“पंडित जी, बीपीएल या बीएमडब्ल्यू…चुनना तो एक को ही पड़ेगा”

पुण्‍य प्रसून वाजपेयी

 धारदार पत्रकारिता से मात तो मीडिया को ही देनी है दीपक शर्मा !

बीपीएल या बीएमडब्ल्यू। रास्ता तो एक ही है। फिर यह सवाल पहले नहीं था। था लेकिन पहले मीडिया की धार न तो इतनी पैनी थी और न ही इतनी भोथरी। पैनी और भोथरी। दोनों एक साथ कैसे। पहले सोशल मीडिया नहीं था। पहले प्रतिक्रिया का विस्तार इतना नहीं था। पहले बेलगाम विचार नहीं थे। पहले सिर्फ मीडिया था। जो अपने कंचुल में ही खुद को सर्वव्यापी माने बैठा था। वही मुख्यधारा थी और वही नैतिकता के पैमाने तय करने वाला माध्यम। पहले सूचना का माध्यम भी वही था और सूचना से समाज को प्रभावित करने वाला माध्यम भी वही था। तो ईमानदारी के पैमाने में चौथा खम्भा पक़ड़े लोग ही खुद को ईमानदार कह सकते थे और किसी को भी बेईमानी का तमगा देकर खुद को बचाने के लिये अपने माध्यम का उपयोग खुले तौर पर करते ही रहते थे।

बंधु, लेकिन अंतर तो पहले भी नजर आता था। कौन पत्रकार बीपीएल होकर पत्रकारिता करने से नहीं हिचकता और किसकी प्राथमिकता बीमडब्ल्यू है। लेकिन पहले कोई विस्तार वाला सार्वजनिक माध्यम भी नहीं था जिसके आसरे बीएमडब्ल्यू वाली पत्रकारिता का कच्चा चिट्टा सामने लेकर आते।

यह ठीक है लेकिन हमारे समाज का भी तो कोई सोशल इंडेक्स नहीं है। जिसे जितना कमाना है वह कमाये। जिसे जितना बनाना है वह बनाये। कोई रोक-टोक नहीं है। दिल्ली में तो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के प्रवक्ता, जो पेशे से वकील हैं या रहे हैं, एक पेशी के 20 से 40 लाख रुपये तक लेते हैं। संपादक की पहुंच पकड़ अगर सत्ताधारियों के बीच है तो उसका पैकेज करोड़ों में होता है। किसी भी धंधे में कोई कमाते-खाते हुये यह कहने से नहीं कतराता है कि अगर उसके पास करोड़ों है तो वह उसकी सफेद कमाई के हैं। अब आप करोगे क्या।

बंधु, एक चैनल पत्रकारों का हो इसके लिये तो आपको करोडपति होना होगा, उसके बाद आप पत्रकार हैं या चिट-फंड वाले या बिल्डर या दलाल। सरकार की नीतियों तक तो इसका असर पड़ता नहीं है। तो फिर इस बीपीएल और बीएमडब्ल्यू के रास्ते की बात करने का मतलब है क्या। हां अब हालात इस मायने में जरुर बदले है कि दलाल पत्रकारों को सत्ता अपने साथ सटने नहीं दे रही है। लेकिन इसका दूसरा सच यह भी है कि दलालों के तरीके और उसकी परिभाषा बदल रही हैं। काबिलियत की पूछ तो अब भी नहीं है। या यह कहें कि देश में सत्ता बदली है तो नये सिरे से नये पत्रकारों को सत्ता अपने कटघरे में ढाल रही है। तब तो यह बीच का दौर है और ऐसे मौके का लाभ पत्रकारिता की धार के साथ उठाना चाहिये। बिलकुल उठाना चाहिये।

