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इतिहास के पन्नों से हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

क्रान्ति के पुरोधा : ब्रह्मर्षि स्वामी विरजानन्द सरस्वती

दो शताब्दी पूर्व , ( सन् १७७८, ई० ) में जन्म लेकर , छह वर्ष की अल्पायु में ही शीतला माता के प्रकोप से दोनों आंखें खो देने वाला अनाथ बालक ब्रजलाल सारे देश की दृष्टि बन जाएगा , यह कौन कह सकता था ? माता – पिता के न रहने पर उचित देखभाल के अभाव में १३–१४ वर्ष की अवस्था में घर से भाग जाने वाला ढोंग , पाखण्ड और अन्धविश्वास को भगाने का दृढ़ – संकल्प अपने शिष्यों में फूंका करेगा , किसने कल्पना की थी ? किन्तु होनी कल्पना की मोहताज तो नहीं है न ! ब्रजलाल ऋषिकोश पहुंच गया और १२ वर्ष तक कठोर तप साधना की। आठ – आठ प्रहर गंगा जल में खड़े – खड़े निरन्तर गायत्री जप करना और साधु – सन्तों , विद्वानों की संगति उसकी दिनचर्या बन गई।

कनखल के प्रबुद्ध सन्त स्वामी पूर्णानन्द जी से विद्याध्ययन , देश – प्रेम की शिक्षा और वेद – प्रचार की अद्वितीय लगन पाकर यह युवक ‘ दण्डी विरजानन्द ‘ बन गया। एक बार तीर्थ यात्रा करते हुए दण्डी जी सौरों पहुंचे। वहां अलवर नरेश इनके विष्णु – स्रोत के पाठ और विद्वत्ता से इतने प्रभावित हुए कि नित्यप्रति ३ घण्टा संस्कृत पढ़ने की शर्त लगाने पर भी अपने साथ ले गये। अलवर पहुंचकर दण्डी जी ने संस्कृत अध्यापन के साथ – साथ ‘ शब्द – बोध ‘ नामक ग्रन्थ की रचना की जो आज भी वहां सुरक्षित है। एक दिन नरेश संस्कृताध्ययन के लिए उपस्थित न हो सके तो उसी दिन दण्डी जी ने अलवर त्याग दिया।

अलवर – प्रवास के मध्य ही अंग्रेज रेजीडेण्ट का भारतीयों के प्रति शुष्क व्यवहार देखकर उन्होंने अंग्रेजी राज्य के बहिष्कार का निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने मथुरा को अपना केन्द्र चुना क्योंकि यह हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान था तथा दिल्ली , मेरठ , लखनऊ , आगरा , अजमेर जाने वाले यात्री मथुरा होकर ही जाते थे। मथुरा में रहते हुए उनके विचारों से प्रभावित होकर बहुत से हिन्दू – मुसलमान उनके शिष्य बन गये थे। स्वामी विरजानन्द को ‘ भारत गुरुदेव ‘ की उपाधि तत्कालीन साधु – समाज ने प्रदान की थी। उनकी विद्वत्ता के सम्बन्ध में अंग्रेजी के एक लेखक ने भी कहा है- ” स्वामी विरजानन्द सरस्वती एक महान् थे। अपने समकालीन भारतीय विद्वानों के वे सिरमौर थे। वह एक महान् थे जिनकी जोड़ का देश में समकालीन गुरुओं में अन्य कोई न था।

“स्वामी विरजानन्द स्वभाव से उग्र थे। सत्य के इस उपासक को ढोंग और पाखण्ड से बड़ी घृणा थी। प्रबल इच्छाशक्ति के इस धनी का यह दृढ़ विश्वास था कि समस्त दुःखों और कष्टों का मूल स्रोत अज्ञान , अंधविश्वास और छल – कपट है। अतः उन्होंने इन सब कुरीतियों का निराकरण कर लोगों के हृदय को सत्य से प्रकाशित करने का बीड़ा उठा लिया। वे अपने शिष्यों से कहा करते थे कि ” मैं तुम में उस आग को जला रहा हूँ जो समय आने पर भारत में व्याप्त अंध – विश्वासों , पाखण्डों और मिथ्या – विचारों को भरमीभूत कर देगी। ” महर्षि दयानन्द ने समाज और राष्ट्र के लिये जो कुछ किया उस सबके पीछे प्रेरणा गुरु विरजानन्द की ही थी। गुरु दक्षिणा के रूप में लौंग लाने वाले अपने इस शिष्य से दण्डी जी ने प्रतिज्ञा कराई थी कि- ” भारत देश में दीन – हीन जन अनेक विध दुःख पा रहे हैं , जाओ उनका उद्धार करो। मत – मतान्तरों के कारण जो कुरीतियाँ प्रचलित हो गई हैं , उनका निवारण करो। आर्य जनता की बिगड़ी हुई दशा को सुधारो। आर्य – सन्तान का उपकार करो।

