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स्वामी धर्मबंधु

कुछ लोग हिन्दू शब्द को ऋग्वेद में ढूंढ़ने का बौद्धिक विलास जैसा करते हैं, परन्तु वेद और उसके अंग में जैसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद,अथर्ववेद, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद, अर्थवेद, ऐतरेय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण, ताण्ड्य ब्राह्मण, साम ब्राह्मण, विंश ब्राह्मण, गोपथ ब्राह्मण या किसी १०२७ वेद की शाखाओ में हिन्दू शब्द उपलब्ध नही है । इसके अतिरिक्त धर्म विधान ग्रंथ स्मृतियों जैसे कि- मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, वशिष्ठ स्मृति, पराशर स्मृति,अत्रि स्मृति इत्यादि , आध्यात्मिक ग्रंथ उपनिषदों और दार्शनिक ग्रंथ जैसे- योग, सांख्य, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत में भी हिन्दू शब्द अनुपलब्ध है। ऐतिहासिक ग्रंथ वाल्मीकि रामायण, २३५६० श्लोक और महाभारत १००२१७ श्लोकों में हिन्दू शब्द नही मिला। और न ही किसी नीतिशास्त्र जैसे- चाणक्य नीति, भर्तृहरि की नीतिशतकम्, शुक्राचार्यनीति, विदुरनीति या कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी हिन्दू शब्द के दर्शन नही हुए। सम्पूर्ण संस्कारों के ग्रन्थ जैसे गृहसूत्र- गोभिल सूत्र, आश्वलायन सूत्र इत्यादि और १८ पुराण १८ उपपुराण में भी हिन्दू शब्द दिग्दर्शित नहीं हुआ। संस्कृत साहित्य जैसे- अभिज्ञानशाकुंतलम, मुद्राराक्षस,पंचतंत्र, भरतनाट्यम्, नैषधीयचरितम, हर्षचरितम्, दशकुमारचरितम् रघुवंश, इत्यादि में भी हिन्दू शब्द के दर्शन नही हुए।।

