ग्राहकों को लूटने में लग गये आज के नवबाजार

निर्मल रानी

कुछ समय पहले की बात है जब हम दूध की डेयरी पर दूध लेने जाते थे तो यदि हम एक लीटर दूध डेयरी वाले से मांगते थे तो वह एक लीटर दूध नापने के बाद सौ या पचास ग्राम दूध अलग से डाल दिया करता था। किसी सब्ज़ी कीे दुकान पर सब्ज़ी बेचने वाला खरीदी गई सब्ज़ी के साथ हरी मिर्च व धनिया मुफ्त में ही दे दिया करता था। इस प्रकार की ‘उदारवादिता’ अब भी कहीं-कहीं देखने को मिल जाती है। पहले ग्राहक किसी वस्तु को खरीदने से पहले उसकी गुणवत्ता,उसकी ताज़गी,टिकाऊपन आदि बातों को गौर से देखने व परखने के बाद उसे खरीदा करता था। वह भी खूब मोल-भाव करने के बाद। ज़ाहिर है यह हमारे भारतीय बाज़ार तथा यहां के मेहनतकश बहुसंख्य समाज का एक स्वभाव था। परंतु अब तो लगता है समय ही बदल गया है। मुफ्त में दूध,हरी धनिया व हरी मिर्च मिलना तो दूर दुकानदारों के दुकानदारी करने का तरीका ही बदल गया है। 30 रुपये किलोग्राम मिलने वाली किसी वस्तु को यदि आप दुकानदार से आधा किलो यानी 15 रुपये की कीमत की सामग्री देने को कहें तो वह स्वयं ही कहने लगता है कि 20 रुपये की पूरी कर दूं। और यदि आपने मना किया कि नहीं हमें तो 15 रुपये का आधा किलो सामान ही चाहिए तो दुकानदार पंाच रुपये फुटकर मांगने या अपने पास फुटकर पांच रुपये न होने का बहाना करने लग जाता है। इसी प्रकार दूध के जिस कारोबार में कल तक डेयरी मालिक दूध में पानी मिलाने को केवल अपराध ही नहीं बल्कि पाप की श्रेणी में गिना करते थे आज वही दुग्ध विक्रेता पानी में ‘दूध’ मिलाते दिखाई दे रहे हैं। देश में मिलावटी व रासायनिक दूध की बिक्री का जो कारोबार अपने चरम पर है वह तो विषय ही अलग है?

आजकल सीलबंद अथवा पाऊच में विभिन्न प्रकार की सामग्रियों की बिक्री हो रही है। ऐसे सामानों के ग्राहक भी बहुत अधिक हैं। ऐसी सामग्रियों में खाद्य सामग्री से लेकर कपड़ा,रेडीमेड गारमेंटस,बेकरी से संबंधित सामान,महिलाओं की साज-सज्जा से जुड़ी सामग्री तथा कंप्यूटर संबंधी कई सामान आदि शामिल हैं। इन वस्तुओं को आपको खोलने की उस वक्त तक इजाज़त नहीं है जब तक आप इनके पैसे चुकता न कर दें। यानी पैसे दीजिए फिर सामान लीजिए। इसे अपने घर ले जाईए और वहां आराम से खोल कर देखिए कि सामान आपकी पसंद,इच्छा तथा सोच के अनुरूप है अथवा नहीं। यदि सामान वैसा ही निकलता है तो आप अपनी लॉटरी निकली समझ सकते हैं। अन्यथा कोई आश्चर्य नहीं कि आपको पैकेट खोलने अथवा सील तोडऩे के बाद अपना सिर पीटना पड़े। कई अत्यधिक ‘समझदार‘ व्यवसायियों ने अब अपने उत्पाद पारदर्शी पैकेट में रखना ही बंद कर दिया है ताकि वह आपको नज़र ही न आए। इसके बजाए वे उसी पाऊच पर एक अत्यधिक सुंदर,आकर्षक व मन को लुभाने वाला चित्र छाप देते हैं जो ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। जबकि पाऊच के भीतर रखी गई सामग्री की शक्ल व सूरत उस पर प्रकाशित चित्र से भिन्न होती है। यही हाल रेडीमेड गारमेंटस के क्षेत्र में भी है। पैंट-शर्ट आपको पैक की हुई दिखाई जाती है। यानी आप उसके कपड़े को भी छू कर नहीं देख सकते। केवल उसका प्रिंट,रंग व सामने की ओर दिखाई देती डिज़ाईन के आधार पर उसे खरीदना होता है। पैसे देने के बाद ही उसे खोलकर देख सकते हैं। अब यदि पैकिंग खोलने के बाद आपको उस का कपड़ा पसंद न आया तो यह आपकी िकस्मत है। यही स्थिति कंप्यूटर के कई सामानों में है। उदाहरण के तौर पर प्रिंटर में इस्तेमाल होने वाली कार्टेज जो लगभग पांच सौ रुपये की एक अदद मिलती है वह बावजूद इसके कि उच्चकोटि की पैकिंग में सील की जाती है। परंतु यदि खरीदने के बाद खोलने पर वह कार्टेज ठीक ढंग से प्रिंट नहीं निकाल पाती तो आप केवल अपना माथा पीट सकते हें। कंपनी से इस विषय पर कोई शिकवा-शिकायत नहीं कर सकते क्योंकि दुकानदार इसकी कोई्र गारंटी या वारंटी नहीं लेता।

