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‘राजतरंगिणी’ का शाब्दिक अर्थ

भारत के प्राणतत्व के साथ किस प्रकार कश्मीर एकाकार होकर रहा है ? इस पर कल्हण जैसे मनीषी ने अपनी पुस्तक ‘राजतरंगिणी’ में विशेष प्रकाश डाला है। कश्मीर के इतिहास को जानने के लिए सचमुच ‘राजतरंगिणी’ एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस पुस्तक के नामकरण में भी कवि की विद्वता झलकती है। विवेक और वैराग्य की अभिव्यक्ति देने वाला यह नाम भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को समझाने में भी सहायक होता है।
जैसे नदी की जल की धारा निरंतर प्रवाहमान रहती है और जल की बूंदों को ले जा ले जाकर विशाल समुद्र को सौंप देती है, और इसके उपरांत भी उसका प्रवाह बना रहता है, वह सूखती नहीं। धरती पर बहता हुआ समुद्र होती है – नदी। जो समुद्र की ओर ही भाग रही होती है। उसके अपने गुण समुद्र से मेल खाते हैं इसलिए समुद्र से मिलना उसका स्वाभाविक लक्ष्य है। संसार में प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति और पदार्थ अपने गुण -कर्म – स्वभाव के अनुसार अपने सजातीय गुण – कर्म – स्वभाव वालों की ओर आकर्षित हो रहा है । उसी की ओर भाग रहा है। मानो नदी की भान्ति उसी में मिल जाना चाहता है।
नदी की एक बूंद अपनी अन्य सजातीय असंख्य बूंदों के साथ जल का विशाल प्रवाह बनकर निरंतर प्रवाहमान बनी रहती है और समुद्र में जा मिलती है। बूंद कब हमारे सामने से गुजर गई और कब दूसरी बूंद आकर उसके स्थान पर विराजमान हो गई जैसे हमें इसका पता नहीं चलता वैसे ही यह काल-प्रवाह है। जिस पर अनेकों जन काल विशेष में निरंतर बने रहते हैं वह आगे बढ़ते रहते हैं मिटते रहते हैं और नए उनके स्थान पर आते रहते हैं। दूसरे कब उनके स्थान पर आकर विराजमान हो जाते हैं ? – हमें इसका पता नहीं चलता। कोई हट रहा है ,कोई स्थापित हो रहा है। यह खेल है जो सृष्टि प्रारंभ से चला आ रहा है। वैसे ही राज्य परंपरा होती है । उसमें एक राजा हटता है तो उसके स्थान पर दूसरा राजा स्थापित हो जाता है। राज्यसिंहासन सदा बना रहता है। तरंगिणी अर्थात नदी के समान ही राज्य-परंपरा को भी समझकर विद्वान लेखक ने अपनी पुस्तक का नाम ‘राजतरंगिणी’ रखा। विद्वानों ने इस पुस्तक की रचना का काल 1148 -1149 माना है। कल्हण के पिता चंपक कश्मीर के राजा हर्ष (1089 -1101) के यहां द्वार पति ,मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे थे।