कुछ इतिहासकारो का तर्क यह है कि सिंधु नदी के किनारे बसने वाले को हिंदू कहा जाता है क्योंकि पर्सियन लोग स को ह बोलते है इसलिए सिन्धु सभ्यता हिन्दू हो गया । परन्तु पारसी लोगों का धर्म ग्रन्थ जंदावस्ता यानि अवेस्ता है इसका उच्चारण पारसी लोग स ही करते है ईरान का प्रमुख शहर इस्फ़हान है इसको भी स ही बोलते है।यदि स को ह बोलते है तो ध का द कैसे हो गया। ? गुजरात के लोग ‘स’ को ‘ह’ उच्चारित करते हैं । यद्यपि भारतवर्ष में ११४९० किमी० हमने पैदल चलकर भ्रमण किया है परंतु किसी भारतीय को सिंधु नदी का नाम हिंदू नदी कहते नहीं सुना और ना ही किसी गुजराती से सिंधु को हिन्दू बोलते हुए सुना । एक सज्जन ने तर्क प्रस्तुत किया कि ऋग्वेद में शैन्धव शब्द आया है कालांतर में शैन्धव से हैन्दव हुआ और हैन्दव से हिंदू हो गया परंतु किसी वेद पाठी ने शैन्धव को हैन्दव आज तक नहीं पढ़ा । ऐसे बुद्धिवादियों के ऊपर हम दया ही कर सकते हैं ।
वैसे भी शैंधव शब्द का संस्कृत भाषा में अर्थ घोड़ा और नमक होता है क्या घोड़े और नमक के आधार पर जाति का नाम हो सकता है ? इस प्रश्न का उत्तर उन्हीं बुद्धिमान मनीषी के पास हो सकता है।
अधिकांश इतिहासविदो का मानना है कि ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम अरब के लोगों द्वारा प्रयोग किया गया था लेकिन कुछ इतिहासविद्दों का यह भी मानना है कि यह लोग पारसी थे जिन्होंने हिमालय के उत्तर पश्चिम के रास्ते से भारत में आकर वहां के बाशिंदों के लिए प्रयोग किया था।
धर्म और ग्रन्थ के शब्दकोष के वोल्यूम # 6,सन्दर्भ # 699 के अनुसार हिंदू शब्द का प्रादुर्भाव/प्रयोग भारतीय साहित्य या ग्रन्थों में मुसलमानों के भारत आने के बाद हुआ था।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में पेज नम्बर 74 और 75 पर लिखा है कि “the word Hindu can be earliest traced to a source of a tantric in 8th century and it was used initially to describe the people, it was never used to describe religion…” पंडित जवाहरलाल नेहरू के अनुसार हिंदू शब्द तो बहुत बाद में प्रयोग में लाया गया। हिन्दुज्म शब्द की उत्पत्ति हिंदू शब्द से हुई और यह शब्द सर्वप्रथम 19वीं सदी में अंग्रेज़ी साहित्कारों द्वारा यहाँ के बाशिंदों के धार्मिक विश्वास हेतु प्रयोग में लाया गया।
नई शब्दकोष ब्रिटानिका के अनुसार, जिसके वोल्यूम# 20 सन्दर्भ # 581 में लिखा है कि भारत के बाशिंदों के धार्मिक विश्वास हेतु (ईसाई, जो धर्म परिवर्तन करके बने उनको को छोड़ कर) हिन्दुज्म शब्द सर्वप्रथम अंग्रेज़ी साहित्यकारों द्वारा सन् 1830 में प्रयोग किया गया था।
डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी राष्ट्रपति बनने के पश्चात एक सभा को सम्बोधित करते हुए अपने व्याख्यान में हिंदू शब्द को भौगोलिक अर्थ में प्रस्तुत किया था उन्होंने कुलार्लव तंत्र का श्लोक उद्धृत करते हुए कहा था कि-
हिमालयं समारम्भे यावदिन्दु सरोवरम्।
तत्देव निर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।।