मिठाई की दुकानों पर मिठाई के साथ डिब्बे तौल कर देना हालांकि गैरकानूनी है। परंतु लगभग पूरे देश में मिष्ठान विक्रेताओं द्वारा धड़ल्ले से यह अंधेरगर्दी की जा रही है। तीन सौ रुपये किलो से लेकर हज़ार रुपये किलो तक बिकने वाली मध्यम श्रेणी की मिठाईयों के साथ डेढ़ सौ या दौ सौ ग्राम तक के वज़न के गत्ते के डिब्बे तौले जा रहे हैं। अब तो इन मिष्ठान विक्रेताओं ने ग्राहकों को लूटने के लिए गत्ते का डिब्बा बनाने वालों के साथ मिलकर डिब्बों में एक नया शोशा जोड़ दिया है। अब मिठाई के डिब्बों में गत्ते की ही खपत करके उसमें अलग-अलग लाईनें बनाई जाती हैं और उन लाईनों अथवा चैनल के बीच की जगह में ही मिठाईयां फंसाई जाती हैं। कहने को तो यह डिब्बा एक किलोग्राम मिठाई का डिब्बा होता है। परंतु यदि आप इसमें रखी मिठाई को डिब्बे से बाहर निकाल कर अलग से तौलें तो इसमें अधिक से अधिक 500 ग्राम से लेकर 600 ग्राम तक ही मिठाई निकलेगी। यहां यह भी काबिल-ए-गौर है कि ऐसे डिब्बों का इस्तेमाल आमतौर पर उच्च कोटि के मिष्ठान विक्रेताओं द्वारा किया जा रहा है जहां मिठाईयां भी साधारण मिष्ठान विक्रेताओं से अधिक मंहगी होती हैं। परंतु धनाढ्य लोग,दो नंबर की कमाई करने वाले ग्राहक अथवा रईस तबके के ग्राहक या नव धनाढय फुकरा वर्ग जो न सिर्फ ठगी करने वाले ऐसे दुकानदारों से खुश होकर सामान खरीदता है बल्कि उनकी लूटमार की ऐसी हरकतों पर उंगली भी नहीं उठाता। और ग्राहकों की यही खामोशी ठगी करने वाले दुकानदारों को शह देती है।

