स्वतन्त्रता के उद्घोषक:श्री अरविन्द जन्मदिन 15 अगस्त

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पूर्व-जन्म के संस्कारों से कुछ होता भी है ?
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18 वीं सदी के उतरार्ध में तब के पूर्वी बंगाल के खुलना में एक डॉक्टर हुए, नाम था कृष्णधन घोष. इधर देश भी मैकाले प्रणीत शिक्षा नीति से अभिशप्त था ऊपर से घोष साहेब विलायत से डॉक्टरी पढ़ कर आये थे इसलिये अंग्रेजियत उन के ऊपर अंग्रेजों से भी अधिक हावी थी. उन्हें भारत, भारतीयता, हिन्दू धर्म, हिन्दू-परंपरा और अपनी संस्कृति से बेइंतेहा चिढ़ थी.

इसलिये जब उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो घर में सबसे कह दिया कि मेरे बेटे को दकियानूस और मूर्तिपूजक हिन्दू संस्कार से दूर रखा जाये. बेटा कुछ बड़ा हुआ तो उसे अंग्रेजों के स्कूल में अंग्रेज शिक्षकों के मातहती में छोड़ आये. पुत्र जब उस परवरिश से बाहर आया तो उसे सिवाय अंगरेजी और कोई भारतीय भाषा यहाँ तक की अपनी मातृभाषा बांग्ला भी नहीं आती थी.

घर में नौकरों के कारण उस बालक ने थोड़ा बहुत हिंदी और बांग्ला सीख लिया तो पिता चिंतित हो गये कि ये जाहिलियत की ओर जा रहा है इसलिये सपरिवार पुत्र को लेकर विलायत चले गये और वहां बेटे को एक ईसाई पादरी के हवाले कर दिया और उसे सख्त निर्देश दिया कि उन के बच्चे को न तो किसी भारतीय से मिलने दे और न ही भारत के बारे में कोई जानकारी दी जाये.

इसी बीच कृष्णधन घोष को एक और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, अब चूँकि उन का विलायती मन बेटे को हिन्दू नाम देने से भी हिचक रहा था इसलिये पुत्र का नाम जीसस के आरंभिक नाम पर इमैनुअल रखा.

कृष्णधन घोष के दोनों बेटों को पश्चिमी तालीम दी जाने लगी. लड़के को लैटिन, यूनानी, फ्रेंच से लेकर और भी कई यूरोपीय भाषायें सिखाई गई. मतलब ये कि युवावस्था पाने तक जन्मना हिन्दू कृष्णधन घोष के बेटों को हिन्दू संस्कार छू भी नहीं पाया था पर एक दिन कुछ कुछ ऐसा हुआ जिस ने कृष्णधन घोष के बेटों का सब कुछ बदल कर रख दिया.

हुआ यूं कि इन भाईयों के सामने एक ईसाई प्रचारक ने हिन्दू धर्म के बारे में कुछ अनर्गल बात कह दी. पूर्व जन्म का उत्तम संस्कार उन भाइयों के पश्चिमी परवरिश पर हावी हो गया और हिन्दू धर्म पर पादरी द्वारा लगाये आक्षेपों का उन भाइयों ने मुंहतोड़ जबाब दिया. एक झटके में उन के ऊपर से ईसाईयत का रंग उतर गया, पिता ने जबर्दस्ती आई० सी० एस० की परीक्षा में बैठाया, सभी विषयों में उत्तीर्ण हो गये पर उनका मन अंग्रेजों की सेवा के लिये तैयार नहीं था इसलिये उस परीक्षा के अंतिम पेपर में गये ही नहीं और फिर एक दिन भारत आ गये.

भारत भूमि पर पहला कदम रखते ही उन्हें एक दिव्य अनुभूति हुई, समझ में आ गया कि परमात्मा ने उन्हें भारत में ही क्यों पैदा किया. ईसाई संस्कार में पले-बढ़े उस शख्स के हाथ में भगिनी निवेदिता की पुस्तक ‘काली माता’ लग गई, फिर उस के बाद तो पश्चिम के सारे कुसंस्कार धुल गये.

अब वो सिर्फ भारत के लिये थे. यहाँ आकर अपनी मातृभाषा बांग्ला सीखी, हिंदी सीखी, संस्कृत सीखी, फिर वेदों का पारायण किया. सौभाग्य से योगी बिष्णु भास्कर भी उन्हें मिल गये जिन्होंने उन को योग की दिव्यता का एहसास कराया. ध्यान मग्न हुए तो प्रथम आध्यात्मिक अनुभूति हुई. उसी समय बंगाल में अंग्रेजों की बंग-भंग की भारत-तोड़ो योजना शुरू हुई थी, वो कलकत्ता आ गये और खुल कर भारत के स्वाधीनता यज्ञ में कूद पड़े. उन्होंने युगांतर और वन्दे-मातरम् जैसा कालजयी अखबार निकाला. उनकी गतिविधियों से परेशान अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर कलकत्ता की अलीपुर जेल में डाल दिया.