राज तरंगिणी की उपयोगिता

कल्हण ने अपनी इस पुस्तक के माध्यम से हमें अपने काल की और कश्मीर की राज्य परंपरा की बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारियां दी हैं । वैसे भारत के लोग प्राचीन काल से ही अपनी इतिहास परंपरा के प्रति सजग और सावधान रहे हैं। यह अलग बात है कि उन्होंने इतिहास के ग्रंथ भी धार्मिकता और आध्यात्मिकता के संदेश देते हुए लिखे। जिससे वह कालजयी हो गए । रामायण और महाभारत इसके सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं। इसी शैली और परंपरा को किसी न किसी रूप में अपनाकर और बनाए रखकर कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना की। कल्हण ने अपने इस ग्रंथ के माध्यम से विस्मृति के घोर अंधकार में चले गए कश्मीर के कितने ही राजाओं को भी संसार की दृष्टि में लाने का सराहनीय कार्य किया है। जिस प्रकार रामायण और महाभारत के रचयिताओं ने उन्हें काव्यमय ढंग से हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है उसी प्रकार ‘राजतरंगिणी’ को भी उसके लेखक ने काव्यात्मक शैली में ही प्रस्तुत किया है। जिससे कवि की बौद्धिक विलक्षणता का बोध होता है।
वेदों में भारत भूमि अथवा राष्ट्र वंदना के अनेकों मंत्र हैं। राष्ट्र के प्रति प्रेम और मातृभूमि के प्रति समर्पण की विलक्षणता को वेदों से ग्रहण कर हमारे अनेकों विद्वान कवियों ने काव्य रचना की है। यही कारण है कि रामायण व महाभारत जैसे इतिहास संबंधी ग्रंथों में भी वेद की देशभक्ति , राष्ट्रभक्ति और ईश्वर-भक्ति का हमें पग – पग पर दर्शन होता है। भारतीय कवियों की इसी परंपरा का राजतरंगिणी के लेखक अथवा कवि ने भी प्रदर्शन किया है। कल्हण के मातृभूमि संबंधी विचार और भाव देखते ही बनते हैं। जैसे हम भारत भूमि को भारत माता कहकर पुकारते हैं वैसे ही कल्हण ने अपनी पुस्तक राज तरंगिणी में कश्मीर की भूमि को माता कहकर पुकारा है।

कश्मीर पार्वती स्वरूप है …..

भगवान कृष्ण के माध्यम से वह अपनी इस पुस्तक में कहता है कि कश्मीर पार्वती स्वरुप है और वहां का राजा शिव (हर) का अंश है।’ पार्वती प्रकृति भी कही जाती है और शिव वह परमपिता परमेश्वर परम पुरुष कहलाता है। प्रकृति पुरुष के संबंध से इस सृष्टि का संचालन हो रहा है। उसी का रूपक पार्वती और शिव हमें अपनी भारतीय चिंतन धारा में कदम – कदम पर देखने को मिलता है ।
कश्मीर भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। वेदों में शत्रु संतापक राजा और योद्धाओं के होने की प्रार्थना परमपिता परमेश्वर से की गई है । जिससे कि राष्ट्रवासियों का कल्याण हो सके और वे सुख की नींद सो सकें। यदि शत्रु-संतापक योद्धा होंगे तो ही मातृभूमि की रक्षा होना संभव है। यही कारण है कि हमारा प्रत्येक योद्धा जब रणभूमि में उतरता था तो वह अपनी वीरता, शौर्य और पराक्रम का प्रदर्शन करने में अपना पूर्ण बल लगाता था। भारत के प्राणतत्व से निसृत इस उत्कृष्टतम और रोमांचकारी संस्कार का कश्मीर के लोकजीवन पर भी प्रभाव पड़ा। यहां के वीर योद्धा भी शत्रु संतापक रहे। जिन्होंने समय आने पर मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना प्राणोत्सर्ग करने में तनिक भी संकोच नहीं किया। हमारे वीर योद्धाओं की इस सोच और संस्कार के कारण कश्मीर विदेशियों के लिए बहुत देर तक अजेय रहा । यहां के कई प्रतापी राजाओं ने मां भारती का नाम रोशन करते हुए विश्व के बड़े भू-भाग पर अपने साम्राज्य स्थापित किए । कल्हण भारत की इसी गौरवशाली और रोमांचकारी वीर परंपरा पर गर्व करते हुए कहता है -“कश्मीर पर बल द्वारा नहीं केवल पुण्य द्वारा विजय प्राप्त की जा सकती है । वहां के निवासी केवल परलोक से भयभीत होते हैं, न कि शस्त्रधारियों से…..।”

