क्या चाइना की 3 बच्चों की नीति परवाने चढ़पाएगी

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चंद्रभूषण

चीन में एक दंपति के लिए एक बच्चे की नीति 1980 से 2015 तक चली। फिर इसे दूरगामी रूप से समाज के लिए नुकसानदेह मानकर बदला गया और 2016 से प्रति दंपति दो बच्चों की नीति लागू की गई। इस बदलाव को लेकर उत्साह वहां सिर्फ एक साल देखा गया। सन 2017 में चीन में पैदा हुए बच्चों की तादाद 2016 से ज्यादा दर्ज की गई, लेकिन अगले ही साल से इस संख्या में फिर से गिरावट शुरू हो गई। भारत और दुनिया के बाकी देशों की तरह चीन में भी राष्ट्रीय जनगणना दशक के आखिरी साल में होती है और अगले दशक के पहले साल में उसके आंकड़े जारी किए जाते हैं। लेकिन जन्म और मृत्यु का हिसाब ज्यादा सख्ती से रखे जाने के कारण वहां आबादी की घट-बढ़ से जुड़े कामचलाऊ आंकड़े हर साल उपलब्ध हो जाते हैं।

कामकाजी आबादी घटी
इसके आधार पर दो बच्चों की नीति नाकाम रहने की बातें वहां 2019 से ही कही जाने लगी थीं। लेकिन नवंबर-दिसंबर 2020 में हुई हालिया जनगणना के ब्यौरे देने का काम इस साल अप्रैल में जब दो बार टाल दिया गया तो यह अफवाह जोर पकड़ने लगी कि पिछले साल चीन में हुई कुल मौतें साल में पैदा हुए कुल बच्चों की तादाद से ज्यादा हो गई है। चीनी अफसरों ने पहले लेख वगैरह लिखकर इस अफवाह को खारिज करने का प्रयास किया। फिर मई में जो आंकड़े जारी किए, उनके मुताबिक देश की आबादी गिरनी तो नहीं शुरू हुई है, लेकिन जैसा रुझान है उसे देखते हुए एक बात पक्के तौर पर कही जा सकती है कि जल्दी कुछ नहीं किया गया तो चीन की पहचान अगले दशक में ही जापान की तरह एक बूढ़े देश जैसी बनने लगेगी।

आंकड़े बता रहे हैं कि 15 से 59 साल की कामकाजी आबादी का जो प्रतिशत वहां पिछली जनगणना में 70 से ज्यादा था, वह इस बार 64 से कम रह गया है, जबकि पेंशन पर निर्भर 60 साल या इससे ऊपर की आबादी पिछली बार 13 प्रतिशत के आसपास थी, जो इस बार 18 प्रतिशत से ज्यादा दिख रही है। इससे जुड़े खतरे को वहां की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी अच्छी तरह समझती है क्योंकि समाज में किसी तरह का आक्रोश-असंतोष पैदा होने का सीधा नुकसान उसी को उठाना पड़ेगा। प्रति दंपति तीन बच्चों की नीति उसकी ओर से इस चिंता के तहत ही लाई गई है। 31 मई को आई इस नीति को लेकर चीन में ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया वेइबो पर बहस शुरू हुई तो 24 घंटे के अंदर 60 करोड़ लोगों ने इसमें हिस्सेदारी की।

ज्यादातर लोगों का यही मानना था कि यह बेकार की कवायद है। पिछले छह वर्षों में दो बच्चों की नीति से अगर आबादी नहीं बढ़नी शुरू हुई तो यकीनन यह काम तीन बच्चों की नीति से भी होने वाला नहीं है। सरकार की तरफ से यहीं एक सर्वे इस सवाल के इर्दगिर्द कराया गया कि नीति में बदलाव के बाद क्या वे अधिक बच्चे पैदा करना चाहेंगे। सर्वे पर आई लगभग 31 हजार एंट्रीज में 28 हजार यानी 90 फीसदी के आसपास जब नकारात्मक पाई गईं तो चुपचाप इस सर्वे साइट को ही बंद कर दिया गया। हांगकांग और ताइवान में इस विषय में जो ओपिनियन पीस प्रकाशित हो रहे हैं, उनमें लोगों का कहना है कि चीन सरकार को अपनी समूची जनसंख्या नियंत्रण नीति को ही कूड़ेदान में डाल देना चाहिए क्योंकि इससे अब किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।

