कैसी कथाओं का आयोजन होना चाहिए श्रावण माह में ? भाग -1

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(श्रावण मास में हमें कैसी वेद कथाओं का आयोजन करना चाहिए ? इस विषय पर हमने पिछले दिनों अपनी ओर से कुछ प्रकाश डाला था। अब इसी विषय पर ‘उगता भारत’ समाचार पत्र के चेयरमैन श्री देवेंद्र सिंह आर्य जी का यह लेख ग्रंथियों और भ्रांतियों का समाधान करने में बहुत अधिक सक्षम है। जिसे हम पाठकों के लिए यहां पर इस आशा और अपेक्षा से प्रकाशित कर रहे हैं कि वह श्रावण मास के इस पवित्र महीने में कथा से संबंधित तथ्यों, रहस्यों और पात्रों के विषय में गंभीर जानकारी लें – संपादक )

जो मूढ होते हैं वे गूढ़ को न समझ कर रूढ़ की बात करते हैं, ऐसे मूढ लोगों से क्षमा चाहते हुए विचारवान विद्वान , सत्यान्वेषी, सत्यपारखी ,सत्याग्रही, लोगों के समक्ष एक प्रकरण उद्धत करना चाहूंगा।
शिव किसको कहते हैं?
शिवलिंग क्या है?
कैलाशपति क्या है?
शिव के पर्यायवाची क्या क्या हैं?
शिवनाद और डमरु क्या है?
भस्मासुर की वास्तविक कथा क्या है?
ऐसे ही अनेक प्रश्न जो शिव से जुड़े हैं, आइए, उनका समाधान करते हैं।
प्रश्न : शिव किसको कहते हैं?
उत्तर : शिव परमात्मा को कहते हैं।ईश्वर के नाम कहीं गौणिक, कहीं कार्मिक और कहीं स्वाभाविक अर्थों के वाचक हैं ।इसलिए ईश्वर का एकमात्र सही निज नाम केवल ओ३म हैं। शेष नाम उसके कार्मिक, स्वाभाविक एवम् गौणिक हैं। उदाहरण के तौर पर विराट, पुरुष ,देव ,आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, विश्वंभर, विष्णु ,शिव, यह नाम लौकिक पदार्थों के और मनुष्यों के भी होते हैं और यही नाम ईश्वर के भी होते हैं।
प्रश्न : इनमें अंतर कैसे करें?
उत्तर : जहां-जहां उत्पत्ति ,स्थिति, प्रलय,अल्पज्ञता ,जड़ता, दृश्य आदि विशेषण भी हों वहां- वहां परमेश्वर का अर्थ नहीं होता।अर्थात जहां उत्पन्न, एक आकार में स्थित होकर के और प्रलय अथवा नष्ट होता हो वह ईश्वर नहीं है।जैसे शंकर अर्थात जो सुख का करने हारा है, उस ईश्वर का नाम शंकर है।दूसरी तरफ आप किसी व्यक्ति का नाम भी शंकर देखते हो।
लेकिन जो शंकर ईश्वर का नाम है वह नष्ट नहीं होता परंतु जो व्यक्ति का नाम शंकर है वह नष्ट होने वाला है। इसी प्रकार जो कल्याण करने वाला है उसको शिव कहते हैं । कल्याण केवल परमात्मा करता है ,इसलिए परमात्मा कल्याणकारी है। अत:परमात्मा शिव है।
(महर्षि दयानंद कृत अमर ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रथम समुल्लास का अध्यय्न करें)

शिव आत्मा को कहते हैं।जैसे त्रेता युग में एक राजा शिवजी हुए हैं वह एक आत्मा थीं। जैसे आपने व्यक्तियों के नाम शिवकुमार, शिवराज, शिवपाल अपने जीवन में देखे और सुने होंगे। ऐसे ही वह शिव एक व्यक्ति थे। एक राजा थे। एक योगी थे। एक सद्गृहस्थी थे, दक्ष की पुत्री पार्वती उनकी पत्नी थी इसलिए गृहस्थी थे।उनके संतान भी थी।अर्थात वे ईश्वर नहीं थे।
शिव सूर्य को कहते हैं। शिव राजा को कहते हैं।
त्रेता युग में अब से करीब 1269000 वर्ष पहले रामचंद्र जी हुए थे। उन्हीं के समकालीन थे। राजा रावण, राजा शिव, ऋषि श्रृंग, भारद्वाज मुनि, सोनक मुनि एवं अन्य ऋषि गण।