जेल जाना उन के लिये वरदान साबित हुआ क्यों कि इसी जेल के अंदर उन्हें सत्य का साक्षात्कार हुआ, कृष्ण की गीता-वाणी सुनाई दी, भारत माता के दर्शन हुए, स्वामी विवेकानंद के शब्द सुनाई दिये जेल से निकल कर उत्तरपाड़ा में अपने ध्येय को देश के सामने रखते हुए कहा, “जब यह कहा जाता है कि भारत महान बनेगा तब इसका अर्थ होता है कि सनातन धर्म महान बनेगा.

जब भारत अपना विस्तार करेगा तब इंगित होता है कि सनातन धर्म अपना विस्तार कर सारे विश्व में फैलेगा. भारत धर्म के लिये एवं धर्म से ही जीवन्त है. धर्म की व्याख्या में ही राष्ट्र की व्याख्या भी है”

ये महापुरुष थे महर्षि अरविंद घोष और उनके भाई का नाम था प्रसिद्ध क्रांतिकारी वारीन्द्र घोष, ये वारीन्द्र घोष वही थे जिन्हें उनके पिता ने इमैनुअल नाम दिया था.

कहते हैं कि बच्चे को संस्कार तीन जगहों से मिलते हैं उसके घर से, उसके स्कूल से और उस की मित्र मंडली या समाज से. सवाल है कि अरविन्द और वारीन्द्र को हिंदुत्व और भारत भक्ति का संस्कार न तो घर से मिला, न स्कूल से मिला और न ही समाज से मिला फिर किस संस्कार ने उन्हें भारत-भक्ति सिखाई, अपने हिंदुत्व, भाषा, संस्कृति और परंपरा पर गर्व करना सिखाया? किस संस्कार ने बाईबिल पढ़ कर बड़े हुए अरविंदो को वेद-भाष्य करने को प्रेरित किया?

जबाब एक ही मिलता है उन के पूर्व जन्म के पावन संस्कारों ने जिस पर कुछ अवधि के लिये भले कुसंस्कृति की गर्द जम गई थी पर जैसे ही कुछ पुण्यात्माओं का दर्शन हुआ वो सारी गर्द छंट गई.

याद रखिये, पूर्व जन्म के संस्कार उत्तम हैं तो जे० एन० यू० का कलुषित माहौल, जाकिर और बेनी हिल के लेक्चर और प्रेश्याओं का दुष्प्रचार भी आपको बिगाड़ नहीं सकता और अगर पूर्व जन्म के संस्कार कलुषित हैं तो संघ प्रचारकों या ऋषि-मुनियों का सानिध्य भी आपको सुधार नहीं सकता.

पिछले जन्म पर तो हमारा वश नहीं है पर कम से कम इस जन्म में खुद को और अपनी संतति को ऐसे संस्कारित जरूर करिए कि आपका या उनका अगला जन्म भारत-भक्ति के संस्कारों से निर्मित हो ताकि भारत माँ और सनातन के लिए बलिदान होने वालों का कभी इस देश में अकाल न पड़े.
✍🏻अभिजीत सिंह

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में श्री अरविन्द का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।उनका बचपन घोर विदेशी और विधर्मी वातावरण में बीता;पर पूर्वजन्म के संस्कारों के बल पर वे महान आध्यात्मिक पुरुष कहलाये।
उनका जन्म १५ अगस्त,१८७२ को डा. कृष्णधन घोष के घर में हुआ था।उन दिनों बंगाल का बुद्धिजीवी और सम्पन्न वर्ग ईसाइयत से अत्यधिक प्रभावित था।वे मानते थे कि हिन्दू धर्म पिछड़ेपन का प्रतीक है।भारतीय परम्पराएँ अन्धविश्वासी और कूपमण्डूक बनाती हैं;जबकि ईसाई धर्म विज्ञान पर आधारित है।अंग्रेजी भाषा और राज्य को ऐसे लोग वरदान मानते थे।

डा.कृष्णधन घोष भी इन्हीं विचारों के समर्थक थे।वे चाहते थे कि उनके बच्चों पर भारत और भारतीयता का जरा भी प्रभाव न पड़े।वे अंग्रेजी में सोचें,बोलें और लिखें।इसलिए उन्होंने अरविन्द को मात्र सात वर्ष की अवस्था में इंग्लैण्ड भेज दिया।अरविन्द असाधारण प्रतिभा के धनी थे।उन्होंने अपने अध्ययन काल में अंग्रेजों के मस्तिष्क का भी आन्तरिक अध्ययन किया।अंग्रेजों के मन में भारतीयों के प्रति भरी द्वेष भावना देखकर उनके मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा उत्पन्न हो गयी।उन्होंने तब ही संकल्प लिया कि मैं अपना जीवन अंग्रेजों के चंगुल से भारत को मुक्त करने में लगाऊँगा।