मनुष्यकृत ग्रन्थों में परमात्मा और ऋषि – मुनियों की निन्दा भरी पड़ी है। आर्ष ग्रन्थों में इस दोष का लेश नहीं। आर्ष और अनार्ष ग्रन्थों की यही बड़ी परख है। ” वैदिक धर्म का प्रचार और देशोद्धार करने की प्रतिज्ञा ही गुरु की दक्षिणा थी और इस प्रतिज्ञा को पूर्ण करने में ही स्वामी दयानन्द ने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।

सन् ५७ की तैयारी
सन् १८५७ में ब्रिटिश शासकों के विरुद्ध पहला भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम १० मई को मेरठ से प्रारम्भ हुआ। इसकी तैयारी तो पाँच – छह वर्ष पूर्व से ही हो रही थी। इस संग्राम का संयोजन गुरु – शिष्य परम्परा में चार – पीढ़ी आर्य संन्यासी वेदज्ञ योगी कर रहे थे , जिनके नाम हैं- ( १ ) स्वामी ओमानन्द , ( २ ) स्वामी पूर्णानन्द ( ३ ) स्वामी विरजानन्द और स्वामी दयानन्द। उस समय इन चारों संन्यासियों ने स्वतन्त्रता – प्राप्ति के लिए दो हजार साधु प्रचार के लिए तैयार किए थे। ये साधु सैनिकों की छावनियों में , क्रान्तिकारियों में और हरिद्वार , गढ़मुक्तेश्वर , मथुरा आदि के तीर्थ स्थानों पर जाकर जनता में भी अंग्रेजों के दमन के विरुद्ध प्रचार करते थे। इनमें हिन्दू और मुसलमान दोनों प्रकार के साधु थे। ( द्रष्टव्य लेख – आर्य जगत् अंक -१८ मई , १६८० ) ऐसे संकेत मिलते हैं कि ये सारे साधु सन् १८५२ से ही सैनिक छावनियों में स्वतन्त्रता की योजना का प्रचार करने लग गये थे। साथ ही गुप्तचर का कार्य भी करते थे और अंग्रेजों की गतिविधियों का ब्यौरा अपने साधु – समाज के प्रमुख को देते रहते थे।

यद्यपि स्वामी विरजानन्द तथा स्वामी दयानन्द आदि संन्यासियों का नाम क्रान्ति के इतिहास में नहीं आता तथापि यह तथ्य सर्वविदित है कि सैनिक छावनियों में कमल के फूल और चपाती वितरित करने वाले अज्ञात साधुवेषधारी संन्यासी थे और वे इसका प्रयोग ब्रिटिश विरोधी प्रचार के लिये करते थे। चौधरी कबूलसिंह , मन्त्री सर्वखाप पंचायत ने पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा की नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘ आर्य मर्यादा ‘ के सम्पादक ( पं० जगदेव सिंह सिद्धान्ती ) को मीर मुश्ताक मीरासी का उर्दू में लिखा हुआ पत्र प्रकाशनार्थ भेजा था , जिसका सार इस प्रकार है-