हिमालय से आरंभ होकर समुद्र पर्यन्त जो भूमि हैं उस देव निर्मित देश को हिन्दुस्थान कहते हैं महर्षि दयानंद सरस्वती जी अपने लाहौर प्रवास के समय डॉक्टर रहीम खान की कोठी में रुके हुए थे ।डॉक्टर रहीम खान ने उनसे पूछा की स्वामी जी हिंदू का अर्थ क्या है? तो स्वामी जी ने कहा कि हिन्दू एक भौगोलिक शब्द है। हिन्दू शब्द का भौगोलिक व्याख्या इस प्रकार है। हिमालय का हि और समुद्र को संस्कृति में ‘इन्दू’ कहते हैं तो हिमालय से लेकर समुद्र पर्यन्त इस भूमि को हिंदुस्थान कहते है अर्थात् हिंदू भूगोल का शब्द है । यहाँ स्मरण रहे कि- उपर्युक्त श्लोक या पुस्तक की रचना मुस्लिम और ब्रिटिश शासन के मध्य का है किसी प्राचीन ऋषि मुनि द्वारा निर्मित नही है। जैसे मुग़ल काल में अकबर को खुश करने के लिए पण्डितो ने अल्लोपनिषद नामक ग्रन्थ की रचना कर डाली थी। तथाकथित विद्वान लोग ऋग्वेद के मन्त्र * सप्त सिन्धव:* से सिन्धु सभ्यता सिन्धु नदी की कल्पना करते है। स्मरण रहे कि वेद के शब्दों के आधार पर नगर नदी और मनुष्यों के नाम लोगों ने रखा , परन्तु वेदों में इतिहास ढूँढना बौधिक दिवलियापन का परिचय देना है।
अनेक विद्वान तर्क प्रस्तुत करते हैं कि पर्सियन लोग सिंधु के इस पार रहने वाले लोगो को हिन्दू कहते थे इसलिए हम लोग हिंदू हो गए। प्रश्न उत्पन्न होता है कि दूसरों के द्वारा प्रदान किए गए सम्बोधन को हमें क्यू स्वीकार करना चाहिए ? फ़ारसी भाषा में हिन्दू शब्द का क्या अर्थ होता है? इसे जानने का प्रयत्न करना चाहिए । भारत देश के गुजरात राज्य में एक गोण्डल नामक राज्य था वहाँ के महाराजा सर भगवत सिंह जी जो उस समय के सर्वाधिक शिक्षित एवं प्रगतिशील शाशक थे । उन्होंने गुजराती शब्दकोष तैयार कराया था जिसे भगवत गोमण्डल के नाम से जाना जाता है । इसमें 281000 शब्दों के 822000 अर्थ है यह 9 Volumes 9266 पृष्ठ का ग्रन्थ है। इस शब्दकोष के अन्तर्गत पृष्ट 9216 पर हिंदू का अर्थ चोर, लुटेरा, ग़ुलाम, काला, हिन्दू धर्म को मानने वाला इत्यादि लिखा है । (1987 प्रवीण प्रकाशन) महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने अपने पुणे प्रवचन में हिंदू जाति सूचक शब्द के लिए इसी प्रकार के विचार प्रकट किए थे।।
हम सभी भारतवासी भारतीय है जिसका उल्लेख ऋग्वेद मे इसप्रकार है । आ नो यज्ञं भारती।।
ऋग्वेद-१०/११०/८भरत आदित्यस्तस्य भा:॥*
निरुक्त-८/१३ सहैष सूर्यो भर्तः।।
शतपथ-४/६/७/२१
भरत नाम सूर्य का है, सूर्य का प्रकाश ज्ञान का आलोक ही भारत है इस दृष्टिकोण से हमारा देश भारत है, और हमारी संस्कृति भारती है।।
तत्पश्चात प्रश्न उत्पन होता है कि हम लोगों का जातिगत नाम क्या है? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि हमलोगो का जातिगत नाम आर्य है। इसका प्रमाण सभी शास्त्रों में उपलब्ध है। परन्तु आधुनिक युग में तथाकथित विद्वान लोग हम भारतीयों को भ्रमित करने का प्रयत्न करते है कि आर्य विदेशी है, ये लोग ईरान से आए है । जबकि ईरान के स्कूलों में पढ़ाया जाता है कि- कुछ हजार साल पहले आर्य लोग हिमालय से उतर कर आये और यहाँ का जलवायु अनुकूल जानकर यही बस गए। (चंद हज़ार साल पेश जमाना माजीरा बजुर्गी अज़ निजा़द आर्या अज़ कोहहाय कफ् काज़ गुज़िश्त: बर सर ज़मीने की इमरोज़ मस्कने मास्त कदम निहाद्धन्द। ब चूं.आबो हवाय ई सर ज़मीरा मुआफ़िक तब’ अ खुद याफ्तन्द दरीं जा मस्कने गुज़ीदत्र ब आंरा बनाम खेश ईरान ख़यादन्द ।- देखो- जुग़राफ़िया पंज क़ितअ बनाम तदरीस रहसल पंजुम इब्तदाई, सफ़ा ७८; कालम १, मतब अ दरसनहि तिहरान, सन् हिजरी १३०९, सीन अव्वल व चहारम अज़ तर्फ़ विज़ारत मुआरिफ् व शरशुदः।।) ईरान के बादशाह सदा अपने नाम के साथ *’आर्यमेहर’ की उपाधि लगाते रहे हैं। फारसी में ‘मेहर’ सूर्य को कहते हैं। ईरान के लोग अपने को ‘सूर्यवंशी क्षत्रिय आर्य’ मानते है।
Prof. Maxmular ने Chips from a German Workshop 1967 Page No. 85 में लिखा है कि ईरानियों के पूर्वज ईरान पहुँचने से पहले भारत में बसे थे।और वहाँ से ईरान गये थे।

