नाम में क्या रखा है?

शिवसेना के एक नेता ने मांग की है कि संविधान में से ‘सेकुलर’ और ‘सोशलिस्ट’ शब्द निकाल दिए जाएं। ये दोनों शब्द आपात्काल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए थे। इस बार गणतंत्र दिवस पर जो सरकारी विज्ञापन जारी किए गए, उनमें मूल प्रस्तावना का चित्र दिया गया था, जिसमें ‘सेकुलर’ और ‘सोशलिस्ट’ शब्द नहीं थे। शिव सेना कहती है कि यही अब हमारी नीति होनी चाहिए। भारत ‘सेकुलर’ हो ही नहीं सकता, क्योंकि मुसलमानों के लिए तो 1947 में पाकिस्तान बना दिया गया था। जो बच गया, वह हिन्दुओं का राष्ट्र याने हिंदू राष्ट्र है। इसी तरह समाजवाद भी ढोंग है, क्योंकि कांग्रेस ने ही समाजवाद को तिलांजलि दे दी थी। 1991 में नरसिंहराव और मनमोहन सिंह ने ही समाजवाद को कब्र में सुला दिया था।

शिव सेना के ये तर्क मोटे तौर पर ठीक मालूम पड़ते हैं लेकिन इनके आधार पर इन दोनों शब्दों को संविधान से हटाने की कोई तुक दिखाई नहीं पड़ती। इन शब्दों के रहने से जैसे कोई खास फर्क नहीं पड़ता, वैसे ही इनको हटा देने से भी कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है। यदि ‘सेकुलर’ शब्द हट गया तो भारत हिंदू राष्ट्र कैसे बन जाएगा? क्या मोदी सरकार में इतना दम है कि वह भारत के संविधान को हिंदू राष्ट्र का संविधान बनवा दे या कहलवा दे? उसके लिए हिंदू शब्द की परिभाषा करना ही असंभव हो जाएगा और फिर हमारे वर्तमान संविधान से समानता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व जैसी अवधारणाओं को भी निकाल बाहर करना होगा। इसके अलावा मोदी सरकार के माथे पर सांप्रदायिकता का बिल्ला चिपक जाएगा।

जहां तक हिंदुत्व का प्रश्न है, शिव सैनिकों से मेरा अनुरोध है कि वे वीर सावरकर के ग्रंथ ‘हिंदुत्व’ को जरा ध्यान से पढ़ें और सावरकरजी को भी जरा गहराई से जानने की कोशिश करें। उन्हें आश्चर्य होगा कि उनसे अधिक ‘सेकुलर’ व्यक्ति खोजना कठिन होगा। यदि कोई व्यक्ति सच्चा हिंदू है तो उससे बड़ा ‘सेकुलर’ कौन हो सकता है?

जहां तक समाजवाद का सवाल है, मुझे वह कथन अब भी याद है, जो अब से 55 साल पहले मैंने बीए की कक्षा में पढ़ा था। जोड ने कहा था कि समाजवाद ऐसी टोपी है, जिसका अपना कोई आकार नहीं है। जैसे सिर पर वह रखी जाती है, उसका आकार वैसा ही हो जाता है। वह गोल भी है, चौखुटी भी है, टेढ़ी भी है, उल्टी भी है, सीधी भी है। लेनिन और स्तालिन तो समाजवादी थे ही, हिटलर भी खुद को ‘राष्ट्रवादी समाजवादी’ कहता था। फिदेल कास्त्रो, माओ-त्से-तुंग, मार्शल, टीटो, लियोन त्रात्सकी, ज.ला. नेहरु, लोहिया, जयप्रकाश भी समाजवादी थे। मुलायमसिंह की पार्टी का नाम समाजवादी पार्टी है। तंग श्याओ पिंग का चीन भी समाजवादी है। इसीलिए नरेंद्र मोदी का भारत भी यदि खुद को समाजवादी कहे तो उसका कोई खास मतलब नहीं है। असली बात तो है-काम! नाम में क्या रखा है? कई अंधों का नाम ‘नयनसुख’ होता है और नुक्कड़ पर खड़े होकर भीख मांगने वालों का नाम अमीरचंद होता है।

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