संजय कुमार 

(डिप्रेशन/ मंदबुद्धि/ हकलाना/ सीजोफ़्रेनिया/ पढ़ाई या काम मे मन न लगना की 100% सफल ओषधि)

वैज्ञानिक नाम -कन्वॉल्व्यूलस प्लूरीकॉलिस

 यह बाजार मे जड़ी बूटी बेचने वाए के यहाँ से साबुत आसानी से मिल जाती है।

अखिल विश्व गायत्री परिवार वालो के आश्रमो मे पैकिंग मे मिलती है। निडको, व्यास, गीता भवन आदि की भी पैकिंग मे मिलती है

 बाजार मे जीतने भी शंखपुष्पी के शर्बत/ सिरप मिलते वह बेकार है उन पर पैसा खर्च ना करे।

 गुण —

शंखपुष्पी सरा स्वर्या कटुस्तिक्ता रसायनी । अनुष्णा वर्णमेधाग्निबलायु:कान्तिदा ॥

हरेत अपस्मारमथोन्मादमनिद्रां च तथा भ्रम॥

शंख के समान आकृति वाले श्वेत पुष्प होने से इसे शंखपुष्पी कहते हैं । इसे क्षीर पुष्प (दूध के समान सफेद फूल वाले) मांगल्य कुसुमा (जिसके दर्शन से मंगल माना जाता हो) भी कहते हैं । यह सारे भारत में पथरीली भूमि में जंगली रूप में पायी जाती हैं ।

वानस्पतिक परिचय-

पुष्पभेद से शंखपुष्पी की तीन जातियाँ बताई गई हैं । श्वेत, रक्त, नील पुष्पी । इनमें से श्वेत पुष्पों वाली शंखपुष्पी ही औषधि मानी गई है । शंखपुष्पी के क्षुप प्रसरणशील, छोटे-छोटे घास के समान होते हैं । इसका मूलस्तम्भ बहुवर्षायु होता है, जिससे 10 से 30 सेण्टीमीटर लम्बी, रोमयुक्त, कुछ-कुछ उठी शाखाएँ चारों ओर फैली रहती हैं । जड़ उंगली जैसी मोटी 1-1 इंच लंबी होती है । सिरे पर चौड़ी व नीचे सकरी होती है । अंदर की छाल और लकड़ी के बीच से दूध जैसा रस निकलता है, जिसकी गंध ताजे तेल जैसी दाहक व चरपरी होती है । तना और शाखाएँ सुतली के समान पतली सफेद रोमों से भरी होती हैं । पत्तियाँ 1 से 4 सेण्टीमीटर लंबी, रेखाकार, डण्ठल रहित, तीन-तीन शिराओं से युक्त होती हैं । पत्तियों के मलवे पर मूली के पत्तों सी गंध आती है ।

 पहचान एवं मिलावट-

श्वेत, रक्त एवं नील तीनों प्रकार के पौधों की ही मिलावट होती है । शंखपुष्पी नाम से श्वेत, पुष्प ही ग्रहण किए जाने चाहिए । नील पुष्पी नामक (कन्वांल्व्यूलस एल्सिनाइड्स) क्षुपों को भी शंखपुष्पी नाम से ग्रहणकिया जाता है जो कि त्रुटिपूर्ण है । इसके क्षुप छोटे क्रीपिंग होते हैं । मूल के ऊपर से 4 से 15 इंच लंबी अनेकों शाखाएँ निकली फैली रहती हैं । पुष्प नीले होते हैं तथा दो या तीन की संख्या में पुष्प दण्डों पर स्थित होते हैं । इसी प्रकार शंखाहुली, कालमेध (कैसकोरा डेकुसेटा) से भी इसे अलग पहचाना जाना चाहिए । अक्सर पंसारियों के पास इसकी मिलावट वाली शंखपुष्पी बहुत मिलती है । फूल तो इसके भी सफेद होते हैं पर पौधे की ऊँचाई, फैलने का क्रम, पत्तियों की व्यवस्था अलग होतीत है । नीचे पत्तियाँ लम्बी व ऊपर की छोटी होती हैं । गुण धर्म की दृष्टि से यह कुछ तो शंखपुष्पी से मिलती है पर सभी गुण इसमें नहीं होते । प्रभावी सामर्थ्य भी क्षीण अल्पकालीन होती है ।

 संग्रह तथा संरक्षण एवं कालावधि-

छाया में सुखाए गए पंचांग को मुखंबद डिब्बों में सूखे शीतल स्थानों में रखते हैं । यह सूखी औषधि चूर्ण रूप में या ताजे स्वरस कल्क के रूप में प्रयुक्त हो सकती है । यदि संभाल कर रखी जाए तो 1 साल तक खराब नहीं होती। यदि 100 ग्राम चूर्ण मे 1या2 सूखे पत्ते वासा (Vasaka / बाँसा,अड़ूसा) के मिला दिए जाए तो 3 साल तक खराब नहीं होती ।