राजा शिव के विषय में जानकारी

हमने जाना कि वैदिक साहित्य में शिव के नाना पर्यायवाची शब्द अर्थ हैं। जैसे शिव नाम परमात्मा का, शिव नाम राजा का, शिव नाम आत्मा का और शिव नाम सूर्य का। श्रंग ऋषि की आत्मा ब्रहम ऋषि कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी में आती थी। इसलिए
दिनांक 18 अक्टूबर 1964 को अपने उपदेश में श्री कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी अर्थात पूर्व जन्म के श्रृंग ऋषि महाराज कहते हैं कि उन्होंने राजा शिव के दर्शन किए थे। जब शिवजी एक राजा थे। जो रावण के गुरु कहलाते थे। हिमाचल राजा दक्ष की कन्या पार्वती के साथ उनका संस्कार हुआ था। लेकिन बहुत ही सुंदर, बहुत ही विवेकी पुरुष थे।
मूढ लोग जान लें कि राजा शिव नीले या काले रंग के नहीं थे, क्योंकि उनके समकालीन जो प्रत्यक्षदर्शी श्रृंग ऋषि हुए उन्होंने बताया कि शिव बहुत ही सुंदर और विवेकी पुरुष थे। जिस राजा के राज में प्रजा का आचरण बहुत उच्च कोटि का होता हो, जिस राजा के राज्य की प्रजा बहुत ऊंचे विचारों की सदाचरण करने वाली होती है उस राजा को शिव कहते हैं। उसी राजा को कैलाशपति की पदवी दी जाती थी अर्थात ऊंचे शिखर वाली प्रजा कैलाश कही गई और उसका स्वामी कैलाशपति कहलाता था।
महाराजा शिव कैलाश पर्वत पर तपस्या किया करते थे। कैलाश कहते हैं, बहुत उच्च शिखर वाला पर्वत।
एक संसार का रचयिता स्वामी है, जो शिव है, जो लिंग अर्थात प्राण में संसार को धारण कर रहा है। आज हम उस लिंगमय ज्योति वाले शिव की याचना करते चले जाएं जिसने महत्व देकर इस संसार को विलक्षण बनाया। शिव नाम उस द्रव्य पति का भी है जो अपने द्रव्य को यथाशक्ति संसार के शुभ कार्यों में लगाता है ।राष्ट्र के कार्यों में लगाता है। रक्षा के कार्यों में लगाता है। धर्म के कार्यों में लगाता है ।उस द्रव्य को भी लिंग मय ज्योति कहा जाता है।
प्रश्न : अब प्रश्न पैदा हुआ कि शिवलिंग क्या है ?
प्रश्न : इसमें से कैसे ज्योति प्रस्फुटित होती है?
प्रश्न: शिव ने संसार को लिंग में कैसे धारण कर रखा है?

इसके लिए शिव लिंग के वास्तविक वैदिक अर्थ एवं महत्व को समझना होगा।

शिवलिंग

इससे पहले कि हम वास्तविक शिवलिंग की बात करें हम लोक में प्रचलित एक रूढ़ कथा का उदाहरण ले लेते हैं । लेकिन उसका गूढ़ अर्थ कुछ और है उसको भी समझने का प्रयास करेंगे। कहते हैं कि एक बार महाराजा शिव नग्न होकर ऋषि पत्नी के द्वार पहुंच गए तो ऋषियों ने शाप दिया कि तेरा लिंग पृथ्वी में स्थापित हो जाए। इस प्रकार उनका लिंग पृथ्वी में स्थापित हो गया और अपनी क्रीड़ा करने लगा। तीनों लोकों में :त्राहिमाम त्राहिमाम’ मच गया। देवताओं ने याचना की तो विष्णु ने कहा कि तुम पार्वती की याचना करो वह अपनी “भग: लिंगों धारणा अचेत “करके इसको शांत कर देगी।