आर्य शब्द के प्रमाण
सृष्टि की समकालीन पुस्तक ऋग्वेद में_:-
(1)अहं भूमिमददामार्य्याय ऋग्वेद-४/२६/२
सर्वशक्तिमान ईश्वर कहते है कि यह पृथ्वी हम आर्यों के लिए प्रदान करते है।
यज्ञमानमार्य्यम् -ऋग्वेद
आर्य यजमान होता है अर्थात् परोपकारी, त्यागी, संयमी एव तपस्वी होता है।।
कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । ~ ऋ. ९/६३/५
*अर्थ
– सारे संसार के मनुष्यों को श्रेष्ठ बनाओ।
मनुस्मृति में:-
(2)-मद्य मांसा पराधेषु गाम्या पौराः न लिप्तकाः।आर्या ते च निमद्यन्ते सदार्यावर्त्त वासिनः।।*
अर्थ– वे ग्राम व नगरवासी जो मद्य, मांस और अपराधों में लिप्त न हों तथा सदा से आर्यावर्त्त के निवासी हैं वे ‘आर्य’ कहे जाते हैं।
The denizens of villages and cities who do not drink, eat meat, committ no crime and are residents of Aryavarta are to be hailed as Aryas

(3)-वाल्मीकि रामायण में
सर्वदा मिगतः सदिशः समुद्र इव सिन्धुभिः ।
आर्य सर्व समश्चैव व सदैवः प्रिय दर्शनः ।।-(बालकाण्ड)
अर्थ– जिस तरह नदियाँ समुद्र के पास जाती हैं उसी तरह जो सज्जनों के लिए सुलभ हैं वे ‘आर्य’ हैं जो सब पर समदृष्टि रखते हैं हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हैं।
(4) महाभारत में:-*
न वैर मुद्दीपयति प्रशान्त,न दर्पयासे हति नास्तिमेति।
न दुगेतोपीति करोव्य कार्य,तमार्य शीलं परमाहुरार्या।।(उद्योग पर्व)
अर्थ:- जो अकारण किसी से वैर नहीं करते तथा गरीब होने पर भी कुकर्म नहीं करते उन शील पुरुषों को ‘आर्य’ कहते हैं।
(5)-वशिष्ठ स्मृति में-*
कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्यमाचरन ।
तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य स्मृतः ।।
अर्थ:- जो रंग, रुप, स्वभाव, शिष्टता , धर्म, कर्म, ज्ञान और आचार-विचार तथा शील-स्वभाव में श्रेष्ठ हो उसे ‘आर्य’ कहते हैं।
*(6)-निरुक्त में यास्काचार्य जी लिखते हैं
-*
आर्य ईश्वर पुत्रः।
अर्थ―‘आर्य’ ईश्वर के पुत्र हैं।
(7)- विदुर नीति में_-
आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्माणि कुर्वते ।
हितं च नामा सूचन्ति पण्डिता भरतर्षभ ।।-(अध्याय १ श्लोक ३०)
अर्थ:- भरत कुल भूषण! पण्डित जन्य जो श्रेष्ठ कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं वही ‘आर्य’ हैं।
(8)गीता में_-
अनार्य जुष्टम स्वर्गम् कीर्ति करमर्जुन।
–(अध्याय २ श्लोक २)
अर्थ:- हे अर्जुन तुझे इस असमय परिस्थिति में यह अनार्यों जैसा मोह किस हेतु प्राप्त हुआ क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है और न स्वर्ग को देने वाला है तथा न कीर्ति की और ही ले जाने वाला है (श्री कृष्ण जी यहां पर अर्जुन के अनार्यता के लक्षण दर्शाये हैं)।
(9)- चाणक्य नीति में_-
अभ्यासाद धार्यते विद्या कुले शीलेन धार्यते।
गुणेन जायते त्वार्य,कोपो नेत्रेण गम्यते।।-(अध्याय ५ श्लोक ८)अर्थ:- सतत अभ्यास से विद्या प्राप्त की जाती है, कुल-उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव से स्थिर होता है,आर्य-श्रेष्ठ मनुष्य गुणों के द्वारा जाना जाता है।
*(10)- अमरकोष में_:-

महाकुलीनार्य सभ्य सज्जन साधवः।-(अध्याय२ श्लोक६ भाग३)अर्थ:- जो आकृति,प्रकृति,सभ्यता,शिष्टता,धर्म,
कर्म,विज्ञा=न,आचार,विचार तथा स्वभाव में सर्वश्रेष्ठ हो उसे ‘आर्य’ कहते हैं।
*(11)- कौटिल्य अर्थशास्त्र में_-

व्यवस्थितार्य मर्यादः कृतवर्णाश्रम स्थितिः।अर्थ:- आर्य मर्यादाओं को जो व्यवस्थित कर सके और वर्णाश्रम धर्म का स्थापन कर सके वही ‘आर्य’ राज्याधिकारी है।
*(12)- पंचतन्त्र में_-

अहार्यत्वादनर्धत्वाद क्षयत्वाच्च सर्वदा।
अर्थ:- आर्य लोग ! सब पदार्थों में उत्तम पदार्थ विद्या को ही कहते हैं।
(13)- धम्म पद में_:-
अरियत्पेवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो।
अर्थ:- पण्डित जन सदा आर्यों के बतलाये धर्म में ही रमण करता है।
(14)- पाणिनि सूत्र में_:-
आर्यो ब्राह्मण कुमारयोः।
अर्थ:- ब्राह्मणों में ‘आर्य’ ही श्रेष्ठ है।
(15)- काशी विश्वनाथ मन्दिर के मुख्य द्वार पर_-
*आर्य धर्मेतराणो प्रवेशो निषिद्धः।

अर्थ:- आर्य धर्म से इतर लोगों का प्रवेश वर्जित है।
(16)- आर्यों के सम्वत् में_:-
*जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते अमुक देशान्तर्गते।
ऐसा वाक्य बोलकर पौराणिक भाई भी संकल्प पढ़ते हैं अर्थात् यह आर्यों का देश ‘आर्यावर्त्त’ है।

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