 गुण-कर्म संबंधी विभिन्न मत-

इसे मेध्य (बुद्धिवर्धक), मस्तिष्क शामक एवं नाड़ी दौर्बल्य में सहायक माना गया है । महर्षि चरक ने मेध्या विशेषेण च शंखपुष्पी लिखते हुए कहा है-‘स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली औषधियों में शंखपुष्पी प्रधान है ।’ आयुर्वेद में मनुष्य के मस्तिष्क को बल देने वाली जितनी वनस्पतियाँ बतायी गई हैं, उनमें ब्राह्मी तथा शंखपुष्पी को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है ।

भाव प्रकाश के अनुसार यह मेधावर्धक, मानस रोगहन अपस्मारहन (मिर्गी को नष्ट करने वाली ) भूतघ्न (मानसिक रोग जिसमे रोगी का स्वभाव बदल जाता है ) तथा विषघ्न (गलत भोजन से शरीर मे जो विष जैसे रसायन बनते हैं उनमे लाभकारी है )है । राजनिघण्टुकार लिखते हैं-‘ग्रहभूतादिदोषहनी वशीकरण सिद्धिदा’

 अर्थात् यह भूत रोग (हिस्टीरिया) मिटाकर व्यक्ति की मेधा में वृद्धि कर उसके व्यक्तित्व को उन्नत बनाती है । इसे अनिद्रा मे भी प्रयोग किया जाता है ।

 निघण्टु रतनाकर ने भी मेधा स्मृति वर्धक, कान्तिदायक, तेज बढ़ाने वाली एवं मस्तिष्क दोष हर इसे माना है ।

श्री भण्डारी (वनौषधि चन्द्रोदय) लिखते हैं कि शंखपुष्पी से मस्तिष्क को शांति व शक्ति मिलती है । विशेषणात्मक बुद्धि बढ़ती है । विशेषकर अल्पमंदता के लिए यह औषधि तथा मस्तिष्कीय कार्य अधिक करने वालों के लिए यह एक बलवर्धक टॉनिक है, जो सीधे स्नायु कोषों को प्रभावित करता है ।

डॉ. देसाई के मतानुसार शंखपुष्पी मस्तिष्क और मज्जा तंतुओं को बल देने वाली औषधि है । डॉ. खोरी लिखते हैं कि शंखपुष्पी ज्ञान तंतुओं को बल देने वाली ‘नवाईन टॉनिक’ है । उन्माद व मानसिक कमजोरी में इसका ताजा रस तुरंत लाभ देता है ।

डॉ. डिमक का कथन है कि वेदों के समय में शंखपुष्पी गर्भाशय पर कार्य करने वाली औषधि मानी जाती थी, परन्तु बाद के समय में टीकाकारों ने मस्तिष्क पर कार्य करने वाले सूत्र भी निकाले ।

यूनानी मतानुसार शंखपुष्पी तर है तथा बल्य रसायन है । इसका प्रयोग स्मृतिवर्धन और मस्तिष्क तथा नाड़ियों को शक्ति देने के लिए किया जाता है । भ्रम, अनिद्रा, अपस्मार एवं उन्माद को दूर करने के लिए यूनानी वैद्य इसका प्रयोग करते हैं ।

 आधुनिक मत एवं वैज्ञानिक प्रयोग, निष्कर्ष-

‘इण्डियन जनरल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ में डॉ. शर्मा ने शंखपुष्पी के मानसिक उत्तेजना शामक गुणों पर विस्तार से प्रकाश डाला है । इसके प्रयोग से प्रायोगिक जीवों में स्वतः होने वाली मांसपेशियों की हलचलें(स्पाण्टेनियम मोटर एक्टिविटी) घट गई । शंखपुष्पी के सत्व के सेवन से चूहों में ‘फिनोबार्ब’ द्वारा उत्पन्न की गई निद्रा बढ़ गई । इनमें मार्फीन का दर्दनाशक प्रभाव भी बढ़ा । चूहों की लड़ने की प्रवृत्ति में कमी हुई तथा अंदर से आक्रामक प्रवृत्ति में शांति आयी । प्रायोगिक जीवों में विद्युत के झटकों द्वारा उत्पन्न आक्षेप (कन्वल्शन-मिर्गी जैसे झटके) तथा कंपन इस औषधि के प्रयोग के बाद शांत हो गए ।

इन दोहरे लाभों को देखते हुए अब इस औषधि पर विस्तृत जाँच पड़ताल आरंभ कर दी गई है । सेण्ट्रल ड्रग रिसर्च इण्स्टीट्रयूट के वैज्ञानिकों ने पाया है कि यह औषधि सीधे थायराइड की कोशिकाओं पर प्रभाव डालकर स्राव व नियमन करती हैं । इसके प्रयोग से मस्तिष्क एसिटाइल कोलीन नामक महत्त्वपूर्ण न्यूरोकेमीकल की मात्रा बढ़ गई । इसका बढ़ना इस तथ्य का द्योतक है कि उत्तेजना के लिए उत्तरदायी केन्द्र शांत हो रहे है । मस्तिष्क रक्त अवरोधी झिल्ली (ब्लड-ब्रेनवैरियर) से शंखपुष्पी एसिटाइलकोलीन का मस्तिष्क से निकल कर रक्त में जाना रोकती है ।

