1857 में अंग्रेजों के काल बनाने वालों में राव तुलाराम का भी रहा बड़ा योगदान

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विनोद कुमार यादव

10 मई 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन की वीरगाथा दिल्ली-एनसीआर के ग्रामीण इलाकों से ताल्लुक रखने वाले नायकों की शहादत के जिक्र के बगैर पूरी नहीं होती। उस स्वतंत्रता संग्राम में उत्तर भारत के कई छोटे शहरों और गांवों ने अपने-अपने तरीके से अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिलाने में योगदान किया था।

आजादी की यह अंगड़ाई 10 मई की सुबह 6.30 बजे तब शुरू हुई, जब ‘थर्ड लाइट कैवेलरी रेजिमेंट’ के सैनिक मेरठ छावनी में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजाते हुए दिल्ली की ओर चल दिए। विद्रोह की खबर मिलने पर गुड़गांव (गुरुग्राम) के किसान-काश्तकार और खेतिहर मजदूर अंग्रेजों के खिलाफ भड़क उठे। फर्रुखनगर के अहमद अली, बल्लभगढ़ के नाहर सिंह और पटौदी के अकबर अली के नेतृत्व में वहां के किसान-बुनकरों ने मेजर एडेन की अगुआई में आई फिरंगी फौज को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

क्रांति की यह ज्वाला शीघ्र ही गुड़गांव से लेकर धारूहेड़ा-रेवाड़ी-नारनौल यानी पूरे अहीरवाल क्षेत्र में फैल गई। अहीरवाल क्षेत्र की जनता अंग्रेजों के भू-राजस्व, अराजक कानून-व्यवस्था, रंगभेद और दमनकारी नीति से पहले ही परेशान थी। विद्रोह की खबर मिलते ही यहां के किसानों और खेतिहर मजदूरों ने साधारण कृषि-औजार लेकर अंग्रेजों के खिलाफ जंग शुरू कर दी।

रेवाड़ी के निकटवर्ती गांव रामपुरा के 32 वर्षीय राव तुलाराम ने अहीरवाल क्षेत्र में क्रांति की बागडोर संभाली और गांव-गांव घूमकर लोगों में क्रांति-चेतना पैदा की। उन्होंने अपने चचेरे भाई राव गोपाल देव के साथ रेवाड़ी परगने में लगभग 1000 किसानों की सेना बनाई। दोनों ने 17 मई को रेवाड़ी के तहसीलदार और थानेदार को बेदखल करके हेड क्वार्टर पर कब्जा कर लिया। राव तुलाराम ने अपना राजस्व विभाग एवं वित्तीय विभाग स्थापित किया। रेवाड़ी के महाजनों से डेढ़ लाख रुपये का ऋण लेकर राव तुलाराम ने अपनी सेना को और सुसंगठित और बड़ा किया, फिर अपने भाई राव गोपाल देव को कमांडर-इन-चीफ बना दिया।

राव तुलाराम की गतिविधियों से खुश होकर मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर ने उनको रेवाड़ी, भोरा और शाहजहांपुर का जागीरदार बना दिया। बदले में तुलाराम ने भी बहादुरशाह की हर संभव मदद की और सैनिक विद्रोह के नेता बख्तखान के हाथ मदद के रूप में 45000 रुपये बहादुर शाह को भेजे। ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन दस्तावेजों से पता चलता है कि तुलाराम और गोपाल देव की क्रांतिकारी सेना से फिरंगी हुकूमत इतना थर्राती थी कि मई से लेकर सितंबर तक उसकी राव तुलाराम से निर्णायक लड़ाई लड़ने की हिम्मत नहीं हुई। सितंबर तक गुड़गांव, फरीदाबाद, महेंद्रगढ़, कनीना, बावल, फर्रुखनगर, रेवाड़ी, नारनौल, होडल और फिरोजपुर झिरका पर राव तुलाराम का कब्जा बना रहा।

2 अक्टूबर 1857 को ब्रिगेडियर जनरल सोबर्स के नेतृत्व में तोपखाने से लैस आर्मी की एक बड़ी रेजिमेंट रेवाड़ी पहुंची। 5 अक्टूबर को पटौदी के पास फिरंगी सैनिकों और राव तुलाराम के किसान क्रांतिकारियों में जबरदस्त संघर्ष हुआ। तुलाराम की नेतृत्व क्षमता व अदम्य साहस के सामने ब्रिटिश आर्मी में भगदड़ मच गई। 1857 के ‘नैरेटिव ऑफ इवेंट्स’ दस्तावेजों में विवरण मिलता है कि महीने भर चले संघर्ष में ब्रिटिश लश्कर में घबराहट व बेचैनी फैल गई। आखिर में 10 नवंबर को कर्नल जेराल्ड की कमान में भारी गोला-बारूद के साथ एक और बड़ी रेजिमेंट राव तुलाराम से लोहा लेने के लिए रवाना हुई। 16 नवंबर को जैसे ही अंग्रेजी सेना नसीबपुर के मैदान में पहुंची, राव तुलाराम के क्रांतिकारी फिरंगियों पर टूट पड़े।

इस संग्राम में कर्नल जेराल्ड समेत कई अंग्रेज अफसर मारे गए। लड़ाई में राव तुलाराम भी गंभीर रूप से घायल हो गए। घायलावस्था में उनके सैनिक उन्हें राजस्थान की ओर ले गए। कुछ दिनों के इलाज के बाद वह ठीक हो गए लेकिन इस दौरान पूरे अहीरवाल क्षेत्र पर अंग्रेजों ने अपना शासन स्थापित कर लिया था। अब अंग्रेजों से दोबारा लोहा लेने के लिए उन्हें एक बड़ी सेना की जरूरत थी। सहायता लेने के लिए वह काबुल गए पर वहां पेचिश की बीमारी से उनका देहांत हो गया।

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