ओबामा ने बजाया दूर का ढोल

ओबामा की इस भारत-यात्रा के बारे में साफ-साफ क्या कहा जाए? हमने चार दिन पहले जो शंका व्यक्त की थी, लगता है, वह शंका सही सिद्ध हो रही है। जैसा कि हमें संदेह था, चीन, जापान, रुस, नेपाल आदि की शीर्ष नेताओं से भारतीय प्रधानमंत्री का जो संवाद हुआ, वह जैसे खाली झुनझुना सिद्ध हुआ, वैसे ही कहीं ओबामा की यह यात्रा भी दूर का ढोल सिद्ध न हो जाए! झुनझुना नहीं, ढोल! ढोल इसलिए कि इस यात्रा का जैसा धुआंधार प्रचार हुआ और इसकी तैयारी में जैसा बेशुमार खर्च हुआ, वैसा किसी अन्य राष्ट्राध्यक्ष की यात्रा पर नहीं हुआ। इसके अलावा जैसी अनौपचारिक आत्मीयता ओबामा और मोदी के बीच दिखाई पड़ी, वैसी मुझे पिछले 50-55 साल में कभी दिखाई नहीं पड़ी।

आज तक मैंने भारत के किसी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को किसी विदेशी नेता को उसके पहले नाम से पुकारते हुए नहीं सुना। यह ठीक है कि नरेंद्र भाई विदेश नीति के मामले में अभी नौसिखिए हैं लेकिन उनके अफसरों को चाहिए था कि उन्हें वे न्यूनतम कूटनीतिक शिष्टाचार से अवगत कराते। जब उन्होंने बराक ओबामा को सिर्फ ‘बराक’ कहकर पुकारा तो मैं समझ गया कि हमारे मोदीजी का अमेरिकीकरण हो गया है। अमेरिकी बच्चे अपने बाप को भी पहला नाम लेकर ही बुलाते हैं। यदि भारतीय उच्चारण होता तो वे या तो ‘जी’ लगाते या ‘साहब’ लगाते या कुछ नहीं तो ‘श्री’ ही लगा देते। खैर, इससे इतना पता चल गया कि दोनों में काफी अनौपचारिकता उत्पन्न हो गई है। यह कोई बुरी बात नहीं है। अच्छी बात है।

लेकिन यह अच्छी बात दोनों के कंधों से उतरकर नीतियों तक पहुंच पाती तो चमत्कार हो जाता। परमाणु-दुर्घटना मुआवजे पर आखरी फैसला क्या हुआ, किसी को भी पता नहीं। यदि ओबामा और मोदी बीमे की शर्तों पर सहमत हो गए तो भी यह जरुरी नहीं कि परमाणु भट्ठियां बनाने वाली कंपनियां भी सहमत हो जाएं। वे डॉलर कमाने पर तुली हुई हैं। उन्हें भारत के लाभ से क्या लेना देना? जहां तक परमाणु-सामग्री पर से अमेरिकी निगरानी हटाने का सवाल है, वह मामूली बात है। उससे उन कंपनियों का क्या नुकसान होने वाला है?

यह परमाणु-समझौता यदि अधर में लटका रहे तो भी खास बुरा नहीं है। भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियां तो इसे ‘विनाशकारी’ ही मानती थी। दस साल के नए रक्षा-सामग्री समझौते में से पता नहीं क्या निकलेगा? दोनों देशों के बीच व्यापार कितना बढ़ेगा और भारत में अमेरिकी पूंजी कितनी लगेगी, इसका भी कोई ठोस संकेत नहीं है। आतंकवाद के विरुद्ध भी घिसी-पिटी बात दोहरा दी गई है। ओबामा ने पाकिस्तान का नाम तक नहीं लिया। उनकी दृष्टि से यह ठीक था लेकिन भारत को यह पता नहीं चल पाया कि अफगानिस्तान में उसकी भूमिका क्या होगी? दक्षिण एशिया में भारत का महत्व क्या है? 21 वीं सदी का भी उन्होंने चलते-चलते जिक्र कर दिया। मिशेल को लेकर वे ताजमहल भी नहीं देख सके। तो फिर ओबामा ने इतना कष्ट क्यों किया? हां, उन्हें धन्यवाद कि उनके कारण हमारे मोदीजी लगभग हफ्ता भर चैनलों और अखबारों में सुर्खियां पाते रहे।

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