती है और भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मजबूती प्रदान करती है। हमें, स्वामी जी की संस्कृत भक्ति को संस्कृति भक्ति के रूप में देखना चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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