देश की संप्रभुता के लिए चुनौतियों का कसता शिकंजा

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आर विक्रम सिंह

दुनिया के सभी देशों में एक ‘कोर सिटीजनÓ या मूल सशक्त नागरिक समूह होता है। यह उस देश की पहचान और उसके चरित्र से जुड़ा रहता है। जैसे चीन में हान चाइनीज हैं और पाकिस्तान में पंजाबी मुस्लिम हैं। ईरान की आर्यन शिया पहचान हैैं। ‘कोर सिटीजनÓ की विशुद्ध राष्ट्रीयता अपने दम पर अपने देशों को एक बनाए रखती है। दुख की बात है कि हमारे यहां इस मूल भारतीय चरित्र को निष्प्रभावी कर दिया गया है, अन्यथा देश में आज अनुच्छेद-370 और सीएए का विरोध संभव न हो पाता। साथ ही किसानों को कृषि कानूनों पर इस तरह से गुमराह करना भी आसान न होता। अमेरिका ने किसी इतिहास के बोझ के बिना यूरोपीय प्रवासी आधारित जो राष्ट्रीय पहचान बनाई वह हमेशा से उसके साथ खड़ी रही है, लेकिन जब कभी यह जनसमूह बिखराव का शिकार हो जाता है तो एक अच्छे-खासे देश का भी अंत हो आता है। सोवियत संघ के विघटन का उदाहरण हमारे सामने है। यह काम बोरिस येल्तसिन जैसे एक नेता ने अंजाम दिया। तब मिखाइल गोर्बाचेव सोवियत संघ के राष्ट्रपति थे। वह सोवियत संघ को नकारात्मक अधिनायकवादी शासन से मुक्त कर जनाधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवर्तन कर रहे थे। इसके लिए गोर्बाचेव ने सोवियत संघ में ‘ग्लास्नोस्तÓ और ‘पेरेस्त्रोइकाÓ अर्थात खुलेपन एवं आर्थिक, व्यवस्थागत सुधारों और नागरिक अधिकारों की बहाली का सिलसिला प्रारंभ किया। सोवियत संघ के समस्त राज्यों को स्वायत्तता और लोकतांत्रिक अधिकार दे दिए गए, लेकिन येल्तसिन ने सुधारों की मंद गति का आरोप लगाकर गोर्बाचेव का ही विरोध प्रारंभ कर दिया। उन्होंने सोवियत सीनेट में रोते हुए समर्थन मांगा। उनके आंसुओं ने असर किया। येल्तसिन रूस के राष्ट्रपति हो गए। अब सोवियत संघ के तत्कालीन राष्ट्रपति गोर्बाचेव और रूसी राष्ट्रपति येल्तसिन आमने-सामने थे। येल्तसिन ने खुद को रूस का सर्वाधिकार राष्ट्रपति बनाने के अभियान में षड्यंत्रपूर्वक सोवियत संघ को ही तोड़ दिया। जब तक रूसी जागे तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आज उनकी जीडीपी भारत ही नहीं, बल्कि भारत से नीचे के देशों दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के आसपास है। रूस के साथ ऐसा क्यों हुआ? मूल रूसी समाज सजग क्यों नहीं था? क्योंकि उसने येल्तसिन जैसा नेतृत्व चुन लिया, जिसका हित ही सोवियत संघ को तोड़ कर स्वयं को अधिकार संपन्न करने में निहित था।