प्रश्न : इसका दार्शनिक रूप क्या है ?
प्रश्न : इसका गूढ़ अर्थ क्या है?
प्रश्न : इसका वैदिक साहित्य में क्या अर्थ है?
उत्तर : शिव नाम परमात्मा का है। पार्वती नाम प्रकृति का है ,तथा प्राण लिंग को भी कहते हैं।
शिव ,पार्वती और लिंग का समायोजन देखें । संसार में जब प्राण अर्थात लिंग बिना प्रकृति के आता है अर्थात बिना पार्वती के होता है तो वह ‘त्राहिमाम त्राहिमाम’ कर देता है, जैसे मनुष्य के शरीर में जब अपान और प्राण दोनों की एक गति हो जाती है तो मानव मृत्यु को प्राप्त हो जाता है ,अर्थात ‘त्राहिमाम त्राहिमाम’ हो जाती है। इसी प्रकार जब प्राण रूपी लिंग इस संसार में बिना प्रकृति के आता है तो ‘त्राहिमाम त्राहिमाम’ मच जाती है।
यहां प्रासंगिक है कि प्राण व अपान का अर्थ क्या है? इसको समझ लेते हैं।
अपान प्राणवायु को अंदर लेने की प्रक्रिया है, तथा प्राण प्राणवायु को बाहर छोड़ने की प्रक्रिया है।
(यह बात केवल विद्वान लोग ही समझ सकते हैं।
दुर्भाग्यवश जब भारतवर्ष में वेद की विद्या लुप्त हुई तो शिव पार्वती और लिंग के वास्तविक अर्थ को समझाने वाले नहीं रहे)

देवता उस समय याचना किया करते हैं आवाहन करते हैं कि हे! माता पार्वती अर्थात प्रकृति तू आ । उस समय यह प्रकृति माता पार्वती आती है ।भग नाम ही इस प्रकृति का है ।वह लिंग रूपी प्राण को अपने में धारण कर शांत किया करती है। जब प्राण और अपान दोनों की गति विषम चलती हो तो आयुर्वेद का कोई महान आचार्य किसी औषधि अथवा सोमलता को देकर उनकी संधि कराता है। जिससे वह प्राण धारी यथार्थ गति पर आ जाता है। अर्थात उसमे वापस प्राण लौट आता है।इससे सिद्ध होता है कि अपान और प्राण जब तक है तभी तक जीवन है।
इसी प्रकार जब प्राण को प्रकृति (यानी लिंग को पार्वती) धारण करती है तो सृष्टि प्रारंभ हो जाती है और जो इस प्रकार की सृष्टि का सृजन कर प्रारंभ करता है उसका नाम शिव है।सृष्टि का प्रारंभ करने वाला तो केवल एक परमात्मा ही तो है उसी का नाम शिव है।
(इसी सच्चे शिव की खोज के लिए महर्षि दयानंद घर से निकल थे, महर्षि दयानंद का जन्म काठियावाड़ की रियासत के ग्राम टंकारा, गुजरात प्रांत में 12 फरवरी 18 24 को पिता श्री कृष्ण दत्त तिवारी और माता श्रीमती अमृत बाई के ब्राह्मण परिवार में हुआ था।


