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इतिहास के पन्नों से

भारतीय इतिहास में ब्रिटेन की जालसाजी

विचित्र भारतीय इतिहासकार, जो संस्कृत नहीं जानते लेकिन प्राचीन इतिहास लिख देते हैं।
वैदिक भाषा नहीं जानते लेकिन आर्य आगमन पर दृढ़ हैं।
पशुपति कह देंगे लेकिन उसे शिव कहते ही चिढ़ जाते हैं।
अरबी, फ़ारसी और हिब्रू नहीं जानते लेकिन एक स्वर से कुरान को सही सही व्याख्या कर लेते हैं।
आईने अकबरी और फतवा आलमगीरी नहीं पढ़ी लेकिन मुगल हिस्ट्री के मास्टर हैं।
12 राशियों, नक्षत्रों और खगोलीय पिंडों के नाम जानते हैं लेकिन गणना को समझना नहीं चाहते।
इनके कुछ विचित्र निष्कर्ष-

1.प्राचीन मुद्रा देखते ही किसी राजा के पूरे वंश तथा कालक्रम का पता चलता है, भले ही उस राजा को पता न रहा हो।

2.पुराने से पुराना मन्दिर और पुरानी ईंट मिलते ही वह गुप्त काल की हो जाती है।

3.सिन्धु घाटी के खिलौनों को लिपि मान कर उसे कम से कम १५ प्रकार से पढ़ा जा चुका है। और पढ़ते पढ़ते गलती से भी कोई पौराणिक या वैदिक प्रतीक से संगति बैठे तो तुरंत यह पढ़ी नहीं जा सकती की घोषणा की जाती है।

4.सिंधु घाटी में प्राप्त अश्व की आकृति को घोड़ा नहीं माना जायेगा, अन्य चाहे जो पशु मान सकते हैं।

  1. विश्व की सभी स्क्रिप्ट पढ़ समझ ली केवल मुद्रित वेद पुराण पढ़ने में कठिनाई होती है।

6.भारत के हर गाँव में पञ्चाङ्ग देखने तथा पालन करने वाले हैं। किन्तु भारत के इतिहासकारों ने अभी तक शक या संवत्सर का नाम नहीं सुना है।

7.इतिहासकारों के अनुसार ग्रीक इतिहासकारों को पता था कि सिकन्दर आक्रमण के ३२६ वर्ष बाद इस्वी सन आरम्भ होने वाला है! जाsss दू ss…!

8.वराहमिहिर भी अपनी मृत्यु के ८३ वर्ष बाद आरम्भ हुए शालिवाहन शक का प्रयोग कर रहे थे।😊😊😊

  1. हर ज्योतिष सम्मेलन में कहा जाता है कि ज्योतिष कालविधान शास्त्र है। पर काल निर्णय के लिए ज्योतिषी उन अशिक्षित इतिहासकारों की नकल करते हैं जिन्होने अभी तक संवत्सर का नाम नहीं सुना है।
  2. युधिष्ठिर, शूद्रक, श्रीहर्ष, शालिवाहन, चेदि, आदि सभी के वर्षों को शक कहा गया है। पर शक वर्ष को शक जाति से जोड़ दिया गया है।

11.शालिवाहन शक को कुषाण जाति का बना कर उसका राजा कनिष्क को कर दिया जो कश्मीर में १२९२-१२७२ ईपू में शासक था (राजतरंगिणी, तरंग १)

12.अंग्रेजों के उपदेश के अनुसार ये सभी कल्पनायें सच हैं, पर भारत के सभी इतिहास, पुराण, रामायण, महाभारत, राजतरंगिणी आदि झूठे हैं।

13.भारत से बाहर २००० वर्ष से पुराना कोई कैलेण्डर नहीं है, पर वहाँ के लेखक ७००० वर्ष पुरानी तिथि देते थे (मेगास्थनीज)।

14.भारत में पिछले ३१,००० वर्षों से कैलेण्डर चल रहे है। यदि भारतीय तिथि नहीं देते थे तो कैलेण्डर क्यों बने थे? (मने इनको समझ में नहीं आया मतलब किसी को नहीं आया!)

