धर्मनिष्ठ और राष्ट्रनिष्ठ : पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय

आज दिनाँक छह सितम्बर , महान दार्शनिक विद्वान पूज्य पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय जी की 142 वीं वर्षगाँठ है । उनका जन्म 6 सितम्बर सन् 1881 को उत्तर प्रदेश के कासगंज जनपद के एक छोटे से ग्राम नदरई में हुआ । छोटी सी आयु में ही पिता की छत्रछाया से विहीन हो गए । अपनी धर्निष्ठ साध्वी , स्नेही माता के आशीर्वाद व् अपने स्वयं के तपोबल से वे संसार के सर्वाधिक लिखने वाले व् सर्वश्रेष्ठ लेखकों की पंक्ति में खड़े हो गए ।
हिन्दी , संस्कृत , उर्दू , फ़ारसी , अरबी और अंगेजी भाषा पर उन्हें समान रूप से अधिकार था ।उनके सम्पूर्ण साहित्य को लेखबद्ध कर प्रकाशित किया जाए तो कई हजार पृष्ठों की लेखमाला बनेगी । यूँ तो पण्डितजी की प्रत्येक पुस्तक व् ट्रैक्ट महत्वपूर्ण है लेकिन “आस्तिकवाद” और “जीवात्मा” तो अति विशेष है । इन दोनों ग्रंथों में विद्वान लेखक ने देशी-विदेशी विचारकों को उद्धृत कर सटीक युक्तियों द्वारा परमात्मा और जीवात्मा का अस्तित्व सिद्ध किया है । आस्तिकता वास्तव में है क्या और “मैं” कौन समझने के लिए ये दोनों ही ग्रन्थ
विशेष लाभकारी हैं ।
श्रद्धेय उपाध्याय जी को कोटि-कोटि नमन ।
उनके शिष्य प्राध्यापक राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’ जी के शब्दों में श्रद्धांजलि —
“बहे ज्ञान की गंगा , मल मिलकर के धो लो”
कृश काय था , कर्मठ था , वह मन का उजला ।
विनयशील वह दयावान , पौरुष का पुतला ॥
सतत साधना करने वाला , जनहितकारी ।
ईशभक्त वह आर्य सच्चा , परोपकारी ॥
अपने बल से तप से जीवन सफल बनाया ।
चीर दीनता देखो उसने कुल चमकाया ॥
धीरे-धीरे चलता पर वह चलता निरन्तर ।
मान प्रतिष्ठा पाकर भी आया न अन्तर ॥
रहे लोभ से दूर कभी न हाथ पसारे ।
झेले कष्ट हज़ार कभी हिम्मत न हारे ॥
अटल ईश विश्वास धार कोल्हापुर पहुँचे ।
और छिड़ा संग्राम गुरु शोलापुर पहुँचे ॥
हर्ष शोक में लेखन कार्य बन्द हुआ न ।
दुःख में सुख में कभी कार्य मन्द हुआ न ॥
मर्म धर्म का जाना , सब जग को समझाया ।
ज्ञान रश्मियाँ लेकर निकले जग चमकाया ॥
लिखे आपने ग्रन्थ बड़े और छोटे कितने ।
कौन करे अनुवाद लेख लिख डाले इतने ? ॥
धन्य समाजी लोग लेख न एक सम्भाला ।
उत्तर तक न दिया , पत्र जो हमने डाला ॥
बहुभाषाविद् आप लेखनी खूब चलाई ।
काँपा अघ अज्ञान जो उसकी करी धुनाई ॥
सरल तरल व्यवहार गुणी गम्भीर विचारक ।
दयावान विद्वान् खरा आदर्श सुधारक ॥
रचना उसकी एक एक है , न्यारी प्यारी ।
सरभित उसके कारण ऋषिवर की फुलवारी ॥
ले लो , ले लो , ऋषियों की यह ज्ञान बपौती ।
पाप ताप को मिलकर दे दो आज चुनौती ॥
उमड़ी सागर की लहरें , देखो आकर ।
करो आज गुणगान , गुरु को शीष झुकाकर ॥
बहे ज्ञान की गंगा , मल मिलकर के धो लो ।
धर्म वेद की जय जय , सब मिलकर के बोलो ॥
एक बार “जिज्ञासु” आ जयकार गुञ्जायें ।
श्रद्धा के सागर में डुबकी एक लगायें ॥
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साभार — प्राध्यापक राजेन्द्र जिज्ञासु जी द्वारा उपाध्याय जी के लेखों का संकलित , सम्पादित व् प्रकाशित संग्रह – “गंगा ज्ञान सागर” ॥
प्रस्तुति — सुनीत
गंगा ज्ञान सागर- ₹1800 (चारों भाग)

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