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विशेष संपादकीय वैदिक संपत्ति

मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा-37

मनुष्यगतांक से आगे………

यहां हम थोड़ा सा उसका इतिहास देकर उसके विषय प्रतिपादन की ओर आना चाहते हैं। तिलक महोदय ने ‘ओरायन मृगशीर्ष’ ग्रंथ लिखने के पांच वर्ष बाद सन 1898 में उत्तरधु्रव निवास लिखा और उसका सारांश एक पत्र द्वारा मैक्समूलर के पास भेजा। पत्र के उत्तर में मैक्समूलर ने लिखा कि कितने ही वेदवाक्यों का अर्थ जैसा आप लिखते हैं, वैसा हो सकता है, तथापि मुझे शंका है कि आपका सिद्घांत भूगर्भशास्त्र के साथ न मिल सकेगा। इसका मतलब यह है कि भूगर्भशास्त्र के अनुसार हिमप्रपात को हुए बहुत अधिक काल हो चुका है और आप वेदों को छह हजार वर्ष के ही पुराने मानते हैं। ऐसी दशा में हजारों लाखों वर्ष की पुरानी हिमप्रपात और उत्तर धु्रव की बात का वर्णन वेदों में कैसे आ सकता है? मैक्समूलर के ऐसा लिखने का कारण यह था कि उस समय भूगर्भशास्त्र ने हिमप्रपात का समय 80 हजार वर्ष से ऊपर का माना था। तिलक महोदय इस बात से सचेत हुए और उस ग्रंथ को पांच वर्ष तक छपने से रोके रखा। इतने में ‘इंसाईक्लोपेडिया ब्रिटानिका’ की दशवीं आवृत्ति छपकर बाहर निकली। उसमें कुछ अमेरिकन भूशास्त्रियों ने हिमप्रपात का समय आठ हजार वर्ष ही पूर्व माना। बस, इसको देखते ही तिलक महोदय ने सन 1903 में इस ग्रंथ को छपवाकर प्रकाशित कर दिया। तब भी छह हजार और दस हजार के बीच का चार हजार वर्ष का समय बढ़ गया, पर इस चार हजार वर्ष की बीती हुई बातें वेदों में कैसे आईं, इस प्रश्न का उत्तर आपने यह देकर टाल दिया कि आज चार हजार वर्ष से तो हम ब्राह्मण लोग ही वेदों को कण्ठ किये हुए हैं। जिस प्रकार इतने दिन से हम इस काव्य को याद किये हैं उसी तरह हमारे पूर्वज भी वेदों में वर्णित घटनाओं को चार हजार वर्ष तक याद किये रहे और जब भारत में आकर सुख से रहने लगे, तब उन्हीं याद की हुई बातों के आधार पर वेदों को छन्दोबद्घ काव्य में कर लिया। इस विषय में एकजगह आप कहते हैं कि एशिया में बसने वाले आर्यों की जैसी उन्नति देखने में आती है, वैसी उन्नति नव पाषाण युग से उत्तर योरोप में बसे हुए आर्यों में नही पाई जाती। इसका कारण यह है कि उन्होंने अपनी प्राचीन सभ्यता भुला दी और जंगली हो गये। इसके विरूद्घ हिमपूर्व कालीन धर्म और सभ्यता को भारतीय और ईरानी आर्यों ने ज्यों की त्यों कायम रखा यही एक आश्चर्य है।

क्यों भारतीय आर्यों ने अपनी सभ्यता कायम रखी और क्यों यूरोपीय आर्यों ने भुला दी? इस प्रश्न पर आपने कुछ भी प्रकाश नही डाला। हम कहते हैं कि इसमें आश्चर्य कुछ नही है। सीधी बात यह है कि काव्यरूप में ग्रंथित होने से और उसको याद रखने से हमारी सभ्यता हमें याद रही और उस काव्य को छोड़ देने से पाश्चात्य आर्यों ने उसे भुला दिया। यही बात आगे घुमा फिराकर आप कहते हैं कि ऋग्वेद में कहे प्राचीन सूक्त, ऋषि और देवता सभी हिमपूर्व काल के हैं, हिमोत्तर काल के नही। यहां साफ शब्दों में लोकमान्य ने स्वीकार कर लिया कि ऋग्वेद के प्राचीन सूक्त ऋषि और देवता हिमपात के पूर्व के हैं, पश्चात के नही।  हिमपात कम से कम तिलकमहोदय की स्वीकृति के अनुसार आज से दस हजार वर्ष पूर्व हुआ और  प्राचीन सूक्त उसके भी पूर्व के हैं। ऐसी दशा में ओरायन की छह हजार वर्ष वाली बात और मृगशीर्ष में वसंतसंपात वाली कारण माला कहां उड़ जाती है, जिसका कुछ भी ठिकाना नही। एक तरह तो ओरायन में आप लिखते हैं कि पूनर्वसुकाल तक (जो आज से सात हजार पूर्व था) वैदिक ऋचाओं की उत्पत्ति नही हुई थी दूसरी तरफ उत्तर धु्रववनिवास में पुराने सूक्तों का अस्तित्व दस हजार वर्ष पूर्व का स्वीकार करते हैं। यही आश्चर्य है। हमने आरंभ में उनके दिये हुए ज्योतिष संबंधी वैदिक प्रमाणों की जो आलोचना की है, यह यथार्थ ही है। वेदों में ज्योतिष संबंधी ऐसी एक भी घटना का वर्णन नही है, जिससे वेदों का काल निर्धारित किया जा सके।

तिलक महोदय ने एक प्रकार से अपनी पहली पुस्तक के ज्योतिष संबंधी विचारों को इस दूसरी पुस्तक में रद्द कर दिया है। इस पुस्तक की विचारपरंपरा निराली है। इसका मूल विषय है आर्यों का उत्तर धु्रव में निवास और हिमवर्षा के कारण वहां से भागकर भारत में आकर बसना। प्रधानतया उत्तरधु्रव के निवास ही का इसमें वर्णन है और हिमवर्षा के कारणों तथा उसके पडऩे का काल निश्चित किया गया है। बर्फवर्षा का काल यदि निश्चित हो जाए तो आर्यों के वहां से निकल भागने का समय निश्चित हो सकता है। पर वहां के रहने मात्र के वर्णन से वेदों के समय का कुछ भी निश्चय नही हो सकता। क्रमश:

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