  1. वराहमिहिर की जन्म तिथि दिखाने पर एक स्वर से विरोध हुआ कि उन्होंने अपनी मृत्यु तिथि क्यों नहीं दी?

भारतीय इतिहास में ब्रिटेन की जालसाजी

१. बेरोसस (सुमेरिया, ३०० ईपू.)-हेरोडोटस आदि ग्रीक लोगों को अपने इतिहास का पता नहीं है। वे ग्रीस की प्रशंसा में झूठी कहानियां लिखते रहते हैं। असीरिया के बारे में भी लिखा कि नबोनासर (लवणासुर) ने अपने पूर्व के सभी अवशेष नष्ट कर दिये थे जिससे लोग उसी को प्रथम महान् राजा समझें।
२. अल बरुनी-प्राचीन देशों की कालगणना (English translation-Chronology of Ancient Nations-page 44)-शत्रु सदा अपने पक्ष की गलती तथा अपराधों को छिपाते हैं तथा अपनी प्रशंसा करते हैं। मित्र को दोष नहीं दीखता, घृणा में केवल पाप दीखता है।
३. अंग्रेजी शासन के आरम्भ में बंगाल के २ जज विलियम जोन्स तथा एरिक पार्जिटर ने लगान वसूली के लिये बर्बर अत्याचार कर १ करोड़ लोगों की हत्या न्याय के नाम पर करवायी तथा पुराणों को तथा इतिहास को विकृत किया। उनकी क्रूर हत्या का वर्णन बंकिम चन्द्र चटर्जी के आनन्द मठ उपन्यास में है तथा ब्रिटिश संसद को दी गयी रिपोर्ट में भी है।
४. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में १८३१ ई. में बोडेन पीठ की स्थापना की गयी जिसका लिखित उद्देश्य था-भारत का झूठा इतिहास लिख कर वैदिक सभ्यता को नष्ट कर इसाइयत का प्रचार करें। इसके लिए मैक्समूलर, म्यूर, मैकडोनेल, कीथ, वेबर आदि ने तथा उनके शिष्यों राधाकृष्णन् आदि ने बहुत काम किया।
अंग्रेजों की जालसाजियों का सारांश स्वामी प्रकाशानन्द की पुस्तक में है-
इस पुस्तक का प्रकाशन होते ही स्वामी प्रकाशानन्द सरस्वती पर ८४ वर्ष की आयु में मिशनरियों ने उन पर बलात्कार का केस किया। पर उस केस के पूरा होने के पहले ही उनकी मृत्यु हो गयी। आचार्य रजनीश पर भी नया बाइबिल लिखने के कारण जेल में डाला गया था।
कुछ मिथ्या प्रचार
१. भारतीय भी विदेशी-अंग्रेजों की तरह भारतीय लोग भी विदेशी हैं।
२. मेगास्थनीज, हेरोडोटस, एरियन आदि सभी ग्रीक लेखकों ने लिखा है कि भारत एकमात्र देश है, जहां कोई भी बाहर से नहीं आया है। Indika (McCrinDle Edition)-Fragment 1-Para 38.
३. भारत के या अन्य किसी देश के किसी साहित्य में यह नहीं लिखा है कि आर्य लोग बाहर से आये। आर्य किसी जाति का नाम नहीं है, बड़े को या पितामह को आर्य (आजा) कहते हैं। अतः भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर खुदाई आरम्भ की। आज तक कोई लिपि नहीं मिली है, बच्चों के कुछ खिलोनों को कहा कि यह सिन्धुघाटी की लिपि है। उसे अभी तक कोई पढ़ नहीं पाया, पर उसे ठीक मानते हैं। भारत के जिन पुराणों को लोग ५००० वर्षों से पढ़ कर समझते आये हैं, वे गलत हैं। ३०१४ ई.