परिवार व अन्य किसी स्नेही व्यक्ति का संबंध अचानक छूट सकता है

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मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज में हम जिन लोगों से परिचित हैं वह सभी वर्तमान में अपनी-अपनी आयु के किसी चरण या सोपान पर है। मनुष्य की भी एक औसत आयु है तथा इसी प्रकार से अन्य प्राणियों की भी अधिकतम आयु होती है। मनुष्य की अधिकतम आयु एक सौ वर्ष या अपवादों में इससे कुछ अधिक होकर लगभग 125 वर्ष तक हो सकती है। बहुत से लोग तो 50 से 70 के मध्य ही काल कवलित हो जाते हैं। जब हम अपने परिवार के सदस्यों के साथ रहते हैं तो हमें कभी इस बात का ध्यान नहीं होता कि हममें से अचानक परिवार के सदस्य का हमसे वियोग हो सकता है। ऐसा होता है कि कुछ लोग लम्बी अवधि तक रुग्ण रहें और उसके बाद उनकी मृत्यु हो और ऐसा भी देखा जाता है कि कभी अचानक ही कुछ शारीरिक विकृति व रोग आ जाता है और देखते ही देखते कुछ दिनों या महीनों में किसी सदस्य का प्राणान्त हो जाता है। हम ऋषि दयानन्द का जीवन देखते हैं तो बाल्यकाल में ही उनकी एक बहिन को अचानक हैजा होता है और वह उसी दिन कुछ घंटों बाद काल कवलित हो जाती है। इसके बाद उनके चाचा जी अचानक काल कवलित हो जाते हैं। इन घटनाओं का ऋषि दयानन्द के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा था और इन घटनाओं का भी शिवरात्रि की बोध की घटना के समान महत्व था।

महात्मा बुद्ध के जीवन में भी हम देखते हैं कि वह एक मृतक शरीर को देख कर अपने बारे में विचार करते हैं और कल्पना करते हैं कि एक दिन उन्हें भी संसार से जाना होगा। हम संसार पर दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि देश व समाज में हमें अधिक आयु वर्ग में 80-90 वर्ष की आयु वाले लोग ही अधिक दृष्टिगोचर होते हैं। इससे पूर्व उत्पन्न हुए प्रायः सभी लोग, जो करोड़ो व अरबों की संख्या में थे, संसार से मृत्यु का वरण करके जा चुके हैं। आवागमन का यह क्रम सृष्टि की आदि काल से चल रहा है और प्रलय अवस्था तक चलता रहेगा। इसका विश्वास सभी बुद्धिमान मनुष्यों को है। अतः इससे अनुमान कर सकते हैं कि भविष्य में सभी मनुष्यों के साथ कभी भी किसी का कोई पारिवारिक सदस्य संसार से विदा हो सकता है। अतः ऐसी स्थिति में मनुष्य दुःखी न हो अथवा कम से कम दुःखी हो, इसकी तैयारी सभी को करनी चाहिये।

परिवार में सब मनुष्यों के इतर कुटुम्बियों के साथ कई प्रकार के सम्बन्ध होते हैं। कोई पिता है तो कोई पुत्र, कोई माता है तो कोई बहिन, कोई भाई है तो कोई पौत्र या पौत्री आदि। इनमें से जब किसी एक सदस्य का वियोग होता है तो शेष सदस्यों को अलग अलग प्रकार की दुःखद अनुभूतियां होती हैं। यह दुःख ऐसा होता है जो किसी को बताया नहीं जा सकता। सब पारिवारिक सदस्यों को किसी को कुछ कम व किसी को अधिक दुःख होता है। कहा जाता है कि जिसका जिसके प्रति जितना अधिक मोह, प्रेम, अनुराग, निकटता व किसी भी प्रकार का सामाजिक व्यवहार आदि होता है उस मनुष्य के बिछुड़ने पर उनसे जुड़े व्यक्ति को अपने सम्बन्धों के अनुसार उतना ही दुःख होता है। हमने अपने जीवन में अपने माता-पिता, एक बहिन तथा अनेक मित्रों व संबंधियों की मृत्यु के अवसर देखे व अनुभव किये हैं। अपने परिवार के सदस्यों पर मनुष्य को अधिक दुःख होता है और यह कुछ अधिक समय तक विद्यमान रहता है।