फिलहाल चीन को एक तरफ रखकर हम अपने इर्द-गिर्द ही देखें तो पिछले तीन दशकों में बने ज्यादातर शहरी मध्यवर्गीय परिवारों में एक बच्चा ही नजर आता है, जबकि बच्चों की संख्या को लेकर हमारे यहां कभी कोई कानून नहीं रहा। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि नौकरीपेशा महिलाएं बच्चे का दबाव अपनी आमदनी और करियर पर महसूस करती हैं। जो महिलाएं नौकरी नहीं करतीं, उन पर भी इसी तरह के सामाजिक और वर्गीय दबाव काम करते हैं। दो बच्चों वाले परिवार हमारे यहां अब भी सबसे अच्छे माने जाते हैं, लेकिन तीसरा बच्चा किसी अपवाद स्थिति में ही देखने को मिलता है। छोटे बच्चों की देखरेख का कोई ढांचा न समाज में है न कार्यस्थलों पर। ऐसे में कई बार काम छूट जाने की नौबत आ जाती है। इससे आगे की अड़चन बच्चे की पढ़ाई और लालन-पालन पर बढ़ रहे खर्चे से आती है। चीन में ये सारी समस्याएं भारत जैसी ही हैं और कुछ मामलों में ये यहां से भी ज्यादा गहरी हैं।

पैसा मांग रहे हैं लोग
मसलन, नौकरीपेशा महिलाओं का प्रतिशत चीन में भारत से कहीं ज्यादा है। बुनियादी आर्थिक असुरक्षा यानी बेरोजगार हो जाने की फिक्र चीनी परिवारों में भारत से कुछ कम है, लेकिन ठीक-ठाक गाड़ी और तीन बेडरूम वाला फ्लैट आज भी ईर्ष्या का कारण बनता है। ऐसे में एक से ज्यादा बच्चे पैदा करने से लोग सिर्फ इसलिए नहीं बचते कि दूसरा-तीसरा बच्चा हो जाने पर उसकी फीस नहीं माफ होगी। भविष्य की पूरी योजना का बंटाधार हो जाना परिवारों को इस दिशा में बढ़ने से रोकता है। चीनी हुकूमत ने अपनी तीन बच्चों की नीति को आकर्षक बनाने के लिए कुछ योजनाएं प्रस्तावित की हैं, हालांकि इन्हें नीतिगत रूप दिया जाना अभी बाकी है। इसमें चाइल्डकेयर का राष्ट्रीय सिस्टम बनाने, गर्भावस्था और शिशुपालन के दौरान महिला कर्मचारियों से भेदभाव के खिलाफ सख्ती बरतने और टैक्स में छूट दिए जाने जैसी बातें शामिल हैं। लेकिन 31 मई को नीति आने के बाद से चीन में शुरू हुई महाबहस में कुछ नव-दंपति बच्चा पैदा करने के लिए सरकार से 5 करोड़ रुपया मांग रहे हैं!

बारीकियों में जाएं तो चीन की एक बच्चा नीति उतनी सख्त कभी नहीं थी, जितनी यह दूर से दिखती रही है। हमारी चीन यात्रा के दौरान इंटरप्रेटर की भूमिका निभा रही लिन अपने मां-बाप की पांचवीं संतान थी। हमारे आश्चर्य जताने पर उसने बताया कि गांवों में और अल्पसंख्यक इलाकों में नीति ढीली रही है और लोग अलग से भी कुछ रास्ता निकाल लेते हैं। अभी कहा जा रहा है कि बच्चों की संख्या पर रोक न हटाने की मुख्य वजह अल्पसंख्यक आबादी को नियंत्रित रखना ही है। एक बात तय है कि चीन के लिए अभी समस्या जनसंख्या घटाने की नहीं, बढ़ाने की है। आबादी घटनी न शुरू हो जाए, इसके लिए प्रति परिवार बच्चों का औसत दो से ज्यादा होना चाहिए। जापान, रूस और ज्यादातर पूर्वी यूरोपीय देश समय से इस बारे में कुछ कर नहीं पाए और कामकाजी आबादी का घटना आज उनके लिए बहुत बड़ी समस्या बन गया है। चीनी इस मामले में समय से सक्रिय हो पाए या नहीं, समय बताएगा।

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