पू. में जनमेजय ने तक्षशिला के नागराजा द्वारा पिता की हत्या का बदला लिया और उनके २ नगरों को श्मशान बना दिया। उनके नाम हो गये-मोइन-जो-दरो (मुर्दों का स्थान), हड़प्पा (हड्डियों का ढेर)। जहां पर जनमेजय ने नागों को पराजित किया वहां गुरु गोविन्द सिंह जी ने एक राम मन्दिर बनवाया और उनके नरसंहार की कहानी लिखी। इसके प्रायश्चित के लिए जनमेजय ने २७-११-३०१४ ई.पू. में ५ स्थानों पर भूमिदान दिया जब पुरी में सूर्य ग्रहण दिया था। वे दानपत्र मैसूर ऐण्टिकुअरी के जनवरी १९०० के अंक में प्रकाशित हुए थे। २००६ में सानफ्रांसिस्को के सम्मेलन में सभी की जांच हुई तथा उस दिन सूर्यग्रहण को सही पाया। केदारनाथ मन्दिर की भूमि उसी दान में है।
Astronomical Dating of Events & Select Vignettes from Indian History, Volume I,
Edited and compiled by Kosla Vepa, Published by-
Indic Studies Foundation, 948 Happy Valley Rd., Pleasanton, Ca 94566, USA
४. भारत के हर भाग के कुछ विशेष वैदिक शब्द हैं। जैसे पूर्व के लोकपाल इन्द्र के शब्द ओड़िशा, असम से लेकर वियतनाम, इण्डोनेसिया में ही व्यवहार होते हैं। शिव के शब्द केवल काशी में हैं। वराह के शब्द तेलुगू, तमिल में हैं। वरुण के शब्द महाराष्ट्र से अरब तट तक हैं। यदि आर्य पश्चिम उत्तर से आते, तो पंजाब, सिन्ध, अफगानिस्तान में भी ये प्रचलित होते।
५. अभी तक यह पता नही चला है कि एशिया या यूरोप के किस स्थान से कब और क्यों आर्य भारत आये। पर वे भले ही मंगल से आये हों, भारत के नहीं हो सकते-यह अंग्रेज भक्तों का विचार है।
मिथ्या प्रचार-२
१.
२.
३. वेद की वैज्ञानिकता सिद्ध करने के लिए गायत्री मन्त्र ही पर्याप्त है। उसमें ३ या ७ लोकों का नाम लेते हैं। ३ स्तरों पर ३-३ लोकों का नाम तभी हो सकता है, जबकि आकाश के सभी रचनाओं का आकार और रूप का पता हो।
४. वेद तथा पुराणों में दूरी तथा समय की जो माप दी गयी है, उनमें कुछ को अभी तक नहीं मापा जा सका है-सौर मण्डल का आकार, ब्रह्माण्ड का अक्ष भ्रमण काल, दृश्य जगत् (तपः लोक) का आकार।
५. राष्ट्रपति बनते ही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय तथा तिरुपति संस्कृत विद्यापीठ के संस्कृत विद्वानों को हटाने तथा प्रकाशन बन्दकराने के लिए राधाकृष्णन् ने ३ अध्यादेश जारी किये थे जिनको भारत के मुख्य न्यायाधीश हिदायतुल्ला ने असभ्य और अशिक्षित कह कर निरस्त कर दिया था। (AIR 1059 1961 SCR (3) 380 10/01/1961 HIDAYATULLAH, M. KAPUR, J.L. SHAH, J.C.)
शास्त्रों में जालसाजी
१. भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व ४, अध्याय २२ में जोड़ा गया कि हनुमान् इंगलैण्ड के थे जिनको राम ने आशीर्वाद दिया था कि कलियुग में उनके वंशज भारत पर राज्य करेंगे।