हमारे कुछ मित्र ऐसे भी हैं जिनकी पत्नी का कुछ समय पूर्व वियोग हुआ है। यह मित्र कभी कुछ कहते तो नहीं परन्तु इनसे वार्तालाप व कुछ चर्चायें करते हुए अनुभव होता है कि इन्हें मृतका के अभाव से गहरा दुःख पहुंचा है और वह सामान्य तो हो रहे हैं, सामन्य दीख भी रहे हैं परन्तु पूर्णतः उस जीवन साथी के संग का विकल्प उन्हें नहीं मिला है। वह अपने आप को नई परिस्थितियों में ढाल रहे हैं। प्रकृति की व्यवस्था ऐसी है कि कितना भी दुःख हो समय के साथ उसकी मात्रा कम होती जाती है। अपने प्रिय व्यक्ति के वियोग का अभाव तो कभी पूरा नहीं होता परन्तु समय के साथ उस अभाव से उत्पन्न दुःख कुछ कम अवश्य हो जाता है और मनुष्य बदली हुई परिस्थितियों में रहने के अभ्यस्त हो जाते हंै। संसार का यह नियम बदला नहीं जा सकता। सभी युवा व वृद्ध बन्धु अपने अनेक निकट संबंधियों को खो चुके होते हैं और भावी जीवन में भी यह खतरा सबके ऊपर मंडराता रहता है। इसकी तैयारी करने का उपाय सबको करना चाहिये जिससे कोई अनहोनी घटना होने पर वह स्वयं को संभाल सकें। इसका समाधान हमें सत्यार्थप्रकाश, वेद, उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, बाल्मीकि रामायण, महाभारत तथा आर्य विद्वानों के अनेकानेक ग्रन्थों के स्वाध्याय करने से कुछ मिलता हुआ प्रतीत होता है। स्वाध्याय के साथ ईश्वर की उपासना व अग्निहोत्र यज्ञादि कर्म करने से भी मनुष्य का ध्यान कुछ समय के लिये इन धर्मानुष्ठानों में लगता ही है जिससे वह अपने प्रियजनों के वियोग से होने वाले दुःखों से बच जाते हैं। इसके अतिरिक्त यदि खाली समय में पुरानी स्मृतियां परेशान करती हैं तो मनुष्य अपने ज्ञान व चिन्तन-मनन से उस पर नियंत्रण कर सकता है। अतः सन्ध्या, ध्यान, योगाभ्यास, स्वाध्याय तथा अग्निहोत्र आदि यज्ञों में अपने समय का सदुपयोग कर हम भविष्य में होने वाली वियोग संबंधी समस्याओं से बच सकते हैं।

हमारी स्मृति में वेदों के सुप्रसिद्ध विद्वान आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी का उदाहरण है। आचार्य जी ने सामवेद का संस्कृत व हिन्दी में भाष्य किया है। अनेक वैदिक विद्वानों ने सामवेद पर भाष्य वा टीकायें लिखी हैं परन्तु आचार्य जी का भाष्य सर्वोत्तम माना जाता है। आचार्य जी ने सामवेद के कुछ मन्त्रों के एक से अधिक अर्थ किये हैं। यह उनके वेद सम्बन्धी गहरे ज्ञान का प्रतीक है। आचार्य जी ने एक दर्जन से अधिक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। हमने उनके सभी ग्रन्थों का अध्ययन किया है। आचार्य जी के जीवन काल में भी हम उनसे निकटता से जुड़े रहे। आचार्य जी की धर्मपत्नी माता श्रीमती प्रकाशवती जी थी। माता जी का देहान्त 59 वर्ष की आयु में चैत्र कृष्ण 14, 2038 वि. को हुआ था। आचार्य जी तब लगभग 68 वर्ष के थे। इसके बाद आचार्य जी लगभग 30 वर्ष तक जीवित रहे। आचार्य जी का 43 वर्ष का दाम्पत्य जीवन रहा। माता श्रीमती प्रकाशवती जी की मृत्यु के कुछ समय बाद ही आपने उनकी स्मृति में ‘‘वैदिक नारी” नाम से एक अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना की। वैदिक साहित्य में अपने विषय का यह एक अनूठा एवं महान ग्रन्थ है। इसके साथ आचार्य जी ने स्वयं को साहित्य साधना में समर्पित कर दिया था। जीवन अवधि के शेष समय में उनसे एक के बाद दूसरा उच्च कोटि के कई वैदिक ग्रन्थ मिले। सामवेद भाष्य उनकी काफी बाद की रचना है। इस प्रकार उन्होंने अपने उस वियोग के दुःख को वैदिक साहित्य के अध्ययन व लेखन सहित साधना आदि में व्यतीत कर अपने जीवन को सार्थक किया था।

