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इतिहास के पन्नों से डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

माँ के गीतों के वे बोल …

इतिहास की पड़ताल पुस्तक से …. अध्याय – 17

देश अपनी आजादी की 75 वीं वर्षगाँठ मनाने की तैयारियों में जुट गया है। किसी भी देश व समाज को खड़ा करने के लिए 74 वर्ष बहुत होते हैं। यद्यपि राष्ट्र के सनातन स्वरूप को देखते हुए 74 वर्ष एक अरब 40 करोड़ की जनसंख्या को सही दिशा देने और उसकी सभी समस्याओं का समाधान करने के लिए बहुत अधिक भी नहीं होते। इस सबके उपरांत यदि भारत के पिछले 74 वर्षों पर प्रकाश डालें तो इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि भारतवर्ष ने पिछले 74 वर्षों में बहुत कुछ किया है। जिस देश में आजादी से पूर्व सुई तक नहीं बनती थी, उसमें आज हवाई जहाज बन रहे हैं। अतः यह कहना कि हमने कुछ नहीं किया- देश के युवाओं, किसानों, मजदूरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों आदि के पुरुषार्थ को नकारना होगा।

आज के फूहड़ गानों, गीतों और कविताओं को सुनकर बड़ा दुःख होता है। क्योंकि इनमें देशभक्ति, समाज सेवा, राष्ट्र सेवा और संस्कृति व धर्म की रक्षा का कोई भाव नहीं होता। जब अनायास ही पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अपनी प्रातः स्मरणीया पूजनीया माँ के कई गीत याद आते हैं। जिन्हें उनके पवित्र मुखारविंद से बचपन में सुना था। उस समय चाहे उनसे बहुत अधिक प्रेरणा ना मिली हो पर आज जरूर यह बात रह-रहकर याद आती है कि माँ के वे गीत कितने प्रेरणास्पद थे? और माँ भी कितनी संस्कारवान थीं? जिन्होंने हमारे बचपन में गीत सुनाकर हमको सही राह दिखाई। माँ के उन गीतों से यह भी पता चलता है कि 1947 से पहले जनसाधारण के भीतर देशभक्ति का भाव किस सीमा तक सिर चढ़कर बोल रहा था? गाँव देहात की महिलाएँ भी ऐसे गीत गा रही थीं कि जिन्हें सुनकर देशभक्ति के लिए समर्पित होकर लोग काम करने को प्रेरित होते थे।

माँ का एक प्रिय गीत था :-

पिताजी ! मेरी मत करो शादी रे,
उम्र बारह बरस की है रे,
लिखा दो नाम कांग्रेस में रे, चलूँगी वेद मार्ग पै रे,
करूँगी देश की सेवा रे..

इस गीत में एक नाबालिग बच्ची अपने पिता से नाबालिग अवस्था में शादी न करने की प्रार्थना कर रही है और साथ ही यह निवेदन भी कर रही है कि- “हे पूज्य पिता! आप मेरा नाम कांग्रेस में लिखवा दो। क्योंकि मैं देश की सेवा करना चाहती हूँ। शादी के झमेले में पड़कर घर गृहस्थी में जाना नहीं चाहती। मेरी इच्छा है कि मैं वेद के मार्ग पर चलूँ और राष्ट्र की सेवा में संलग्न हो जाऊँ।” ऐसे गीत आर्य समाज के भजनोपदेशकों के माध्यम से माँ ने सुने और सुबह सुबह इन गीतों को गाने का नित्य प्रति का अपना नियम बना लिया। आर्य जगत के सुप्रसिद्ध भजनोपदेशक स्वामी भीष्म जी व बस्तीराम जी जैसे अनेकों विद्वान उस समय पूज्य पिताजी के पास घर पर आया करते थे, जिनसे ये गीत माँ ने सुने।

माँ के लिए यह परम सौभाग्य की बात थी कि उनके पूज्य पिता और हमारे नाना जी महाशय मुंशीसिंह नागर भी आर्य समाजी थे और प्रत्येक प्रकार के पाखंड का खंडन करने में अपने क्षेत्र में अग्रणी रहते थे।

माँ का दूसरा गीत था :-

वीर भारत में रे आओ
कैसे खड़े हो परली पार
वीर हमने बाग लगाए
माली बसाओ अपने आप…

इस गीत में गाँव देहात की देवियाँ अपने उन वीर क्रांतिकारियों का आवाहन करती थीं जो सदियों से देश की आजादी के लिए संघर्ष करते आए थे, वीरों की उस परंपरा को घुन न लग जाए और दुश्मनों के सिरों को काटकर उनके रक्त से स्नान करने वाली तलवारें कहीं जंग का शिकार न हो जाएँ, इसलिए देवियाँ यह आवाहन करती थीं कि वीरो! भारत में फिर वैसी ही क्रांति मचाओ जैसी तुमने अब से पहले मचाई थी। आपको समरांगण से दूर खड़े होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि समरांगण में आकर के शत्रु संहारक बनकर माँ भारती के गुलामी के बंधनों को काटने का पुरुषार्थ करो। बाग लगाने का अभिप्राय है कि हमने तेजस्वी संतान को जन्म दिया है। माली बसाने का अभिप्राय है कि हमारी इस तेजस्वी संतान को राष्ट्र सेवा का प्रशिक्षण आप स्वयं दो।