२. ब्रह्म सूत्र के गोविन्द भाष्य (१७३०) के आरम्भ में गरुड़ पुराण को उद्धृत कर लिखा गया कि भागवत पुराण के ४ उद्देश्य थे-ब्रह्मसूत्र का अर्थ, महाभारत के विवादों का निर्णय, गायत्री मन्त्र की व्याख्या, वेद को स्पष्ट करना। यह वेद-पुराण को समझने के लिए आवश्यक था, अतः १७८० में विलियम जोन्स की एसियाटिक सोसाइटी ने इसे गरुड़ पुराण से निकाल दिया। इस काम को आगे बढ़ाते हुए दयानन्द सरस्वती ने १८६६ में भागवत खण्डनम् लिखा।
३. स्कन्द पुराण, उत्कल खण्ड, अध्याय ३३ में रथयात्रा से सम्बन्धित २ श्लोक कठोपनिषद् (२/२/२), ऋग्वेद (४/४०/५), के वामन तत्त्व की व्याख्या करते थे। इनका उल्लेख १८९० के वाचस्पत्यम् तथा शब्द कल्पद्रुम कोषों में है। वर्तमान उपलब्ध संस्करणों में वे नहीं हैं।
४. इन्दौर में १९३० के पञ्चाङ्ग समिति की रिपोर्ट में चन्द्र गति में सूर्य आकर्षण के कारण संशोधन के ८ श्लोक उद्धृत हैं, जो वर्तमान संस्करण में नहीं हैं।
५. परीक्षित जन्म के १५०० वर्ष बाद नन्द का अभिषेक हुआ था। पार्जिटर ने १५०० वर्ष को १०५० कर दिया (तावद् वर्ष सहस्रं च ज्ञेयं पञ्चशतोत्तरम् को पञ्चाशतोत्तरम् किया)।
६. राजतरंगिणी में कलि वर्ष २५ में लौकिक संवत् का आरम्भ लिखा था, जब युधिष्ठिर का देहान्त हुआ। उसे गायब कर बुह्लर ने अपना श्लोक लगाया, पर अन्य उद्धरण से यह पता चल जाता है।
कलैर्गतैः सायक नेत्र वर्षैः युधिष्ठिराद्याः त्रिदिवं प्रयाताः। इसमें युधिष्ठिर के बदले सप्तर्षि कर दिया जो पहले ही से आकाश में हैं।
७. आर्यभट के काम को ग्रीक हिप्पार्कस की नकल् दिखाने के लिए उनका समय ३६० कलि के बदले ३६०० कलि कर दिया। हिप्पार्कस ने कभी ज्या सारणी नहीं बनायी थी न ग्रीक अंक पद्धति में वह बन सकती है। बिना मूल के उसकी नकल कैसे?
८. इससे यह परम्परा आरम्भ हो गयी है कि किसी भी पुस्तक के उस अंश को क्षेपक कह कर निकाल दें जो हमारे उद्देश्य के विपरीत है।
मिथ्या प्रचार-केवल विदेशी लेखक ठीक हैं
१. मेगास्थनीज की इण्डिका में २ अध्याय तथा हेरोडोटस के इतिहास में १ अध्याय है, जिनके अनुसार भारत में सोने की खुदाई चींटियों द्वारा की जाती है।
२. इण्डिका के अनुसार भारत में एक जाति की केवल एक ही आंख होती है, पाण्ड्य लड़कियां ६ वर्ष की आयु में बच्चे पैदा करती हैं, भारत में ७ वर्ण (४ नहीं) हैं, आदि आदि।
३. इण्डिका आदि में जो ठीक भी लिखा है उसे या तो नष्ट किया या बदल दिया। जैसे आर्यों को विदेशी बनाने के लिए रिसर्च। खुदाई में कुछ भी मिले उसकी मनमानी व्याख्या कर उत्तरी ध्रुव या दक्षिण अफ्रीका में भी वैदिक सभ्यता का आरम्भ कहा जा सकता है। १९०९ में प्रकाशित बाल गंगाधर तिलक की पुस्तक-वेद का आर्कटिक में विकास। उसी वर्ष एडमिरल पियरी समुद्र में स्थित उत्तरी ध्रुव गये। आर्यभट तथा लल्ल ने भी उत्तरी ध्रुव को समुद्र में लिखा है।
