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प्राचीन भारतीय दार्शनिकों और कवियों का गणित के क्षेत्र में रहा अद्भुत योगदान

रोहन मूर्ति

(लेखक हार्वर्ड विश्वविद्यालय के जूनियर फेलो हैं।)

पिछले वर्ष मैंने अपने मित्रा गणितज्ञ मंजुल भार्गव को कई सार्वजनिक व्याख्यानों में कविता, गणित और संस्कृत के बीच गहरे संबंधों के बारे में कहते सुना। इस विषय पर बोलने वाले उससे पहले के अन्य गणितज्ञों की भांति मंजुल ने भी ढेरों उदाहरण दिए जिनसे यह साबित होता है कि पश्चिमी जगत से काफी पहले ही प्राचीन भारतीय दार्शनिकों और कवियों ने गणित के क्षेत्रा में काफी गंभीर योगदान किया था। यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि प्राचीन भारत में वर्तमान अफगानिस्तान से बर्मा तक शामिल रहा है। मंजुल ने जो सर्वाेत्कृष्ट उदाहरण दिया था, वह मुख्यतः ग्यारहवीं सदी के था जब भारत में गोपाल और हेमचंद्र ने संस्कृत छंदों के अक्षरों की संख्या और गणित में रोचक संबंध ढूंढ निकाले थे। इस संबंध को ही आज हम फिबोनकी श्रेणी के नाम से जानते हैं, जो प्रकृति में कई फूलों के पंखुड़ियों की संख्या में भी पाया जाता है और जिसकी खोज कालांतर में पीसा, इटली के लियोनार्डाे ने 50-80 साल बाद की। मनुष्य द्वारा निर्मित संस्कृत छंदों के अक्षरों की संख्या और प्रकृति निर्मित फूलों की पंखुड़ियों की संख्या में कोई संबंध से कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति परेशान हो सकता है। एक अन्य असाधारण उदाहरण जिस पर मंजुल ने प्रकाश डाला, वह है लगभग 200 वर्ष ईसापूर्व में प्राचीन भारतीय कवि पिंगल द्वारा संस्कृति छंदों में द्विपदीय संरचना का आविष्कार करना। उन्होंने फ्रेंच गणितज्ञ पास्कल के अंकगणितीय त्रिकोण की संधि जिसे हम आज पास्कल के त्रिकोण के नाम से पढ़ते हैं, से लगभग 1800 वर्ष पहले ही इसे ढूंढ निकाला था।

अन्य उदाहरणों में आधुनिक त्राुटि-सुधार सूत्रों, सिंक्रोनाइजेशन जैसी तकनीकें और संस्कृत साहित्य में औपचारिक परिभाषाएं शामिल हैं। ये सभी आधुनिक खोजें या कुछ मामलों में फिर से की गईं खोजें हैं जो कम्प्यूटर की भाषा से लेकर बेतार संचार तक, जीवन के हरेक आयाम को प्रभावित करते हैं।

हालांकि यह कहना मूर्खता ही होगी कि हमारे पूर्वजों को कम्प्यूटर की भाषा आती थी या उन्हें बेतार के तार की जानकारी थी। यह कहना ऐसा ही होगा मानो हम कहें कि कॉपरनिकस ने चाँद पर जाने वाला यान बना लिया था। इसकी बजाय ये उदाहरण यह बतलाते हैं कि हमारे देश में हजारों वर्ष पूर्व से एक जीवंत सभ्यता थी जिसमें ऐसे असाधारण बुद्धिमान विचार और सिद्धांत पैदा हुए थे जिनका हमारे आज के जीवनशैली से मौलिक व गहरा संबंध है। काल के चक्र में हम अपने उस इतिहास के ज्ञान और उसके साथ ही गौरव के भाव तथा आधुनिक जीवन को प्रभावित करने की अपनी क्षमता को भुला बैठे हैं। मेरी पीढ़ी के कुछ लोग इन तथ्यों को जानते प्रतीत होते हैं।

अपने अतीत से हमारी अनभिज्ञता का बड़ा कारण हमारी व्यवस्था ही है। बंगलौर में अपनी उच्च विद्यालय की पढ़ाई के अंतर्गत आईसीएसई पाठ्यक्रम में हमने हैमलेट, मर्चेंट ऑफ वेनिस, वर्ड्सवर्थ, टेनिसन, जेम्स जायस, डिकेंस आदि की रचनाएं पढ़ीं। यहां तक कि हमने अमरीकी नागरिक युद्ध के अंत और लिंकन की मृत्यु पर वाल्ट व्हाइटमेंट वाक्स इलोकेंट के लिखे ओ कैप्टन, ओ कैप्टन, हमारी भयपूर्ण यात्रा समाप्त हुई, भी पढ़ा। जबकि हमारी पूरी कक्षा में एक भी छात्रा नहीं जानता था कि अमेरिकन नागरिक युद्ध क्या है या अमेरिका में क्या हुआ था या लिंकन क्यों और कैसे मरे थे। हमने टेनिसन के उपन्यास उलिसस की उत्साहवर्धक ये पंक्तियां पढ़ी थीं, टू स्ट्राइव, टू सीक, टू फाइंड, एंड नॉट टू यील्ड। यह सब कुछ हमने प्राचीन ग्रीस के संदर्भ को जाने बिना पढ़ा था और बिना यह जाने कि इथाका (हमने इसे आई था क्या के रूप में सीखा था) का उच्चारण कैसे करते हैं। हमें उन विचित्रा सिद्धांतों, कहानियों, नायकों और संसारों के संदर्भों की न्यूनतम या शून्य जानकारी थी।