यद्यपि माँ बहुत कम पढ़ी लिखी थीं। परंतु फिर भी अनेकों वेदमंत्रों और खासतौर से यज्ञ हवन के मंत्रों को कंठस्थ किए हुए थीं। यह ज्ञान उन्हें अपने पूज्य पिता और उसके पश्चात् अपने पति व हमारे पूज्य पिता म० राजेंद्र सिंह आर्य जी से प्राप्त हुआ। वे प्रातः काल में उठकर अपनी दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होती थीं। उनके पास घड़ी नहीं होती थी, परंतु रात्रि में चांद तारों की गति को देखकर समय का अनुमान लगा लिया करती थीं। और चक्की पीसते हुए अक्सर गाती थीं :-

समय है कीमती नहीं हाथ से निकालो
उठो सोने रे वालो…
रैन गई सोते सुबह हो गई है
तजो नींद गफलत की,
होश सम्भालो उठो सोने रे वालो…

इस गीत के दो अर्थ हैं एक तो सीधा सादा अर्थ है कि जो प्रातःकाल में सोए हुए हैं वह उठ जाएँ और एक दूसरा अर्थ सभी देशवासियों से की जाने वाली यह अपील है कि मेरे प्यारे देशवासियो ! आजादी प्राप्त करने के लिए भोर हो गई है। अनेकों क्रांतिकारी वीर योद्धा फाँसियों पर झूलते हुए या अंग्रेजों का विनाश करते हुए मानो उन पक्षियों की भाँति चहचहा रहे हैं जो प्रातः काल में उठकर पेड़ों की शाखाओं पर बैठे हुए शोर करने लगते हैं। समय बहुत कीमती है। इसे हाथ से निकालने की आवश्यकता नहीं है। जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी विदेशियों को इस पवित्र धरती से बाहर निकालने के राष्ट्रीय पुरुषार्थ में जुट जाओ। होश संभालो और आजादी की कीमत समझते हुए राष्ट्र की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व समर्पण करने की प्रतिज्ञा लो।

देश धर्म और संस्कृति के प्रति समर्पित माँ गौ माता के प्रति भी बहुत भक्ति भाव रखती थीं। गाय के लिए बने इस गीत को भी वह अक्सर गाया करती थीं :-

अरे गौ माता रोवै
खड़ी रे कमेले में…
दुष्ट तैने मेरे दूध की खीर बनाई
दुष्ट तैने बड़े चाव से खाई,
अरे आज जरा शर्म नहीं आई,
आज बेच दई धेले में …

गौ माता की यह करुण पुकार अपने स्वामी से है। जिसने उसके दूध को पिया और दूध से बनी खीर को खाकर अपने शरीर को हृष्ट पुष्ट किया। परंतु जब वह बिना दूध की हो गई तो निर्लज्ज पापी उस स्वामी ने बिना किसी लज्जा के उसे कसाई के हाथों बेच दिया। अब जब वह कसाई के कमेले में खड़ी है तो वहाँ पर अपने आँसू बहाते हुए यह करुण पुकार कर रही है।

आज इन जैसे गीत कहीं सुनने को नहीं मिलते। सारा कुछ श्रृंगार रस में डूब कर रह गया है। युवा पीढ़ी नशे में या वासना भरे गीतों को सुनने में व्यस्त और मस्त हो गई है, इसलिए स्वस्थ नहीं रही है। सारे देश में निराशा का वातावरण बन गया है क्योंकि उत्साहवर्धक गीत हमसे छीन लिए गए हैं। वास्तव में आज फिर ऐसे ही गीतों को बनाने, सुनने और गाने की आवश्यकता है। निश्चय ही आर्य समाज के वर्तमान नेतृत्व के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती है।

जीवन की अनेकों जिम्मेदारियों का बोझ उठाए जब यह सिर थक जाता है तो आश्रय पाने और दुलार की चाहत लिए माँ की गोद को ढूँढता है। तब माँ की गोद तो नहीं मिलती परंतु उसकी उसके बोल जरूर मिल जाते हैं, जो मानस में एक अजीब सी गुदगुदी करते हैं। यह एहसास कराते हैं कि माँ के बोल भी गोद से कम नहीं। जीवन के इस पड़ाव पर आकर यह आभास हुआ है कि माँ की गोद और बोल में कितनी समरूपता है? जब थकान अधिक बढ़ जाती है और आसपास की परिस्थितियों से मन उच्चाटन में भटक जाता है तब भी कई बार मन करता है कि माँ के पास चला जाए। पर माँ है कि गंगापुत्र भीष्म की माँ सत्यवती की भाँति हमारी यादों के झरने से ही कहीं दूर से यह संकेत कर देती है कि “अभी नहीं। अभी संसार समर में रुको और अपनी मर्यादा में रहते हुए अपनी पूर्ण भूमिका का निर्वाह करो। मैदान छोड़कर भागना उचित नहीं।”

खैर ! बात कहने की यह है कि जिस समय देश की आजादी की जंग लड़ी जा रही थी, उस समय देश का जनसाधारण यहाँ तक कि गाँव देहात की महिलाएँ भी देशभक्ति की भावनाओं से भर चुकी थीं। उस समय का देशभक्ति का परिवेश चारों तरफ फैल गया था। गीतों के इन पवित्र बोलों से अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय देश के जनसाधारण को झकझोरने वाले गीतों को बना बनाकर आर्य समाज देश की कितनी बड़ी सेवा कर रहा था? जब देवियाँ इन गीतों को गाती थीं तो ऐसा कौन हो सकता था जिसका मन देश के प्रति समर्पित होकर विदेशियों के विरुद्ध हो रहे आंदोलन में अपनी आहुति देने के लिए अपने आप को प्रस्तुत न कर सकता हो?
क्रमशः

– डॉ राकेश कुमार आर्य

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