४. इण्डिका के अनुसार पिछले १५००० वर्षों से भारत ने किसी देश पर आक्रमण नहीं किया था। श्वानबेक ने यह अनुवाद १८८० में किया। इस संख्या में एक शून्य कम कर १५०० ई.पू. में मैक्समूलर ने वैदिक सभ्यता का आरम्भ घोषित कर दिया। उसके इस वाक्य को हटाने के लिए १९२७ में मैक-क्रिण्डल ने इण्डिका का नया संस्करण लिखा जिसमें कहा कि कायर होने के कारण भारतीय किसी पर आक्रमण नहीं करते। जालसाजी छिपाने के लिए श्वानबेक संस्करण को गायब कर दिया है। सिकन्दर से १५५०० वर्ष पूर्व कार्तिकेय ने क्रौञ्च द्वीप (उड़ते पक्षी के आकार का उत्तर अमेरिका) पर आक्रमण किया था (महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)
५. इण्डिका के अनुसार प्रथम ग्रीक आक्रमण बाक्कस या डायोनिसस का था। उसके ६४५१ वर्ष ३ मास बाद सिकन्दर का आक्रमण हुआ था। यह उस समय उपलब्ध भारतीय गणना के अनुसार है, क्योंकि किसी अन्य देश में उतना पुराना कैलेण्डर नहीं था। बाक्कस का वर्तमान अफगानिस्तान पर १५ वर्ष अधिकार था, जहां उसने जौ की शराब (बाक्कस = whisky) का प्रचार किया (वाग्भट, अष्टाङ्ग हृदय, सूत्र स्थान ३/५/६८, अष्टाङ्ग सूत्र, ६/११६) इस अवधि में भारतीय राजाओं की १५४ पीढ़ी हुयी (सूर्यवंश के राजा बाहु से मौर्य चन्द्रगुप्त तक)। किन्तु सिकन्दर के समय मौर्य के बदले गुप्त काल का चन्द्रगुप्त कर दिया।
६. इस अवधि में २ बार राजतन्त्र हुए, पहले १२० वर्ष में २१ राजतन्त्र (परशुराम द्वारा २१ बार क्षत्रिय नाश) तथा दूसरा ३०० वर्ष का (७५६ ईपू. के शूद्रक शक से ४५६ ईपू. के श्रीहर्ष शक तक)। दोनों का इतिहास गायब कर दिया।
भारतीय इतिहास परम्परा
१. केवल भारत में इतिहास लेखन परम्परा
२. पुराण = पुरा + नवति। पुराने वर्णन में समय समय पर नयी घटना का वर्णन जोड़ना। परिवर्तन का वैज्ञानिक वर्णन
३. इतिहास= इति + ह + आस = ऐसा ही हुआ था।
४. इतिहास ग्रन्थों में सत्य वर्णन-वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, (२/३४), महाभारत, आदि पर्व (१/२५६) , कल्हण, राजतरंगिणी (१/७)
५. वेद तथा पुराण संकलन स्वायम्भुव मनु (२९१०२ ईपू) से बादरायण (३१०२ ईपू) तक २८ व्यासों द्वारा। ब्रह्माण्ड (१/२/३५), वायु (९८/७१-९१), कूर्म (१/५२), विष्णु (३/३), लिङ्ग (१/७/११, १/२४), शिव (३/४), देवीभागवत (१/२, ३)
६. महाभारत के बाद पुराण संकलन- शौनक सत्र १००० वर्ष-भागवत (१/१/४), पद्म पुराण, सृष्टि खण्ड (१/१७-१८), उत्तर खण्ड (१९६/७२)
७. विक्रमादित्य काल (८२ ई.पू-१९ ई) में बेताल भट्ट द्वारा संकलन। भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व ४ (१/१-८)
८. अन्य इतिहास-आकाश सृष्टि तथा पृथ्वी निर्माण-पुराणों का सृष्टि खण्ड
वेद संहिता तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में इतिहास-वहां वर्णन के बाद ‘ह आस’ लिखा गया है।
ज्योतिष परम्परा
आयुर्वेद परम्परा
व्याकरण परम्परा