सोवियत संघ का यह इतिहास हमारे लिए भी एक सबक है। हम राष्ट्रविरोधियों से भरे अपने देश में निहित स्वार्थी और क्षुद्र नेताओं को देख और समझ रहे हैं। परिवारवाद से ग्रस्त राष्ट्रीय, क्षेत्रीय दलों तथा उन जातिवादी नेताओं को देख रहे हैं। तुष्टीकरण से जन्मे स्वार्थी संगठनों और सभाओं को जान रहे हैं। जातिवादी और सांप्रदायिक विभाजनकारी समूहों की बातें भी हमने सुनी हैं। भय होता है कि हमारे अधकचरे लोकतंत्र में सत्ता की आपाधापी और बंदरबांट के बीच कहीं येल्तसिन जैसा कोई स्वार्थी चरित्र सत्ता में न आ जाए। क्या हम आशा कर सकते हैं कि हमारी लोकतांत्रिक राजनीति का वह भाग, जो धड़ल्ले से क्षेत्रीय-जातीय चरित्र विकसित कर रहा है, कल देश के लिए लड़ेगा? जिनकी सीमाएं ही राज्य विशेष की हैं, जिनका लक्ष्य मात्र उस राज्य की सत्ता है, वे समग्र देश के लिए कभी खड़े भी हो सकेंगे? उनके नेतृत्व को आपसी विभेद की सोच को बढ़ावा देने के अतिरिक्त क्या कभी कोई राष्ट्रीय महत्व के विषय उठाते देखा-सुना गया है? क्या कभी उन्हें पाकिस्तान के विरुद्ध बयान देते सुना गया है? नहीं, क्योंकि वे मानते हैं कि इससे अल्पसंख्यक वोट नाराज हो सकता हैै। ये समूह जिस सोच को लेकर चल रहे हैं वह राष्ट्रहित के सर्वथा विपरीत ही तो है। ये दल या समूह राष्ट्रहित के मार्ग की बाधाओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। कृषि कानूनों को बिना समझे उन्हेंं काले कानून की संज्ञा दे देना बताता है कि इन क्षेत्रीय-जातीय नेताओं का बौद्धिक स्तर क्या है। उनका सीएए विरोध और 370 के पक्ष में खड़ा होना बताता है कि उनका वोटहित राष्ट्रहित पर भारी है।

वाम दालों को लेनिन, स्टालिन और माओ की तर्ज पर खूनी क्रांति लाकर लाल कर देना चाहते हैैं। गजवा-ए-हिंद वाले जिहादी सारे भारत को हरा रंग देना चाहते हैं। और ये क्षेत्रीय क्षत्रप क्या चाहते हैैं? वास्तव में इनका एजेंडा जातीय-क्षेत्रीय अलगाव बढ़ाकर खंडित भारत में अपना जातीय-क्षेत्रीय हिस्सा बांट लेने का है।

हमने इतिहास में देखा है। हर जाति-समाज आक्रांताओं से पराजित होने के लिए अपनी-अपनी बारी का इंतजार करता रहा। कभी पंजाब सरहद पर सिकंदर को रोकने के क्रम में क्षत्रियों के वंशज और सिख बारी-बारी से पराजित हो गए। बलात मतांतरण हुए। दिल्ली के राजा अपने नंबर की प्रतीक्षा में रहे। महाराणा अकबर से अकेले जूझे। हम तो किस्तों में पराजित होने वाले, फिर कहानियां गढ़ कर गाल बजाने वाले लोग हैैं। राष्ट्र-धर्म की सुरक्षा, प्रत्याक्रमण, शत्रु का समूल नाश, अस्तित्व के लिए एक आवश्यक और गंभीर दायित्व है। हमारी आज की राजनीति बताती है कि यह मानसिकता अभी बदली नहीं है। हम आज भी उसी के कैदी हैं। किस्तों में हारना हमारा स्वभाव बन गया है।

समस्या की गंभीरता देश के सामने है। बड़ा सवाल है कि फिर कौन लड़ेगा भारत के लिए? युद्ध सैनिक नहीं सभ्यताएं लड़ती हैं। सैनिक तो सभ्यताओं की भुजा होते हैं। भारतीय नागरिकों का वह समाज या ‘मूल नागरिकताÓ समूह कौन-सा है, जो प्रत्येक दशा में शत्रुओं का विनाश कर, अपनी शहादतें देकर, रक्त बहाकर देश को एक रखेगा? हमारे यहां ‘हानÓ चीनी समाज जैसा कोई समाज नहीं है। इसलिए समग्र राष्ट्र में राष्ट्रीयता की सांस्कृतिक चेतना का जागरण ही हमारे लिए एकमात्र उपाय है। क्षेत्र, जाति, भाषा की मानसिकता को दरकिनार करते हुए आज जो राष्ट्रवादी विचारों का अंकुरण प्रारंभ हो रहा है उसी में ही हमारी एकता अखंडता का सशक्त चेहरा दिखाई देता है।

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