इसके बावजूद हमने केवल परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने के लिए उन कविताओं, लघुकथाओं, उपन्यासों को पढ़ा और उन पर निबंध लिखे। यह एक मजेदार अनुभव था और मैं इसे फिर से करना चाहूँगा। लेकिन, यह शैक्षणिक अनुभव और जानकारी में विचार और सिद्धांतों की विविधता का गहरा अभाव था। मुझे यह बात सबसे अधिक खटकती थी कि हमने दुनिया के इस हिस्से भारत की एक भी प्राचीन रचना नहीं पढ़ी थी जबकि हमारे पास उन्हें समझने के लिए अधिक सक्षम सांस्कृतिक पृष्ठभूमि थी। हम प्राचीन भारत के पिछले हो हजार वर्ष से पहले की किसी भी कहानी, कविता, नाटक, राजनीतिक जीवन, दर्शन, गणित, विज्ञान, समाज जीवन आदि के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। एक आम शहरी शिक्षित व्यक्ति की भांति मैं और मेरे दोस्त प्राचीन भारत के बौद्धिक योगदान से पूरी तरह अनभिज्ञ थे। हमें केवल इतिहास की कुछेक तिथियों और सिंधु घाटी सभ्यता, अशोक और चंद्रगुप्त मौर्य आदि के बारे में कुछ जानकारियां थीं, उनकी भी गहरी समझ नहीं थी।

एक छात्रा के रूप में हमने प्लेटो, अरस्तु, पाइथागोरस, कॉपरनिकस, न्यूटन, लिबनिट्ज, पास्कल, गैलोइस. यूलर आदि और उनके योगदान के बारे में ठीक से पढ़ा हुआ था। लेकिन हमें आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, पिंगल, कालीदास, हेमचन्द्र, माधव, न्याय या मीमांसा सूत्रों आदि के बारे में कुछ भी नहीं पढ़ा था।

लेकिन इन सबकी चिंता क्यों की जाए। आखिरकार हम उस अतीत का कभी भी हिस्सा नहीं थे और उन्हें आज के यथार्थ से उन्हें इस प्रकार हटा दिया गया है कि अतीत से किसी भी प्रकार का सूत्रा ढूंढना अप्रासंगिक है। लेकिन मेरा मानना है कि इस अतीत को ढूंढना विद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले उन विषयों जिनका कि मैंने ऊपर उदाहरण दिया है, की तुलना में कहीं से भी कम प्रासंगिक नहीं है। इसके अलावा प्राचीन भारत के ये ज्ञान के स्रोत रचनात्मक मानवीय विचार की उपज हैं और पूरे विश्व के लिए उपयोगी हैं। उदाहरण के लिए इस ग्रह का किसी भी बच्चे को गणित को आज के गणितज्ञों द्वारा प्रतिपादित शुष्क और जड़ तरीकों की बनिस्पत कविता के माध्यम से पढ़ना अधिक लाभकारी व रोचक लगेगा।

राष्ट्रीय पहचान एक जटिल प्रक्रिया है, कुछ मायनों में इसका सम्बंध उन्नत ज्ञान और मानव के जीवन-स्तर के विकास में समाज द्वारा किए जाने वाले बौद्धिक योगदान से भी है। हम जैसे अनेक लोगों के लिए न्यूटन तब एक हीरो बन जाते हैं, जब हम जानते हैं कि किस प्रकार उन्होंने विश्व के मूल सिद्धांतों को उद्घाटित किया। पश्चिमी जगत के महान साहित्य और दर्शन ने हमें मनुष्य की अवस्था को समझने में सहायता की। पश्चिमी जगत के इन उदाहरणों ने हमारे मन में उन समाजों के प्रति काफी सम्मान पैदा किया जिन्होंने इस उत्सुकता को जन्म दिया, पाला-पोसा और बढ़ाया। इसी प्रकार हम भारत के अतीत, उसके गंभीर तथा बहुमुखी विचारों व सिद्धांतों के बारे में भी एक समझ विकसित करने के पक्ष में हैं, जो पश्चिमी जगत के उन विभूतियों से किसी रूप में कम असाधारण नहीं हैं।

मेरा यह कहना नहीं है कि हम अन्य समाजों व सभ्यताओं के योगदानों का सम्मान करना छोड़ दें, बल्कि हमारे पास भी बताने के लिए काफी कुछ है यदि हम निष्पक्ष भाव से अनुसंधान और परीक्षण करें और प्राचीन भारत के बौद्धिक इतिहास को मान्यता दें। हमें यह जान कर आश्चर्य हो सकता है कि यह हमारे आज के समाज से कहीं अधिक उदार, सहिष्णु और विविधतापूर्ण समाज रहा है।

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