नीलमत पुराण और राजतरंगिणी

जिस समय कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना की थी उस समय तक भारतीय वैदिक धर्म की कई परंपराएं या तो लुप्त हो गई थीं या उनमें जंग लग गया था। देश- काल – परिस्थिति के अनुसार जंग लगी व्यवस्थाओं का लेखक और कवियों या साहित्यकारों पर भी प्रभाव पड़ता है । इसलिए उनका लेखन कई बार जंग लगी व्यवस्थाओं से भी प्रभावित हो जाता है। कल्हण ने ‘राजतरंगिणी’ में :नीलमत पुराण’ के प्रसंगों को बहुत अधिक स्थान दिया है। इसके अतिरिक्त रामायण और महाभारत के प्रक्षिप्त अंशों से भी वह प्रभावित हुआ दिखाई देता है। इसके उपरांत भी यह मानना पड़ेगा कि उसका विस्तृत अध्ययन था। अपने विषय पर लेखनी उठाने से पहले उसने अनेकों अपेक्षित ग्रंथों का व्यापक अध्ययन किया था। अपने इस ग्रंथ में कल्हण ने प्रत्येक राजा के काल की घटनाओं और सामाजिक परंपराओं का भी उल्लेख किया है। नारी के प्रति उसके वैसे ही विचार हैं जैसे वैदिक संस्कृति में किसी विद्वान के होने चाहिए अर्थात वह सम्मानजनक दृष्टिकोण से नारी का उल्लेख करता है। उसे पुरुष के ही समान अधिकार देता है। सिंहासन पर विराजमान होकर उसे सुशोभित करने वाली महारानियों को कल्हण ने ‘प्रजानाम मातरम’ जैसे पूजनीय शब्दों से संबोधित किया है ।
लेखक, साहित्यकार और विशेष रूप से इतिहासकार अपनी लेखनी के साथ तभी न्याय कर पाता है जब वह प्रचलित तंत्र के विरुद्ध भी खुलकर बोलता या लिखता है। यदि वह लोक प्रचलित तंत्र या व्यवस्था के विरुद्ध कलम ना उठा सके या उस पर सटीक टिप्पणी ना कर सके तो उसका लेखन व्यर्थ जाता है और बाद में लोग उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगते हैं। कल्हण ने प्रचलित व्यवस्था के साथ समझौता नहीं किया। जहां उसने आवश्यक और उचित समझा है वहां प्रचलित व्यवस्था के विरुद्ध लिखने में कोई संकोच नहीं किया। यदि प्रचलित व्यवस्था में बैठे लोगों को टोकने या उन पर कटाक्ष करने या उन पर कठोर टिप्पणी करने का अवसर आया तो उसने वैसा करके दिखाया। जिससे पता चलता है कि वह निर्भीक , निडर और स्पष्टवादी लेखक था।
उसका विचार न केवल समकालीन राजनीति को पथभ्रष्ट होने से बचाना था बल्कि वह भविष्य की राजनीति के लिए भी अपने इस ग्रंथ के माध्यम से ऐसा संदेश देना चाहता था जिससे राजनीति अपने धर्म से कभी भी भ्रष्ट ना हो। जब कोई ग्रंथ इस दृष्टिकोण से लिखा जाता है कि वह भविष्य में भी लोगों का, समाज का और राजनीति का मार्गदर्शन करता रहे तो वह कालजयी ग्रंथ होता है। उसके लेखक या कवि का चिंतन देश-काल- परिस्थिति की सीमाओं को तोड़कर बहुत आगे बढ़ जाता है। जिससे वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक और दीप-स्तंभ के रूप में काम करता रहता है। कल्हण ‘राजतरंगिणी’ के माध्यम से इसी सम्मानजनक स्थान को प्राप्त करने में सफल हुआ है।
कल्हण की राजतरंगिणी को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश की राजनीति और राजनीतिज्ञों के लिए उपयोगी मानते हुए लिखा है कि राजतरंगिणी विश्वसाहित्य का एक मूल्यवान ग्रंथ है। उसे राजनीतिक, सामाजिक तथा कुछ हद तक आर्थिक सूचनाओं का भंडार माना जा सकता है । उनके अनुसार राजतरंगिणी मात्र इतिहास नहीं बल्कि एक उत्तम कलाकृति है । कश्मीर के प्रजावत्सल शासक जैनुलाबद्दीन (बडशाह) (१५वीं शताब्दी) ने इस अनुपम इतिहास-ग्रंथ का फारसी में अनुवाद कराया था । इसी प्रकार मुगल बादशाह अकबर के आदेश पर अबुल फजल ने अपनी ‘आई-ने-अकबरी’ में इस ग्रंथ के कई सारे विवरण समाविष्ट किए।
इस प्रकार कश्मीर के इतिहास में कल्हण की राजतरंगिणी का विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है।
(अध्याय 2 समाप्त )

डॉक्टर राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत

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