९. वेद अंग रूप में अन्य इतिहास-(१) श्लोक-किसी व्यक्ति की ख्याति सम्बन्धित वाक्य थे जो समाज में प्रचलित तथा उद्धृत थे। (२) विद्या-यह विषय या आविष्कर्ता व्यक्ति से सम्बन्धित वर्णन था। (३) व्याख्यान-अनुव्याख्यान-महत्त्वपूर्ण घटना, युद्ध आदि का वर्णन, उस पर विभिन्न मत या चर्चा। (४) वाकोवाक्य-बातचीत? (५) गाथा-प्राचीन कथायें, (६) नाराशंसी-किसी महापुरुष की जीवनी, प्रशंसा। (७) चरित-पुरुष या उसके वंश का वर्णन। (८) एकायन-प्राचीन संग्रह कोष आदि। इनके आधार पर पाञ्चरात्र ग्रन्थ थे। (९) कई अन्य विद्या जिनका रूप अस्पष्ट है-देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पदेवजनविद्या
भारतीय काल गणना
१. मिथ्या प्रचार-भारतीय लोग समय नहीं लिखते थे। सत्य यह है कि केवल भारत में ही समय लिखना सम्भव था क्योंकि प्राचीन कैलेण्डर यहीं था। मेगास्थनीज आदि ने भारतीय कालगणना को ही लिखा है।
२. तीन प्रकार की कालगणना- ९ प्रकार के सृष्टि चक्र के अनुसार ९ प्रकार के काल मान।
वैज्ञानिक माप के लिए अमूर्त या सूक्ष्म काल-सेकण्ड के ११,२०,००० भाग तक (शतपथ ब्राह्मण, १२/३/२/५)
निर्दिष्ट विन्दु से क्रमागत माप २ प्रकार से-शक = दिन गणना, सौर मास तथा वर्ष
संवत्सर (संवत्)-चान्द्र तिथि, मास, वर्ष गणना-उसका सौर वर्ष से समन्वय।
३. सात प्रकार के युग-
(१) संस्कार युग-४ वर्ष (वर्तमान लीप ईयर), ५ वर्ष, १२ वर्ष (शिक्षा काल), १८ वर्ष (ग्रहण चक्र), १९ वर्ष (सौर-चान्द्र वर्ष समन्वय-ऋक् ज्योतिष)
(२) मनुष्य युग-६० वर्ष का बार्हस्पत्य चक्र (चीन में भी), १०० वर्ष आयु, १२० वर्ष-पुनर्जन्म चक्र।
(३) दिव्य वर्ष-३६० वर्ष का युग
(४) सहस्र युग-रोमक युग (२८५० वर्ष = ऋक् युग x १५०), सप्तर्षि चक्र (२७०० वर्ष), २ प्रकार के बार्हस्पत्य चक्र (५१०० वर्ष, मय युग)
(५) ध्रुव या क्रौञ्च वत्सर-८१०० वर्ष, सप्तर्षि का ३ गुणा।
(६) ऐतिहासिक युग-ब्रह्माब्द २४,००० वर्षजल प्रलय का चक्र। इसके २ भाग- अवसर्पिणी १२,००० वर्ष का-सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि क्रमशः ४,३,२,१ भाग। उत्सर्पिणी १२,००० वर्ष में विपरीत क्रमसे युग-कलि से सत्य तक। इसी क्रम में जल प्रलय का चक्र। अवसर्पिणी त्रेता में जल प्रलय, उत्सर्पिणी त्रेता में हिम युग। यह २६,००० वर्ष के अयन चक्र तथा विपरीत दिशा में ३१२,००० वर्ष के चक्र का योग है। हिमयुग में सभ्यता का केन्द्र विषुव के निकट होता है।
(७) ज्योतिषीय युग-४३,२०,००० वर्ष जिसमें शनि तक के ग्रह पूरी परिक्रमा करते हैं। ७१ युग का मन्वन्तर ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी) के अक्ष भ्रमण का काल है (३१.६८ करोड़ वर्ष)। २६,००० वर्ष के अयन चक्र को ऐतिहासिक मन्वन्तर कहा गया है। १००० युग का कल्प या ब्रह्मा का दिन है (४३२ करोड़ वर्ष)। इतनी दूरी तक दृश्य जगत् (तपः लोक) है।