रोज़मर्रा में घरेलू इस्तेमाल की तमाम वस्तुएं जैसे टुथपेस्ट,साबुन,वाशिंग पाऊडर,तेल,लोशन,क्रीम,पाऊडर जैसी वस्तुओं की पैकिंग तथा इनकी कीमतों में आए दिन नया परिवर्तन हो रहा है। इनमें से अधिकांश सामानों के वज़न तो घटते जा रहे हैं जबकि इनके मूल्य निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे सामानों की पैकिंग भी बाज़ार में ऐसी पेश की जा रही है कि ग्राहकों को देखने में तो पैक्ड सामान भारी-भरकम,बड़ा या अधिक दिखाई दे परंतु खोलने पर यही वस्तु ग्राहक की उम्मीदों से कम व छोटी होती जा रही है। इस संदर्भ में उन वस्तुओं की बिक्री का जि़क्र करना ज़रूरी है जो पाऊच में माल कम हवा अधिक भरकर बेची जा रही हैं। ऐसी सामग्रियों में चिप्स,नमकीन तथा कुरकुरे जैसी कई वस्तुएं शामिल हैं। इनके पैकेट तो देखने में काफी ‘सेहतमंद’ दिखाई देते हैं जबकि इनके भीतर केवल इतनी सामग्री पड़ी होती है गोया कि वह सैंपल मात्र के लिए ही पाऊच में डाली गई हो। इस प्रकार के पाऊच भी पारदर्शी नहीं होते बल्कि गहरे रंगों में प्रिंट कराए गए होते हैं ताकि ग्राहक उन पाऊच को सूरज की रोशनी के सामने करने के बाद भी यह न देख सके कि उसमें कितना सामान पैक किया गया है। माल कम मूल्य अधिक की नीति पर हमारे देश का फैशन बाज़ार भी पूरी गति के साथ चल पड़ा है। उदाहरण के तौर पर फुल पैंट व हाफ पैंट के बीच का एक आईटम जिसे कैपरी के नाम से जाना जाता है इसने पिछले कई वर्षों से भारतीय बाज़ार में अपनी खूब धाक जमाई हुई है। इस पहनावे की कीमत फुल पैंट से कम नहीं है। जबकि इसमें फुल पेंट से कहीं कम कपड़ा लगता है। इसी प्रकार बेहद चुस्त पैंट व कमर से नीचे बांधे जाने वाली पैंट का फैशन इस समय अपने शबाब पर है। इसी प्रकार कमर से ऊपर तक की शर्टस बाज़ार में फैशन के नाम पर बिक रही हैं। इनमें जहां कपड़ों की बचत होती है वहीं इनकी सिलाई में भी समय व सामग्री का कम इस्तेमाल होता है। परंतु फैशन के नाम पर इनके मूल्य अधिक होते हैं। अब तो फटे हुए कपड़े भी फैशन के नाम पर बाज़ारों में मंहगी कीमत में बिकने लगे हैं। कपड़ों पर यदि सिलाई गलत तथा उल्टी-सीधी हो जाए तो उसे भी दुकानदार अथवा कंपनियों द्वारा माडर्न फैशन बताकर बेच दिया जाता है। उत्पाद में कम सामग्री लगाने में बड़ी-बड़ी रेडीमेड गारमेंटस बनाने वाली कंपनियां भी पीछे नहीं हैं। मिसाल के तौर पर जुराब जैसी छोटी वस्तु को ही ले लीजिए। पहले यह जुराब घुटने से कुछ ही नीचे तक की लंबाई की मिला करती थी। अब इसका आकार इतना घट गया है कि यह पहनने के बाद ऐसे लगती है जैसे कि जूते के भीतर जुराब पहनी ही न गई हो। इस प्रकार की सैकड़ों वस्तुएं बाज़ार में ऐसी बिक रही हैं जो मंहगाई के इस ज़माने में भी ग्राहकों की लूट का कारण बन रही हैं। वैश्वीकरण के इस दौर में तथा बाज़ारवाद के युग में कम माल खरीदकर अधिक मूल्य चुकता करना क्या यही असली व सच्चे बाज़ार की परिभाषा है?

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