लेकिन इसके लिये सिर्फ सोशल मीडिया को तो माध्यम बनाया नहीं जा सकता। सोशल मीडिया एक कपडे उघाडने का मंच है। कपडे पहनकर उसके अंदर बाहर के सच को बताने का माध्यम तो है नहीं। नहीं आप देख लो। मनमोहन सिंह के दौर के तुर्रम संपादक मोदी के आने के बाद सिवाय सोशल मीडिया के अलावा और कहां सक्रिय नजर आ रहे हैं। लेकिन वहां भी तो भक्तों की मंडली पत्रकारो की पेंट उतारने से नहीं चुकती। सही कह रहे हैं, लेकिन इस सच को भी तो समझें कि रईसी में डूबे सत्ता की चाशनी में खुद को सम्मानित किये इन पत्रकारो ने किया ही क्या है। तब तो सवाल सिर्फ मनमोहन सिंह के दौर के पत्रकारो भर का नहीं होना चाहिये। हमने देखा है कैसे वाजपेयी की सरकार के बाद बीजेपी कवर करने वाले पत्रकार ही कद पाने लगे । और लगा कि इनसे बेहतर पत्रकार कोई है ही नहीं। पत्रकारिता खबर ब्रेक करने पर टिकी। सत्ता ने खबर ब्रेक अपने पत्रकारों से करायी। और खबर का मतलब ही धीरे धीरे सत्ता की खबर ब्रेक करने वालों से होने लगी। सोनिया गांधी पीएम बनना नहीं चाहती हैं। या अंबानी बंधुओं में बंटवारा हो रहा है । वाजपेयी मुखौटा है। आडवानी संघ के चहते हैं। इन खबरो को ब्रेक करने वाला ज्यादा बड़ा पत्रकार है या साईंनाथ सरीखा पत्रकार, जो किसानो की बदहाली के बीच सत्ता की देशद्रोही नीतियों को बताना चाहता है। यह सवाल तो अब भी मौजूं है। खाता कोल कर सीधे गरीब के एकाउंट में पैसा पहुंचाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिये या यूरिया बाजार में उचित दाम पर मिल जाये । पीएमओ की ताकत के सामने कैबिनेट भी नतमस्तक कैसे हो चली है, यह छुपाया जाये और सत्ता की नीतियों के एलान को ही मीडिया के भोपूं के जरीये दुनिया तो ज्यादा जोर सुनाया जाये। और इसे ही पत्रकारिता मान लिया जाये। यही सवाल तो महत्वपूर्ण है। तो फिर धार का पैमाना हो कैसा।

यार आप बात देश की कर रहे हो और हर दिन जिस वातावरण में नौकरी करनी पड़ती है, उसमे चापलूसी , अपने प्यारे को ही आगे बढ़ाने की सोच, अपनी कुर्सी को ही सबसे विद्दतापूर्ण बताने जताने का खुला खेल। खुद को बचाते हुये हर दिन अपने ही इर्द-दिर्द ऐसी खबरो को तरजीह देना जो आपकी समझ में आती हों। जो आपके अपनों की हो। और स्क्रीन पर वही चेहरा-चेहरे, जिससे आपको प्यार है उस वातावरण में आपका पूरा दिन तो सिवाय जहर का घूंट पीने के अलावे और किसमें गुजरेगा। इतना ही नहीं, आपकी लायी बेहतरीन खबर की भी हत्या करने में कितना वक्त लगेगा। डाक्यूमेंट पूरे नहीं हैं। प्रतिक्रिया हर किसी की चाहिये। फायदा क्या है दिखाने का। कौन देखना चाहता है यह सब। टीआरपी मुश्किल है। हुजुर हजारों हथियार है नाकाबिल एडिटर के पास।

फिर भी यार भीतर रह कर लड़ा जा सकता है। बाहर निकलकर हम आप तो कहीं भी काम कर लेंगे । लेकिन जिन संस्थानों में जो नयी पीढी आ रही है, उनका भी सोचिये। या नाकाबिलों के विरोध करने की हिम्मत कहां बच रही है। नाकाबिल होकर मीडिया में काम आसानी से मिल सकता है। बंधु सवाल सिर्फ मीडिया का नहीं है। सत्तादारी भी तो नहीं चाहते है कि कोई उनसे सवाल करे। तो वह भी भ्रष्ट्र या चार लाइन ना लिख पाने या ना बोल पाने वाले पत्रकारों को ज्यादा तरजीह देते हैं। जिससे उनकी ताकत, उनकी नीतियां या उनकी समझ पर कोई उंगुली उठाता ना दिखे। यह ऐसे सवाल हैं, जिन पर बीते दस बरस से कई कई बार कई तरीको से बात हुई।