जब वह 14 वर्ष के थे तो उनके माता-पिता ने उनको शिवरात्रि के अवसर पर व्रत रखने का निर्देश दिया था। रात्रि के समय शिव जी की मूर्ति के पास वह बालक मूल शंकर बैठा हुआ था। उसने देखा कि कुछ चूहे शिव जी की मूर्ति पर चढ़कर उसको मल मूत्र से गंदा कर रहे हैं और शिव जी पर चढ़ाई गई मिठाई को खा रहे हैं। उन्होंने ऐसा देखा कि यह शिवजी अपनी रक्षा नहीं कर सकते। चूहों को नहीं भगा सकते ।अपने चढ़ावे को बचा नहीं सकते तो यह कैसे शिव हैं। माता-पिता से संतोषजनक जवाब नहीं मिलने के कारण उन्होंने सच्चे शिव की खोज करने के लिए प्रण किया और वह प्रत्येक तपोवन ,तपस्थली में साधु, संतों ,सिद्ध पुरुषों , त्यागीजनों, ब्राह्मणों ,तपस्वी मनस्वी ,ज्ञानियों , ध्यानियों, अक्कड़ , फक्खड़ से अखाड़ों में , मंदिरों में ,जंगल में ,झाड़ियों में मिल कर ऐसे गुरु को ढूंढते फिरते रहे जो सच्चे शिव के दर्शन करा सके। लेकिन कोई भी ऐसा उनको नहीं मिला। जिससे वह काफी हताश हुए लेकिन बाद में स्वामी पूर्णानंद ने उनको सन्यास दिलाकर स्वामी दयानंद नाम दिया और यही शुद्ध चैतन्य ब्रह्मचारी योगाभ्यास और तपश्चार्य में रत रहने लगे। फिर मथुरा में प्रज्ञा चक्षु गुरु विरजानंद जी के शिष्य बने जो बाद में भारत के भविष्य बने तथा वामन से विराट बने जो बहुत ही बुद्धिशाली थे। जो अपने गुरु के आदेश पर भारत मां की दुर्दशा और दयनीय स्थिति से उभारने के लिए भारत भ्रमण पर निकले। जब भारत भ्रमण पर निकले तो उन्होंने चारों तरफ घूम करके अपना वतन भी देखा और वतन में लोगों का पतन भी देखा। आपस की फूट, पाखण्ड की भीषण चक्की में पिसती जनता, कुरीतियों की कारा में सारा समाज बंदी देखा, संस्कृति के रक्षकों को भक्षक के रूप में देखकर उनको बहुत कष्ट हुआ।
ऐसे लोगों को भी देखा जो मगरमच्छ की तरह धर्म सरोवरो को गंदा कर रहे थे।मक्कारों के जकड़ में सारा समाज आया हुआ था। महर्षि दयानंद ने देखा कि भक्ति अज्ञानी लोगों के मजबूत शिकंजा में फंसी हुई है । आर्यों की सभ्यता समाप्त प्राय: होती जा रही है। भक्ति पापियों के पंजों में फंसी हुई है। ईश्वर के नाम पर व्यापार होता है। ईश्वर खुले बाजारों में बिकता है ।भारत की जनता के विचारों में भारी परिवर्तन आ चुका था ।लोगों के आचरण और व्यवहार में चालाकी समा गई थी। मंदिरों में धर्माधिकारियों की आरती रमणियां उतारा करती थीं। छिप छिप कर लंपट रासलीला करते थे।महर्षि दयानंद ने देखा कि वेदों की ऋचाए लुप्त हो रही थीं। धर्म क्षीण हो रहा था। धर्म के स्थान पर अधर्म और पराक्रम के स्थान पर प्रमाद सर्वत्र छाया हुआ था। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में महर्षि दयानंद ने समाज सुधार का कार्य किया और इस देश की दिशा और दशा बदलने का सफल और सार्थक प्रयास किया वेद की विद्या को पुनर स्थापित किया। अछूतों का उद्धार किया। नारी को सम्मान दिलाया। सूत्रों और नारी को वेद को पढ़ने का अधिकार दिया।
हम इससे समझें कि महर्षि दयानंद एक ब्राह्मण तिवारी परिवार में पैदा हुए थे और उन्होंने उन ब्राह्मणों का ही विरोध किया जो धर्म के नाम पर पाखंड कर रहे थे और भक्ति के नाम पर लोगों को बहकाकर टका बटोरी कर रहे थे। उदर पूर्ति उनका केवल एक उद्देश्य रह गया था। केवल अन्य मय कोष के प्राणी बनकर रह गए थे। कमोबेश आज भी वही परिस्थितियां भारतवर्ष के समक्ष हैं। क्योंकि आज भी मूर्खों की संख्या अधिक ही है।जो शिव के सच्चे स्वरूप को नहीं समझ पाते हैं।

प्रस्तोता : देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत समाचार पत्र

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