बहुत ही व्यापक और गहरा अर्थ है गायत्री मंत्र का

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गायत्री मन्त्र: ओ3म् भूर्भुव:स्व:। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। घियो यो न: प्रयोदयात।।
गायत्री मन्त्र में प्रथम जो (ओ3म) है यह ओंकार शब्द परमेश्वर का सवार्वेत्तम नाम है, क्योंकि इसमें जो अ, उ और म् अक्षर मिलकर एक (ओ3म्) समुदाय हुआ है, इस एक ओ3म् नाम से परमेश्वर के बहुत नाम आते हैं जैसे-अकार से विराट्, अग्नि और विश्ववादि। उकार से हिरण्यगर्भ, वायु और तैजसादि। मकार से ईश्वर, आदित्य और प्राज्ञादि नामों का वाचक और ग्राहक है। वेदादि सत्यशास्त्रों में इसका ऐसा ही स्पष्ट व्याख्यान किया गया है। तीन महाव्याहृतियों ‘भू:, भुव: स्व:’ के अर्थ भी संक्षेप से कहते हैं। – ‘भूरिति वै प्राण:’ ‘य: प्राणयति चराऽचरं जगत् स भू: स्वयम्भूरीश्वर:’ जो सब जगत् के जीवन का आधार, प्राण से भी प्रिय और स्वयम्भू है, उस प्राण का वाचक होके ‘भू:’ परमेश्वर का नाम है। ‘भुवरित्यपान:’ ‘य: सर्वं दु:खमपानयति सोऽपान:’ जो सब दु:खों से रहित, जिस के संग से जीवन सब दु:खों से छूट जाते हैं इसलिये उस परमेश्वर का नाम ‘भुव:’ है। ‘स्वरिति व्यान:’ ‘यो विविधं जगद् व्यानयति व्याप्नोति स व्यान:’ जो नानाविध जगत् में व्यापक होके सब का धारण करता है, इसलिये उस परमेश्वर का नाम ‘स्व:’ है। ये तीनों वचन तैत्तिरीय आरण्यक ग्रन्थ के हैं।
(सवितु:) ‘य: सुनोत्युत्पादयति सर्वं जगत् स सविता तस्य’ जो सब जगत् का उत्पादक और सब ऐश्वर्य का दाता है। (देवस्य) ‘यो दीव्यति दीव्यते वा स देव:’ जो सर्वसुखों का देनेहारा और जिस की प्राप्ति की कामना सब करते हैं। उस परमात्मा का जो (वरेण्यम्) ‘वत्र्तुमर्हम्’ स्वीकार करने योग्य अतिश्रेष्ठ (भर्ग:) ‘शुद्धस्वरूपम’ शुद्धस्वरूप और पवित्र करने वाला चेतन ब्रह्मस्वरूप है (तत्) उसी परमात्मा के स्वरूप को हम लोग (धीमहि) ‘धरेमहि’ धारण करें। किस प्रयोजन के लिये कि (य:) ‘जगदीश्वर:’ जो सविता देव परमात्मा (न:) ‘अस्माकम्’ हमारी (धिय:) ‘बुद्धी:’ बुद्धियों को (प्रचोदयात्) ‘प्रेरयेत्’ प्रेरणा करे अर्थात् बुरे कामों से छुड़ा कर अच्छे कामों में प्रवृत्त करे।
गायत्री मन्त्र का सरल संस्कृत में भावार्थ: ‘हे परमेश्वर ! हे सच्चिदानन्दस्वरूप! हे नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव ! हे अज निरंजन निर्विकार! हे सर्वान्तर्यामिन्! हे सर्वाधार जगत्पते सकलजगदुत्पादक ! हे अनादे ! विश्वम्भर सर्वव्यापिन्! हे करूणामृतवारिधे! सवितुर्देवस्य तव यदों भूर्भुव: स्वर्वरेण्यं भर्गोऽस्ति तद्वयं धीमहि दधीमहि ध्यायेम वा कस्मै प्रयोजनायेत्यत्राह। हे भगवन् य: सविता देव: परमेश्वरो भवान्नस्माकं धिय: प्रचोदयात् स एवास्माकं पूज्य उपासनीय इष्टदेवो भवतु नातोऽन्यं भवतुल्यं भवतोऽधि कं च कश्चित् कदाचिन्मन्यामहे।