जी, यह उस बातचीत का हिस्सा है जो 2004 में पहली बार मुलाकात के वक्त मीडिया को लेकर सवाल हों या पत्रकारिता करने के तरीकों को जिन्दा रखने की कुलबुलाहट होती थी और जब सांप-छछुंदर की खबरों ने

पत्रकारीय पेशे को ही दिन भर चाय की चुस्की या हवाखोरी में तब्दील करते हुए दिल्ली से दूर निकल जाने के लिये खूब वक्त मुहैया कराया था। या फिर जैसे ही देश में मनमोहन सरकार की बत्ती गुल होने की खुशी के वक्त चर्चा में मोदी सरकार को लेकर कुछ आस जगाने की सोच हो। या फिर अंबानी-अडानी की छाया में दिल्ली की सत्ता तले सियासी बहस के दौर में मीडिया की भूमिका को लेकर उठते सवालों के बीच धारदार पत्रकारिता कैसे हो, इसका सवाल हो। आपसी चर्चा तो राडिया टेप पर पत्रकारों की भूमिका को लेकर भी खूब की और पत्रकार से मालिक बनते संपादकों की भी की और मालिको का पत्रकार बनने के तौर तरीको पर खूब की।लेकिन हर चर्चा के मर्म में हमेशा पत्रकारिता और जीने के जज्बे की बात हुई। इसलिये राबर्ट वाड्रा पर पहले कौन राजनेता अंगुली उठायेगा और जब नरेन्द्र मोदी ने पहली बार खुले तौर पर वाड्रा को कठघरे में खड़ा किया तो भी विश्लेषण किया कि कैसे बीजेपी का भी दिल्ली में कांग्रेसीकरण हो गया था और मोदी क्यो अलग है। चर्चा मनमोहन सिंह के दौर के क्रोनी कैपटिलिज्म के दायरे में पत्रकारों के खड़े होने पर भी बात हुई। फिर मुज्जफरनगर दंगों में सैफई के नाच गानों के बीच यूपी सरकार को कठघरे में खड़ा करने का जज्बाहो। या मोदी सरकार के महज एलानिया सरकार बनने की दिशा में बढते कदम। हर बार ईमानदार-धारदार पत्रकारिता को ही लेकर बैचेनी दिखायी दी। लेकिन जैसे ही यह जानकारी मिली की बारह बरस बाद दीपक शर्मा आजतक छोड़ रहे हैं और यह कहकर छोड़ रहे हैं कि कुछ नया,कुछ धारदार करने की इच्छा है तो पहली बार लगा कि मीडिया संस्थान हार रहे हैं। जी दीपक शर्मा की अपनी पत्रकारिता है या पत्रकारिता को जीने के हर सपने को बीते बारह बरस में बेहद करीब से या कहें साझीदार होकर जीने के बीच में यह सवाल बार बार परेशान कर रहा है कि जिसके लिये पत्रकारिता जीने का अंदाज है। जिसके लिये ईमानदार पत्रकारिता जीने का नजरिया हो। जिसके लिये तलवार की नोंक पर चलते हुये पत्रकारिता करना जिन्दगी का सुकुन हो, वही ऐसे वक्त पर यह क्यों कह रहा है कि दिल्ली आया था तो अकबर रोड भी नहीं जानता था। आजतक में काम करते हुये आजतक ने अकबर बना दिया। अब दुबारा रोड पर जा रहा हूं। यह बेचैनी दीपक से पत्रकारिता के लिये कोई वैकल्पिक रास्ता निकलवा ले तो ही अच्छा है । क्योंकि दिल्ली में अब सवाल अकबर रोड का नहीं रायसीना हिल्स पर खड़े होकर बहादुरशाह जफर मार्ग को देखने समझने का भी है। और शायद भटकते देश को पटरी पर लाने का जिम्मा उठाने का वक्त भी है। इसलिये दीपक सरीखे पत्रकारों को सोशल मीडिया की गलियों में खोना नहीं है और हारे हुये मीडिया से शह पाकर मात भी उसी मीडिया को देनी है जो धंधे में बदल चुका है।

(लेख्‍ाक इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं)

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