यह उत्तेजना शामक प्रभाव रक्त चाप पर भी अनुकूल प्रभाव डालती है । प्रयोगों से पाया गया है कि भावनात्मक संक्षोभों, तनाव जन्य उच्च रक्त चाप जैसी परिस्थिति में शंखपुष्पी बड़ी लाभकारी सिद्ध होती है । आदत डालने वाले टैरक्विलाइजर्स की तुलना में यह अधिक उत्तम है, क्योंकि यह तनाव का शमन कर दुष्प्रभाव रहित निद्रा लाती है तथा हृदय परभी अवसादक प्रभाव डालती है ।

 ग्राह्य अंग-

पंचांग-समग्र क्षुप का चूर्ण या कल्क ताजी अवस्था में स्वरस कल्क प्रयुक्त होता है ।

 मात्रा-

5 ग्राम प्रतिदिन । रस- 10 ग्राम प्रतिदिन ।

इस औषधि को सुबह या शाम को दो बार अथवा रोगावस्थानुसार रात्रि को ही प्रयुक्त किया जा सकता है ।

 निर्धारणानुसार प्रयोग-

स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए 6 माशा शंखपुष्पी चूर्ण मिश्री की चाशनी या दूध के साथ प्रतिदिन प्रातः लेने का शास्रोक्त विधान बताया गया है । पंचांग को दूध के साथ घोंट कर भी देते हैं ।

ज्वर प्रलाप में होश खो बैठने तथा प्रलाप करने पर (डेलीरियम) मस्तिष्क को शक्ति देने तथा नींद लाने के लिए शंखपुष्पी फाण्ट रूप में या चूर्ण को मिश्री के साथ देते हैं ।

 उन्माद व अपस्मार में इसका स्वरस 20 ग्राम के लगभग मधु के साथ दिन में दो बार दिया जाता है ।

शय्या मूत्र (सोते समय बिस्तर मे पेशाब करना) का रोग जो अक्सर बच्चों को बढ़ती उम्र तक बना रहता है, (नॉक्चरनल एन्यूरेसिस) में रात्रि के समय शंखपुष्पी चूर्ण (3 ग्राम) दूध के साथ देने पर लाभ पहुँचाता है । मनोविकारों में भी इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है । जितने भी उत्तेजना कारक मनोविकार हैं, उन्हें प्रारंभिक स्थिति में ही शंखपुष्पी के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है ।

 उच्च रक्तचाप व अन्य उत्तेजना जन्य स्थितियाँ जो उसे जन्म देती हैं, में रोकथाम के लिए एवं उपचार के लिए भी शंखपुष्पी का रस तीन समय अथवा चूर्ण दिन में दो बार देने पर आशातीत लाभ देखे जाते हैं ।

 शंखपुष्पी का शर्बत घर पर कैसे बनाए।-

1- 250 ग्राम सुखी साबुत या पीसी हुई शंखपुष्पी ले। जिनहे कब्ज है वह 150 ग्राम शंखपुष्पी +100 ग्राम भृंगराज ले।

2-रात को 1.500 लीटर (डेढ़ लीटर) पानी मे डाल दे

3- सुबह धीमी आग पर पकाए।मिट्टी के बर्तन मे पकाना अधिक गुणकारी है।

4- इतना पकाए कि पानी 500 ml रह जाए।

5- छान ले । ठंडा होने पर कपड़े मे से दबा कर बाकी पानी निकाल ले। बचे हुए को किसी पेड़ के नीचे डाल दे। खाद का काम करेगा। कचरे मे न फेके।

 6- शंखपुष्पी के क्वाथ /काढ़े मे 1 ग्राम सोडियम बेंजोएट (SODIUM BENZOATE ) मिला दे। अधिक न मिलाए। यह आपको अङ्ग्रेज़ी दवाई बेचने वाले केमिस्ट से मिलेगा। अब इस काढ़े को रात भर रख दे ताकि मिट्टी जैसा अंश नीचे बैठ जाए।

7 अगले दिन इसमे 1 किलो खांड या मिश्री व 10 ग्राम छोटी इलायची मिलाकर धीमी आग पर पकाए। जब मीठा घुल जाए तब इसेउतार ले। ठंडा होने पर काँच या प्लास्टिक कि बोतल मे भर ले।

8 – 2 चम्मच से 4 चम्मच दूध मे मिलाकर पिलाए।

गर्भवती व दुधमुहे बच्चे को भी दे सकते हैं। बाजारी शंखपुष्पी शिरप से अच्छा है।

कभी कभी इसमे नीचे मीठा अलग हो जाता है। वह सामान्य है। उस नीचे जमे हुए मीठे का भी प्रयोग करे ।

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