गायत्री मन्त्र का भाषा में अर्थ: हे मनुष्यो ! जो सब समर्थों में समर्थ, सच्चिदानन्दानन्तस्वरूप, नित्य शुद्ध, नित्य मुक्तस्वभाव वाला, कृपासागर, ठीक-ठीक न्याय का करनेहारा, जन्ममरणादि क्लेशरहित, आकाररहित, सब के घट-घट का जानने वाला, सब का धत्र्ता, पिता, उत्पादक, अन्नादि से विश्व का पोषण करनेहारा, सकल ऐश्वर्ययुक्त, जगत् का निर्माता, शुद्धस्वरूप और जो प्राप्ति की कामना करने योग्य है, उस परमात्मा का जो शुद्ध चेतनस्वरूप है उसी को हम धारण करें। इस प्रयोजन के लिये कि वह परमेश्वर हमारे आत्मा और बुद्धियों का अन्तर्यामीस्वरूप से हम को दुष्टाचार अधम्र्मयुक्त मार्ग से हटा कर श्रेष्ठाचारयुक्त सत्य मार्ग में चलावे, उस को छोडक़र दूसरे किसी वस्तु का ध्यान हम लोग नहीं करें। क्योंकि न कोई उसके तुल्य और न अधिक है। वही हमारा पिता, राजा, न्यायाधीश और सब सुखों का देनेहारा है।
यह गायत्री मन्त्र का संक्षिप्तार्थ है जो महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज ने सत्यार्थ प्रकाश में किया है। यह इतना सुन्दर, सार्थक व सारगर्भित अर्थ सर्व प्रथम महर्षि दयानन्द ने सन् 1874 में सत्यार्थ प्रकाश ग्रन्थ को लिखते समय किया था। इतना सुन्दर अर्थ उनसे पूर्व अन्यत्र उपलब्घ नहीं होता। यह गायत्री मन्त्र गुरू मन्त्र भी कहलाता है। क्योंकि इसी मन्त्र का प्रथम माता अपने बालक को घर में और गुरूकुल वा पाठशाला में आचार्य ब्रह्मचारी को उपदेश करते थे। मन्त्र में ईश्वर के स्वरूप व उसके गुण-कर्म-स्वभाव पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ हि इस मन्त्र में जीवन को सफल करने के लिए ईश्वर द्वारा बुद्धि को सद्प्रेरणा देने की प्रार्थना की गई है। बच्चों को प्रेरणा देने का कार्य माता-पिता व आचार्य करते हैं। परमात्मा इन सबका भी आचार्य व गुरू होने के कारण उपासक व याचक द्वारा उस परम आचार्य ईश्वर से ही बुद्धि को सन्मार्ग में चलाने की प्रेरणा करने की प्रार्थना की गई है। परमात्मा आत्मा के भीतर सर्वान्तर्यामी रूप से विद्यमान है। वह हमारे मन के प्रत्येक विचार को जानता है, प्रार्थना को सुनता है और हमारे कर्मों को जानता है। अत: उससे की गई प्रार्थना नि:सन्देह सुनी भी जाती है और पात्रता के अनुसार पूरी भी की जाती है।
महर्षि दयानन्द, मर्यादा पुरूषोत्तम श्री रामचन्द्र, योगेश्वर श्री कृष्ण जी, आचार्य चाणक्य व समस्त ऋषि-मुनि ईश्वर से गायत्री मन्त्र द्वारा श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करने व उसे प्रेरित करने की प्रार्थना करते आये हैं। हम भी गायत्री मन्त्र के अर्थ सहित जप व ईश्वर का ध्यान कर इष्ट को प्राप्त कर सकते हैं। हम आशा करते हैं कि इस गायत्री मन्त्र के अर्थ से अनेक पाठकों को लाभ होगा।

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