४. पुराण में स्वायम्भुव मनु से व्यास (३१०२ ईपू) तक २६,००० वर्ष का मन्वन्तर कहा है। इसमें वैवस्वत मनु तक ४३ युग तथा उसके बाद २८ युग कहा है (मत्स्य पुराण, २७३/७६-७७)। वैवस्वत मनु के बाद सत्य, त्रेता, द्वापर के १०८०० वर्ष ३१०२ ईपू में पूरे हुए। इसमें ३६० वर्ष के ३० युग हैं, पर वैवस्वत यम (जमशेद) के समय २ युग (७२० वर्ष) तक जल प्रलय था (११००० ईपू के बाद) उनको नहीं गिनते हैं।
भारत के मुख्य कैलेण्डर
१. स्वायम्भुव मनु (२९१०२ ई.पू.) से-ऋतु वर्ष के अनुसार-विषुव वृत्त के उत्तर और दक्षिण ३-३ पथ १२, २०, २४ अंश पर थे जिनको सूर्य १-१ मास में पार करता था। उत्तर दिशा में ६ तथा दक्षिण दिशा में भी ६ मास। (ब्रह्माण्ड पुराण १/२२ आदि)
इसे पुरानी इथिओपियन बाइबिल में इनोक की पुस्तक के अध्याय ८२ में भी लिखा गया है।
२. ध्रुव-इनके मरने के समय २७३७६ ई.पू. में ध्रुव सम्वत्-जब उत्तरी ध्रुव पोलरिस (ध्रुव तारा) की दिशा में था।
३. क्रौञ्च सम्वत्-८१०० वर्ष बाद १९२७६ ई.पू. में क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) का प्रभुत्व था (वायु पुराण, ९९/४१९) ।
४. कश्यप (१७५०० ई.पू.) भारत में आदित्य वर्ष-अदितिर्जातम् अदितिर्जनित्वम्-अदिति के नक्षत्र पुनर्वसु से पुराना वर्ष समाप्त, नया आरम्भ। आज भी इस समय पुरी में रथ यात्रा।
५. कार्त्तिकेय-१५८०० ई.पू.-उत्तरी ध्रुव अभिजित् से दूर हट गया। धनिष्ठा नक्षत्र से वर्षा तथा सम्वत् का आरम्भ। अतः सम्वत् को वर्ष कहा गया। (महाभारत, वन पर्व २३०/८-१०)
६. वैवस्वत मनु-१३९०२ ई.पू.-चैत्र मास से वर्ष आरम्भ। वर्तमान युग व्यवस्था।
७. वैवस्वत यम-११,१७६ ई.पू. (क्रौञ्च के ८१०० वर्ष बाद)। इनके बाद जल प्रलय। अवेस्ता के जमशेद।
८. इक्ष्वाकु-१-११-८५७६ ई.पू. से। इनके पुत्र विकुक्षि को इराक में उकुसी कहा गया जिसके लेख ८४०० ई.पू. अनुमानित हैं।
९. परशुराम-६१७७ ई.पू. से कलम्ब (कोल्लम) सम्वत्।
१०. युधिष्ठिर काल के ४ पञ्चाङ्ग-(क) अभिषेक-१७-१२-३१३९ ई.पू. (इसके ५ दिन बाद उत्तरायण में भीष्म का देहान्त)
(ख) ३६ वर्ष बाद भगवान् कृष्ण के देहान्त से कलियुग १७-२-३१०२ उज्जैन मध्यरात्रि से। २ दिन २-२७-३० घंटे बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।
(ग) जयाभ्युदय-६ मास ११ दिन बाद परीक्षित अभिषेक २२-८-३१०२ ई.पू. से
(घ) लौकिक-ध्रुव के २४३०० वर्ष बाद युधिष्ठिर देहान्त से, कलि २५ वर्ष = ३०७६ ई.पू से कश्मीर में (राजतरंगिणी)
११. भटाब्द-आर्यभट-कलि ३६० = २७४२ ई.पू से।
१२. जैन युधिष्ठिर शक-काशी राजा पार्श्वनाथ का सन्यास-२६३४ ई.पू. (मगध अनुव्रत-१२वां बार्हद्रथ राजा)
१३. शिशुनाग शक-शिशुनाग देहान्त १९५४ ई.पू. से (बर्मा या म्याम्मार का कौजाद शक)
१४. नन्द शक-१६३४ ई.पू. महापद्मनन्द अभिषेक से। ७९९ वर्ष बाद खारावेल अभिषेक।
१५. शूद्रक शक-७५६ ई.पू.-मालव गण आरम्भ
१६. चाहमान शक-६१२ ई.पू. में (बृहत् संहिता १३/३)-असीरिया राजधानी निनेवे ध्वस्त।
