आंदोलन क्यों हारा सियासत क्यों जीती ?

पुण्‍य प्रसून वाजपेयी

जेपी के बाद अन्ना आंदोलन ने ही सत्ता की धड़कनें बढ़ायी। और दो बरस में ही सत्ता के दरवाजे पर जेपी के आंदोलनकारी रेंगते और आपस में झगड़ते दिखायी दिये थे। वहीं दो बरस के भीतर ही अन्ना के सिपहसलार राजनीतिक सत्ता की दो धाराओं में बंट भी गये। तो क्या देश में वैकल्पिक राजनीति की सोच अब भी एक सपना है और सियासत की बिसात पर आंदोलन को आज नहीं तो कल प्यादा होना ही है। तो रास्ता है क्या। यह सवाल इसलिये अब जरुरी है और दिल्ली चुनाव तले आंदोलन को याद करना भी इसलिये जरुरी है क्योंकि भविष्य के रास्ते की मौत ना हो सके। याद कीजिये जनलोकपाल। भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आवाज में इतना दम तो था ही कि तिरंगे के आसरे देश में यह एहसास जागे कि भ्रष्ट होती व्यवस्था को बदलना जरुरी है। तभी तो जंतर मंतर से लेकर रामलीला मैदान में जहा आम लोगो का रेला तिरंगे की घुन पर नाचता धिरकता तो सांसदों की धड़कनें बढ़ जाती। सड़क पर भारत माता की जय र वंदे मातरम के नारे लगते तो संसद के भीतर अन्ना हजारे के अनशन को खत्म कराने के लिये सरकार समेत हर राजनीतिक नतमस्तक दिखायी देते। लेकिन जिस जनलोकपाल के नारे तले समूचा देश एकजूट हुआ उसी जनलोकपाल का नारा लगाने वाले ही कैसे अलग हो गये यह पहली बार अगर केजरीवाल के राजनीति में कूदने और अन्ना हजारे का वापस रालेगन सिद्दी लौटने से पहली बार उभरा। तो कभी साथ साथ तिरंगा लहराते हुये भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सूर में आवाज लगाने वाले केजरीवाल के खिलाफ सियासी मैदान में किरण बेदी के कूदने से दूसरी बार उभरा है। दोनों दौर ने उसी राजनीतिक सत्ता को महत्ता दे दी जिस सत्ता को आंदोलन के दौर में नकारा जा रहा था। तो पहला सवाल यही है कि क्या साख खोती राजनीति के खिलाफ आंदोलन करने वालो की साख राजनीतिक मैदान में ही साबित होती है। या फिर दूसरा सवाल कि क्या राजनीतिक सत्ता के आगे आंदोलन कोई वैकल्पिक राजनीति खड़ा कर नहीं सकती। और आखिर में आंदोलन को उसी राजनीति की चौखट पर दस्तक देनी ही पड़ती है जिसके खिलाफ वह खड़ी होती है या फिर जिस राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ वह हुंकार भरती है। क्योंकि केजरीवाल राजनीति में कूदे तब का सवाल और आज किरण बेदी राजनीति के मैदान में कूदी तब के सवाल में इतना ही फर्क आया है कि जनलोकपाल का सवाल हाशिये पर है और जनलोकपाल का सवाल उठाने वाले चेहरे आमने-सामने आ खड़े हुये है। और अब दोनो ही लुटियन्स की दिल्ली में रालेगन सिद्दी के सपनों को पूरा करने का सपना अपने अपने तरीके से जगायेंगे।