अरविन्द घोष ने क्वीन्स कालिज,कैम्ब्रिज से १८९३ में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की।इस समय तक वे अंग्रेजी,ग्रीक,लैटिन,फ्रेंच आदि १० भाषाओं के विद्वान् हो गये थे।इससे पूर्व १८९० में उन्होंने सर्वाधिक प्रतिष्ठित आई.सी.एस. परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी।अब उनके लिए पद और प्रतिष्ठा के स्वर्णिम द्वार खुले थे;पर अंग्रेजों की नौकरी करने की इच्छा न होने से उन्होंने घुड़सवारी की परीक्षा नहीं दी।यह जान कर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें ‘स्वदेश की आत्मा’ की संज्ञा दी।इसके बाद वे भारत आ गये।
भारत में १८९३ से १९०६ तक उन्होंने बड़ोदरा (गुजरात) में रहते हुए राजस्व विभाग,सचिवालय और फिर महाविद्यालय में प्राध्यापक और उपप्राचार्य जैसे स्थानों पर काम किया।यहाँ उन्होंने हिन्दी,संस्कृत,बंगला,गुजराती,मराठी भाषाओं के साथ हिन्दू धर्म एवं संस्कृति का गहरा अध्ययन किया;पर उनके मन में तो क्रान्तिकारी मार्ग से देश को स्वतन्त्र कराने की प्रबल इच्छा काम कर रही थी।अतः वे इसके लिए युवकों को तैयार करने लगे।

अपने विचार युवकों तक पहुँचाने के लिए वे पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखने लगेे।वन्दे मातरम्,युगान्तर,इन्दु प्रकाश आदि पत्रों में प्रकाशित उनके लेखों ने युवाओं के मन में हलचल मचा दी।इनमें मातृभूमि के लिए सर्वस्व समर्पण की बात कही जाती थी।इन क्रान्तिकारी विचारों से डर कर शासन ने उन्हें अलीपुर बम काण्ड में फँसाकर एक वर्ष का सश्रम कारावास दिया।
कारावास में उन्हें स्वामी विवेकानन्द की वाणी सुनायी दी और भगवान् श्रीकृष्ण से साक्षात्कार हुआ।अब उन्होंने अपने कार्य की दिशा बदल ली और ४ अप्रैल,१९१० को पाण्डिचेरी आ गये।यहाँ वे योग साधना,अध्यात्म चिन्तन और लेखन में डूब गये।
१९२४ में उनकी आध्यात्मिक उत्तराधिकारी श्रीमाँ का वहाँ आगमन हुआ।
२४ नवम्बर,१९२६ को उन्हें विशेष सिद्धि की प्राप्ति हुई। इससे उनके शरीर का रंग सुनहरा हो गया।

श्री अरविन्द ने अनेक ग्रन्थों की रचना की।अध्यात्म साधना में डूबे रहते हुए ही ५ दिसम्बर,१९५० को वे अनन्त प्रकाश में लीन हो गये!!

15 अगस्त श्री अरबिंदो का जन्मदिन है।

महर्षि अरविन्द ने
भारतीय शिक्षा चिन्तन में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। उन्होंने सर्वप्रथम घोषणा की कि मानव, सांसारिक जीवन में भी दैवी शक्ति प्राप्त कर सकता है। वे मानते थे कि मानव, भौतिक जीवन व्यतीत करते हुए तथा अन्य मानवों की सेवा करते हुए अपने मानस को ‘अति मानस’ (supermind) तथा
स्वयं को ‘अति मानव’ (Superman) में परिवर्तित कर सकता है।
शिक्षा द्वारा यह संभव है।

आज की परिस्थितियों में जब हम अपनी प्राचीन सभ्यता,
संस्कृति एवं परम्परा को भूल कर भौतिकवादी सभ्यता का अंधानुकरण कर रहे हैं, अरविन्द का शिक्षा दर्शन
हमें सही दिशा का निर्देश करता हैं।
आज धार्मिक एवं अध्यात्मिक जागृति की नितान्त आवश्यकता है।
श्री वी आर तनेजा के शब्दों में-
“श्री अरविन्द का शिक्षा-दर्शन
लक्ष्य की दृष्टि से आदर्शवादी,
उपागम की दृष्टि से यथार्थवादी, क्रिया की दृष्टि से प्रयोजनवादी तथा महत्त्वाकांक्षा की दृष्टि से मानवतावादी है।
हमें इस दृष्टिकोण को शिक्षा में अपनाना चाहिए।”

कुछ आध्यात्मिक चेतना युक्त आत्मा सूक्ष्म जगत से स्थूल जगत में विशिष्ट कार्यों को संपादित करने हेतु ही जन्म लेती हैं।
वे अपने लक्षित प्रयोजन के निहितार्थ ही सक्रिय रहती हैं।
किसी अन्य लाभ – हानि, आकांक्षा- महत्वाकांक्षा के बारे में विचार किए बिना…
श्री अरविन्द घोष उनमें से ही एक महर्षि थे।

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