१७. श्रीहर्ष शक-४५६ ई.पू.-मालव गण का अन्त।
१८. विक्रम सम्वत्-उज्जैन के परमार राजा विक्रमादित्य द्वारा ५७ ई.पू. से
१९. शालिवाहन शक-विक्रमादित्य के पौत्र द्वारा ७८ ई.से।
२०. कलचुरि या चेदि शक-२४६ ई.
२१. वलभी भंग (३१९ ई.) गुजरात के वलभी में परवर्त्ती गुप्त राजाओं का अन्त।
इतिहास तथा समाज नष्ट करना जारी
१. निराधार आर्य आगमन इतिहास अभी भी पढ़ा रहे हैं।
२. कुछ लोग केवल ब्राह्मणों को आर्य कह कर उनको विदेशी कह रहे हैं।
३. राजपूत राजाओं ने देश की रक्षा कई हजार वर्षों तक की, अतः उनको विदेशी शक हूणों का वंशज कह दिया। इस उद्देश्य से कर्नल टाड आदि ने इतिहास लिखा।
४. अधिकांश ताम्रपत्रों मे आरम्भ में तिथि दी जाती थी, अतः उसे अंग्रेज लेखक नष्ट कर देते थे। जनमेजय के ताम्रपत्रों में बीच में थे अतः वे नष्ट नहीं किया जा सके।
५. इतिहास सम्बन्धी मूल भारतीय ग्रन्थ या पाश्चात्य ग्रन्थ पुस्तकालयों में नहीं रखे जाते।
६. काल क्रम का एकमात्र आधार पुराण हैं। पुराणों से राजाओं का कालक्रम ले कर उनका समय मनमाना बदल दिया तथा पुराणों को झूठा घोषित कर दिया। किसी भी वैज्ञानिक विधि से राजा का नाम नहीं पता चल सकता। शिलालेख में भी कोई राजा यह नहीं लिख सकता उसकी मृत्यु के बाद कितने राजाओं ने कितना समय शासन किया।
७. भारत में प्रायः सभी लोग पञ्चाङ्ग देख कर पर्व मनाते हैं। पर कोई इतिहासकार पञ्चाङ्ग देखना नहीं जानता, न आज तक किसी इतिहास ग्रन्थ में उसका उल्लेख है।
८. सिकन्दर का समय ३२६ ई.पू कह कर उससे इतिहास आरम्भ करते हैं। किसी लेखक को यह पता नहीं चला कि वह किस कैलेण्डर के अनुसार है। यह कैसे पता चला कि उसके ३२६ वर्ष बाद इस्वी सन् शुरु होगा?
९. सभी ज्योतिष लेखक वराहमिहिर का श्लोक उद्धृत करते हैं (बृहत् संहिता, १३/३) कि उनके काल के शक में २५२६ जोड़ने पर युधिष्ठिर शक होता है। वराहमिहिर शक राजा को नष्ट करने वाले विक्रमादित्य के नवरत्न थे, अतः उनका शक किसी शक राजा का नहीं हो सकता। युधिष्ठिर भी शक जाति के नहीं थे। पर सभी शकों को ७८ ई. का शालिवाहन शक मान कर उसे कश्मीर के हिन्दू राजा कनिष्क (१२९२ ईपू) को शक बना कर उसके नाम पर कर दिया है। मान लेते हैं कि वराहमिहिर ने अपनी मृत्यु के ८३ वर्ष बाद आरम्भ हुए शक का प्रयोग किया था।
१०. जितने राजाओं ने भी कैलेण्डर आरम्भ किया (शक-कर्ता राजा) उनको काल्पनिक घोषित कर उनका नाम हटा दिया, जिससे किसी को इतिहास का पता नहीं चले। जिस विक्रमादित्य का संवत् अभी तक चल रहा है तथा जिसके बारे में सबसे अधिक साहित्य है, उसे काल्पनिक कहते हैं। इस मूर्खता के कारण १९५७ का राष्ट्रीय शक अभी तक नहीं चल पाया है जिसे ७८ ई. से माना गया।
✍🏻अरुण उपाध्याय जी की पोस्टों से संग्रहीत

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