वैदिक सम्पत्ति : तृतीय खंड : अध्याय -द्रविडों का वेदभाष्य

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गतांक से आगे…
सायणाचार्य ने ऋग्वेद मं० 1, स० 14 से 30 तक के भाष्य में शुन: शेप की कथा लिखकर मनुष्यबलि का एक भयंकर आर्दश सामने खड़ा कर दिया है। परन्तु वेद में इन बातों का कहीं नामोनिशान भी नहीं है। निरुक्त में शुन:शेप का अर्थ विज्ञानवेत्ता किया गया है, पर सायणाचार्य ने शुन:शेप का अर्थ कुत्ते का …..किया है। इस पर मिस्टर मूर कहते हैं कि, डॉक्टर रोसिन को अनुमान करने का मौका मिला है कि रामायणोक्त अजीगर्त की कथा से वेदों का कुछ भी वास्ता नहीं है। इसके आगे वही मूर साहब कहते हैं कि, ब्राह्मणग्रंथों के अंदर अजीगर्त का वर्णन इतना भयंकर है, जो भारत के अनार्यो का एक नमूना कहने योग्य है। इन साक्षियों से स्पष्ट हो जाता है कि, वेद में नरबलि का कुछ भी उल्लेख नहीं है, पर अनार्य जातियों में नरबलि होता है, अतः उन्होंने वेदों से भी वही सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। रामायण और ब्राह्मणग्रंथों में तो प्रक्षेप संभव है, पर संहिताओं में एक-एक अक्षर की गिनती होने से उनमें प्रक्षेप नहीं हो सकता। इसलिए उनके मन्त्रों से भाष्य के द्वारा खींचतान करके ऐसे क्रूर कर्म प्रवर्तक कृत्य का वर्णन किया गया है। यह सायणाचार्य का काम है। सायणाचार्य ने ‘इदं विष्णुर्विचकमे’ मन्त्र से वामन अवतार भी सिद्ध करने का प्रयत्न किया है।परन्तु यही मन्त्र निरुक्त में सूर्यपारक लगाया गया है। निरुक्त में इस मन्त्र के होते हुए भी सायणाचार्य ने ऐसा अनर्थ किया है, जो उनके लिए उचित न था। इसी तरह वैष्णव होने के कारण उन्होंने शरीर दग्ध करने वाली छाप का वर्णन भी ऋग्वेद से निकाला है और जगन्नाथ जी की लकड़ी का भी ऋग्वेद से वर्णन किया है, जो उनके कलेवर के काम आती है। वेदों में इतिहास तो उन्होंने इतना भर दिया है कि, वेदों को अपौरूषेय साबित करना मुश्किल हो गया है। इस तरह से सायणाचार्य ने वेदों को बहुत ही हीन दर्जे का बना दिया है और वेदों में वे समस्त आसुरी बातें सिद्ध कर दी है, जिनका प्रारम्भ रावण और बादरायण आदि ने किया था तथा जिस का पोषण शंकराचार्य और रामानुजाचार्यदि ने किया है।
बहुत दिन तक इसी भाषा का भारतवर्ष में प्रचार रहा और द्रविड़ ही वेदाचार्य प्रसिद्ध रहे। जब यूरोपियन लोग इस देश में आए, तो उन्होंने यहां वेदों की बड़ी भारी महिमा सुनी। उनकी इच्छा हुई कि ऐसी पवित्र और प्राचीन पुस्तक हम भी अपने देश के पुस्तकालयों में रक्खें। दुर्देव से उन दिनों में मद्रास प्रान्त के ये द्रविड़ ही आर्य जाति के गुरु हो रहे थे। वही वेदपात्र, वही याज्ञिक और वही हिंदूधर्म के नेता समझे जाते थे। अतः यूरोपियनों ने भी उन्हीं से वेद की पुस्तक चाही। सन् 1700 के आरम्भ में ही कोलब्रुक साहब को किसी दक्षिणी ने वैदिक छ्न्दो में लिखी हुई और देवी-देवताओं की स्तुति से पूर्ण एक पुस्तक दे दी।किन्तु जब मालूम हुआ कि, यह पुस्तक वेद नहीं है,तो वह त्याग दी गई। यद्यपि वह पुस्तक त्याग दी गई, तो भी यूरोप निवासियों ने वेदों की प्राप्ति की चेष्टा जारी रक्खी और मद्रासियों द्वारा अनेक बार ठगे भी गये। अन्त में अर्थात् सन 1779 में कर्नल पोलियर में तत्कालीन महाराजा साहब जयपुर से वेद की नकल मांगी। नकल दी गई और वह नकल प्रसिद्ध पण्डित आनन्दराम की को दिखलाकर लंदन भेजी गई और वहां के ब्रिटिश म्यूजियम में रक्खी गई, तथा द्रविड़ो की ठगाई से छुट्टी मिली। कहने का मतलब यह है कि, वेद के सम्बन्ध में यह अन्त तक धोखा ही देते रहे। ये शुद्ध वेदों का प्रचार नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने इस प्रकार की ठगाई अब तक जारी रक्खी और रावण से सायण तक किए हुए कृत्य का पोषण करते रहे।
क्रमशः

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