“ सन् १८५६ में मथुरा तीर्थ नगरी में एक पंचायत हुई , उसमें हिन्दू – मुसलमान तथा अन्य धर्मावलम्बी सम्मिलित हुए थे। इसमें एक हिन्दू ‘ दरवेश ‘ को पालकी में बिठाकर लाया गया। उनके आने पर सब लोगों ने उनका सम्मान किया , तथा जब वह चौकी पर बैठ गए तब सभी हिन्दू – मुस्लिम फकीरों ने उनकी चरण – वन्दना की। सभी उपस्थित पंचायत के लोगों ने उनका सम्मान किया। सबकी अभ्यर्थना के बाद नाना साहब पेशवा , मौलवी अजीमुल्लाखान , रंगू बाबू और तत्कालीन बादशाह बहादुरशाह जफर के पुत्र फिरोजशाह ने मिलकर इन संन्यासी महोदय के सम्मान में सोने की अशर्फियां भेंट – स्वरूप दीं। इसके बाद एक हिन्दू तथा एक मुस्लिम फकीर ने यह घोषणा की कि अब हमारे गुरु आप सब उपस्थित सज्जनों को सम्बोधित करेंगे जो हमारे राष्ट्र के लिए उपयोगी होगा , अतः ध्यान से सुनें। यह संन्यासी बहु भाषाविद् तथा हमारा और राष्ट्र का सम्मानित व्यक्ति है जो ईश्वर की कृपा से ही हमारे मध्य उपस्थित हुआ है।

‘ इस वृद्ध संन्यासी ने सर्वप्रथम ईश – स्तुति की और उसका उर्दू में अनुवाद किया। तत्पश्चात् उपस्थित सज्जनों को संबोधित कर कहा कि स्वतन्त्रता स्वर्ग है तथा परतन्त्रता नरक के समान है। स्वराष्ट्र शासन की अपेक्षा अधिक अच्छा है। क्योंकि विदेशी शासन में रहना बेइज्जती है। हमें किसी जाति से घृणा नहीं अपितु परतन्त्रता से घृणा है। क्योंकि विदेशी , खासकर ‘ फिरंगी ‘ , हमें गुलाम समझकर पशुवत् व्यवहार करते हैं। ईश्वर के राज्य में सभी मनुष्य भाई – भाई हैं किन्तु विदेशी शासन हमें भाई की अपेक्षा गुलाम समझता है। यों तो फिरंगियों में बहुत – सी अच्छी बातें हैं , किन्तु राजनीतिक दृष्टि से वे अपने वचन धर्म आदि का पालन नहीं करते। वे अपने राष्ट्र की समृद्धि के लिए इस देश का और इसके वासियों का शोषण करते हैं। अतः हिन्द वासियों से मेरी प्रार्थना है कि तुम सब भी अपने राष्ट्र से वैसा ही प्रेम करो जैसा अपने धर्म से करते हो। देश भक्त बनकर प्रत्येक देशवासी के साथ भाई जैसा ही सम्बन्ध बनाओ । हिन्दुस्तान में रहने वाले सभी हिन्दी भाई हैं।

” नोट- इस महात्मा संन्यासी का नाम मालूम करने पर ज्ञात हुआ कि इनका नाम स्वामी विरजानन्द था और वे बहुत समय से मथुरा में रहते हैं , संस्कृत की शिक्षा देते हैं तथा ईश्वर के भक्त हैं। ”

तसनीफ करदह मीरमुश्ताक मीरासी
कासिद सर्वखाप पंचायत

इस प्रकार स्वामी विरजानन्द क्रान्ति के भी प्रथम पुरोधा थे। अंग्रेजों ने तो इस प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम को ‘ गदर ‘ का नाम दिया था। किन्तु स्वामी विरजानन्द ने इस योजना को ‘ राज बदलो क्रान्ति ‘ या ‘ जंगे आज़ादी ‘ का नाम दिया था। उपरोक्त कमल और रोटी के अतिरिक्त रेशम , खरबूजे और तीतर का निशान भी प्रचलित किया था। अभिप्राय यह था कि देश को रेशम के समान मजबूत चमकदार बनाओ और खरबूजे के समान ऊपर की धारी अलग – अलग पर अन्दर से हिन्दू – मुसलमान सब एक रहो , तीतर के समान शत्रु को अपने देश की सीमा से बाहर निकालो।

८२ वर्ष की आयु में , सन् १८६० में , दिवंगत इस सन्त के ग्राम गंगापुर ( करतारपुर , जालन्धर पंजाब ) में श्री विरजानन्द स्मारक भवन की स्थापना करना या १४ सितम्बर १६७० को भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी करना साधुवाद के योग्य अवश्य है , किन्तु क्या उतने भर से हमारे कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाएगी ?

यह लेख “स्वामी दयानंद ओर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” नामक पुस्तक में प्रकाशित है। जिसके संकलनकर्ता “डॉ. सुरेन्द्र सिंह कादियान” हैं।
लेखक :- श्रीमती विश्ववारा, एम. लिट्
प्रस्तुतकर्ता :- अमित सिवाहा

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