किसी पारिवारिक सदस्य मुख्यतः पति-पत्नी में से किसी एक का वियोग होने पर साधना व स्वाध्याय, यह दो कार्य, मन को शान्त रखते हुए जीवन व्यतीत करने में सर्वाधिक सहायक होते हैं। देहरादून में एक सेवानिवृत उच्च सरकारी पदाधिकारी हमारे मित्र हैं। उन्होंने आर्यसमाज की एक उच्च कोटि की राष्ट्रीय स्तर की संस्था को सम्भाला हुआ है। वह तन, मन और धन से उस संस्था की उन्नति में संलग्न हैं। सितम्बर, 2017 में उनको अपनी पत्नी का वियोग हुआ था। उससे पहले से ही वह अपना अधिकांश समय आर्यसमाज की उस सामाजिक संस्था में लगाते हैं। संस्था व आश्रम के चतुर्वेद पारायण यज्ञों एवं वार्षिकोत्सव में अपना पूरा समय देते हैं। वृहद व इतर यज्ञों के यजमान भी बनते हैं और अपने घर पर भी वर्ष में एकबार पांच दिवसीय वेदपारायण यज्ञ कराते हैं जिसमें आपके सभी भाई व बहिन सपत्नीक पधारते हैं। स्थानीय लोगों की भागीदारी भी उनके इस आयोजन में रहती है। हम भी अनेक वर्षों से उनके इन आयोजनों में उपस्थित हो रहे हैं। इस प्रकार वह अपना जीवन श्रेय मार्ग पर चलकर व्यतीत कर रहे हैं जिससे वह अभ्युदय एवं निःश्रेयस सुख प्राप्त करने में सफल हो रहे हैं वा उस दिशा में बढ़ रहे हैं। हमारे कुछ अन्य मित्र, जिनके जीवनसाथी अब नहीं रहे हैं, वह भी इसी प्रकार से श्रेय मार्ग के कुछ कार्यों को करके जीवन व्यतीत करते हैं। हम देखते हैं कि हमें स्वाध्याय करते हुए इस बात का अहसास रहता है कि जीवन में कभी कोई अप्रिय वियोग की घटना हो सकती है। अतः स्वाध्याय, धर्म, सेवा व साधना में यदि हमारी प्रवृत्ति होगी तो हमारा विपरीत परिस्थितियों का जीवन कुछ कुछ सामान्य रूप से व्यतीत हो सकता है।

वैदिक धर्म में चार आश्रम एवं चार वर्ण होते हैं। चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास होते हैं। इनमें से वानप्रस्थ आश्रम में भी अनेक लोग अपने परिवार व धर्मपत्नी से पृथक रहकर किसी वन या आश्रम में जाकर साधना करते थे व अब भी करते हैं। संन्यास आश्रम में तो पति व पत्नी के साथ न रहने का विधान है। अपवाद स्वरूप कुछ संन्यासी परिस्थितियोंवश अपनी पत्नी को साथ रखते रहे हैं। चार वर्ण गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार होते हैं। वेदज्ञान प्रधान तथा आचार्यत्व से युक्त मनुष्य ब्राह्मण, विद्या प्राप्त अन्याय का विरोध तथा न्याय प्रधान कार्यों में रुचि रखने वाला पात्र व्यक्ति क्षत्रिय तथा कृषि व वाणिज्य सहित गोपालन आदि कार्यों में रुचि रखने वाले विज्ञ व्यक्ति वैश्य कहलाते थे। चैथा वर्ण शूद्र प्रायः अविद्या प्रधान व्यक्तियों का होता था जो अपनी शारीरिक शक्ति से अन्य तीन वर्णों के कार्यों में उन्हें सहयोग करता था। यह वर्ण तीन वर्णों की रसोई के कार्यों सहित अनेक महत्वपूर्ण कार्य भी करता था। वैदिक काल में शूद्र बन्धु आजकल के अनुसूचित जाति के बन्धुओं से ज्ञान, कर्म व उपासना की दृष्टि से कहीं अधिक उन्नत होते थे। उनकी सन्तानें विद्या प्राप्त कर अन्य तीन वर्णों में से किसी एक वर्ण का वरण कर सकती थी।

ऋषि दयानन्द जी की महान कृपा से हमें सत्यार्थप्रकाश एवं अन्य ग्रन्थ प्राप्त हुए हैं जो हिन्दी भाषा में हैं। वेदों का सार उनके ग्रन्थों में पाया जाता है। इन ग्रन्थों का अध्ययन आसानी से किया जा सकता है। इन ग्रन्थों के अध्ययन से मनुष्य किसी वियोग की अवस्था में उस प्रकार से व्यथित वा दुःखी नहीं होता जैसे कि अज्ञानी मनुष्य होते हैं। उन्हें जीवन मृत्यु के रहस्यों का पूरा-पूरा ज्ञान होता है। वह जानते हैं कि जिस पारिवारिक सदस्य की मृत्यु होती है उसे उसके कर्मानुसार परमात्मा द्वारा जन्म मिलता है। वह मृतक आत्मायें इस जन्म के सम्बन्धों को भूल जाती हैं जैसे कि बचपन से हममें से किसी को अपने पूर्वजन्मों के सम्बन्धों का ज्ञान नहीं रहा है। अतः हम यह जानते हैं कि वियुक्त जनों को स्मरण करने व दुःखी होने से हमें, हमारे परिवार या मृत्यु को प्राप्त सदस्य या आत्मा को कोई लाभ नहीं होगा। हमें ईश्वर की साधना व स्वाध्याय सहित सामाजिक व देशोपकार के कार्यों में अपना समय व्यतीत कर यथासमय मृत्यु का वरण करना चाहिये। यही वैदिक धर्म व वैदिक दर्शन की हमें प्रमुख देन है। हमारी मित्र मण्डली में यदा कदा किसी मित्र के परिवार में इस प्रकार वियोग की घटनायें होती रहती हैं। अतः हमने इस लेख के द्वारा कुछ पंक्तियां लिखी हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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