यह ऐसे सवाल है जो मौजूदा राजनीति की साख पर सवाल उठाने के बाद घबराने लगते है य़ या फिर साख खो चुकी राजनीतिक सत्ता को ही अपनी साख से कुछ ऑक्सीजन दे देते है और जनता के मुद्दे चुनावी नारों में खत्म हो जाते है। याद किजिये तो 2011 में जनलोकपाल। 2013 में जनलोकपाल से लोकपाल । और 2015 आते आते लोकपाल शब्द भी उसी दिल्ली के उसी सियासी गलियारे से गायब हो चुका है जिस सियासी गलियारे को कभी जनलोकपाल शब्द से डर लगता था। यानी फरवरी 2014 में जिस लोकपाल के लिये सत्ता को भी ताक पर रखने की हिम्मत हुआ करती थी। याद कीजिये तो लोकपाल के लिये सीएम की कुर्सी छोडने की हिम्मत साल भर पहले केजरीवाल में थी। लेकिन साल भर बाद का यानी अभी का सच यह है कि सीएम की कुर्सी के लिये केजरीवाल भी लोकपाल के सवाल से दूर है और आंदोलन के दौर में भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने की सोच से दूर है। मौजूदा दौर में दिल्ली के सीएम की कुर्सी के लिये सारे सवाल बिजली पानी सड़क या कानून व्यवस्था से आगे जा नहीं रहे हैं। इन हालातों ने बीजेपी को भी ताकत दी और किरण बेदी को भी बीजेपी के मंच पर ला खड़ा किया है क्योंकि दिल्ली चुनाव नैतिक बल के आसरे नहीं लड़ा जा रहा है। दिल्ली चुनाव व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर भी नहीं लड़ा जा रहा है। दिल्ली चुनाव भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई नारा भी नहीं दे पा रहा है। कह सकते हैं मौजूदा दिल्ली का चुनाव सिर्फ सीएम की कुर्सी की लड़ाई है। इसलिय किरण बेदी और केजरीवाल के चुनावी संघर्ष का यह मतलब कतई नहीं है आंदोलन के दौर को याद किया जाये। इस चुनावी संघर्ष का सीधा मतलब ईमानदार चेहरों के आसरे चुनाव को अपने हक में करने के आगे बात जाती नहीं है। और यहीं से बड़ा सवाल बीजेपी का निकलता है कि क्या अभी तक दिल्ली चुनाव जहां मोदी बनाम केजरीवाल के तौर पर देखा जा रहा है अब किरण बेदी के बीजेपी में शामिल होने के बाद यही दिल्ली का चुनाव केजरीवाल बनाम किरण बेदी हो जायेगा। यानी मोदी नहीं बेदी के लिये बीजेपी अब नारे लगायेगी और जनलोकपाल के जरीये ईमानदार व्यवस्था की जगह सीएम की कुर्सी की लड़ाई नये रंगत में सामने आयेगी। क्योंकि बीजेपी के जो नेता दिल्ली सीएम बनने की कतार में है उसमें हर्षवर्धन, जगदीश मुखी,सतीश उपाध्याय, विजय गोयल सरीखे दर्जन भर चेहरों पर किरण बेदी सबसे भारी क्यों लग रही है। यानी पहला बड़ा संकेत कि किरण बेदी ने झटके में एहसास करा दिया कि बीजेपी के भीतर दिल्ली के किसी भी प्रोफेशनल राजनेता से उनके प्रोफेशन का कद खासा बड़ा है। या फिर केजरीवाल का जबाब देने के लिये बीजेपी जिन अंधेरी गलियों में घुम रही थी और हर बार उसकी बत्ती गुल हो रही थी उस अंघेरे को अचानक बेदी ने नयी रौशनी दे दी है ।और बीजेपी के लिये किरण बेदी केजरीवाल के खिलाफ रोशनी है तो फिर नयी दिल्ली की सीट पर दोनो का आमना सामना होगा ही। क्योंकि केजरीवाल भी 2013 में दिल्ली के सीएम तब बने जब उन्होंने तब की सीएम शीला दीक्षित को हराया । ऐसे में केजरीवाल के खिलाफ मैदान में उतरने का जुआ तो किरण बेदी को खेलना ही होगा। क्योंकि केजरीवाल को हराते ही किरण बेदी का कद बीजेपी के तमाम कद्दवर नेताओं से बड़ा हो जायेगा। और अगर किरण बेदी केजरीवाल के खिलाफ चुनाव लड़कर हार जाती है तो फिर बीजेपी अपने एजेंडे पर बरकरार रहेगी और बीजेपी की पार्टी की विचारधारा पर कोई असर भी नहीं पड़ेगा। क्योंकि तब यही कहा जायेगा कि केजरीवाल से किरण बेदी चुनाव हारी ना कि बीजेपी। यानी किरण बेजी को बीजेपी के मंच पर साथ लाना बीजेपी के लिये मास्टरस्ट्रोक इसीलिये है क्योंकि चित पट दोनों हालात में मोदी की छवि पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लगातार चुनाव जीतती बीजेपी की छवि पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सिर्फ इतना ही कहा जायेगा कि चाल ठीक नही चली। और झटके में मोदी सरकार की वह रफ्तार बरकरार भी रह जायेगी जिसके रुकने का भय तो लगातार बीजेपी को डरा रही है। लेकिन पहली बार किरण बेदी और केजरीवाल के आमने सामने खड़े होने से उस आम आदमी को मुश्किल तो होगी ही जिसने अन्ना के आंदोलन के दौर में भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यवस्था परिवार्तन तक के सपने देखे।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
otobet giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
otobet giriş
otobet giriş
otobet giriş
betyap giriş
betyap giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
betpark giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betgaranti giriş
betpark giriş