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कश्मीर के शासकों की सूची (3238 ई.पू.-1154 ई.)

(जी गुरु जी इसका हेडिंग बदलने की कृपा करें।)

कश्मीर के इतिहास में कश्मीरी कवि कल्हण की राजतरंगिणी ही मुख्य है। कल्हण के पहले सुव्रत, क्षेमेन्द्र, हेलाराज, नीलमुनि, पद्ममिहिर और छविल्लभट्ट आदि ग्रंथकार हुए हैं, किन्तु इनमें से कई के ग्रन्थ अप्राप्य हैं। कल्हण ने लिखा है कि हेलाराज ने बारह हज़ार ग्रन्थ कश्मीर के राजाओं के वर्णन के एकत्र किए थे। नीलमुनि का लिखा नीलमतपुराण भी प्रकाशित हो गया है।

कल्हण ने जयसिंह के काल में 1148 में ‘राजतरंगिणी’ की रचना की। कल्हण कश्मीर के प्रधानमंत्री चम्पक के पुत्र थे (यह परिवार सातवाहन वंश की एक शाखा रहा होगा) और इसी कारण कल्हण को इस ग्रन्थ के लेखन के लिए प्रचुर सामग्री सहज ही में मिल गई थी। नीलमतपुराण को छोड़कर शेष 11 इतिहास-ग्रन्थ उसने देखे थे। यही नहीं, कल्हण ने घोषणा की कि उसने शासनपत्र, दानपत्र का भी प्रयोग इस ग्रन्थ के लेखन में किया।

बाद में जोनराज (1389-1459) ने 1412 में राजावली नामक ग्रन्थ लिखकर कल्हण से लेकर अपने काल तक के राजाओं का उसमें वर्णन किया। फिर उसके शिष्य वरदराज ने 1477 में एक और ग्रन्थ लिखा। अकबर के समय में प्राज्यभट्ट ने इस इतिहास का चतुर्थ खण्ड लिखा। इस प्रकार चार खण्डों में कश्मीर का इतिहास संस्कृत में श्लोकबद्ध विद्यमान है।

महाराजा रणजीत सिंह के कार्यकाल में जॉन मैकफेयर नामक यूरोपीय विद्वान् ने कश्मीर से पहले-पहल इस ग्रन्थ का संग्रह किया। एच.एच. विल्सन (1786-1860), विन्सेंट आर्थर स्मिथ (1848-1920) आदि कई पाश्चात्य लेखकों ने भी इस पुस्तक में वर्णित विषय की बड़ी प्रशंसा की है और विल्सन ने एशियाटिक रिसर्चेज में इस ग्रन्थ के प्रथम छह सर्ग का अनुवाद भी प्रकाशित किया था। 1840 में इस ग्रन्थ का प्रकाशन पेरिस से भी हुआ था।

बहुत-से लेखकों का मत है कि प्राचीन समय में कश्मीर की घाटी एक झील थी, जिसे कश्यप ऋषि ने सुखाकर रहने योग्य बनाया था। जब कश्मीर घाटी बह गई थी, तब कश्यप ने ब्रह्मणों को वहाँ बसने के लिए कहा। इस तरह कश्मीरी पंडितों ने घाटी में बसना शुरू कर दिया।

‘राजतरंगिणी’ में उल्लिखित विवरणों से भारत के प्राचीन इतिहास की अनेक घटनाओं और व्यक्तियों पर काफी प्रकाश पड़ता है। आधुनिक हिंदी के भीष्म पितामह भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850-1885) ने 1884 में ‘कश्मीर-कुसुम’ शीर्षक से कश्मीर के इतिहास पर एक बड़ा निबंध लिखा था, जो द मेडिकल हाल प्रेस, वाराणसी से प्रकाशित हुआ था. इस लेख में भारतेन्दु बाबू ने ‘राजतरंगिणी’ के आधार पर कश्मीर के राजाओं की सूची दी है। इसके बाद प्रसिद्ध इतिहास-संशोधक पं. कोटावेंकटचलम (1885-1959) ने कश्मीर-वंशावली पर काफी कार्य किया और उन्होंने कश्मीर के विभिन्न राजवंशों के क्रमानुसार राजाओं का पूरा ब्योरा ‘क्रोनोलोजी ऑफ़ कश्मीर हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड’ (1955) के पृ. 90 से 101 में दिया है।

पं. कोटावेंकटचलम ने ‘क्रोनोलोजी ऑफ़ कश्मीर हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड’ में बताया है कि इसमें महाभारत से पूर्व हुए मथुरा के श्रीकृष्ण-जरासंघ युद्ध, महाभारत-युद्ध और महाभारत के बाद की कश्मीर की ही नहीं भारत की विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं, यथा- परीक्षित की कश्मीर-विजय, परीक्षित की मृत्यु, गौतम बुद्ध का निर्वाण, कनिष्क का राज्यारोहण आदि का उल्लेख भी मिलता है। पं. कोटावेंकटचलम ने इस पुस्तक में अशोक, कनिष्क आदि की तिथियों का पौराणिक समीकरण स्थापित करने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है और एक वैकल्पिक तिथिक्रम प्रस्तुत किया है।

‘राजतरंगिणी’ में दिए गए अनेक ब्योरों की पुष्टि भारतीय पुराणों में उल्लिखित ब्योरों से हो जाती है, किन्तु भारत के इतिहास-लेखन में इस पुस्तक का कोई भी सहयोग नहीं लिया गया। उलटे फ्लीट आदि के द्वारा इसमें उल्लिखित तथ्यों को हर प्रकार से अप्रामाणिक सिद्ध करने का प्रयास किया गया।

‘राजतरंगिणी’ में कश्मीर का इतिहास महाभारत-युद्ध (3138 ई.पू.) से 312 वर्ष पूर्व, यानि 3138 + 312 = 3450 ई.पू. से 1148 ई. (‘राजतरंगिणी’ के रचनाकाल) तक का इतिहास सुलभ है। इस तरह कश्मीर का इतिहास 5,400 वर्षों से भी अधिक पुराना है। 3450 ई.पू. से 3238 ई.पू. के दौरान हुए 5 राजाओं के नामों का उल्लेख कल्हण ने नहीं किया है और ‘गोनन्द’ या ‘गोनर्द’ से राजाओं की सूची प्रारम्भ की है। गोनंद प्रथम मगध-नरेश जरासंध का रिश्तेदार था और युधिष्ठिर का समकालीन था। वह कृष्ण के बड़े भाई बलराम द्वारा मारा गया था। उनके पुत्र दामोदर I को कृष्ण और उनकी सेना ने मार डाला था। बाद में कृष्ण ने 6 महीने के लिए अपनी पत्नी यशोवती को अस्थायी शासिका बनाया, जिसे उनके बेटे गोनंद II ने सफल बनाया। इस गोनंद II को 3083 ई.पू. में हस्तिनापुर के राजा परीक्षित (अर्जुन के पोते) के साथ एक लड़ाई में मार दिया गया था। गोनंद II का कोई उत्तराधिकारी नहीं होने के कारण, परीक्षित ने कश्मीर राज्य पर अधिकार कर लिया, इसे अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया और इसे हरदेवदेव को सौंप दिया, जो उनके परिवार से थे। हरदेवदेव से, पांडव-वंश के राजाओं ने 3031-1752 ई.पू. से 1331 वर्षों तक कश्मीर पर शासन किया :

  1. गोनन्द I 3238-3188 ई.पू.
  2. दामोदर I 3188-3140 ई.पू.
  3. यशोवती (दामोदर I की पत्नी) 3140-3139ई. ई.पू.
  4. गोनन्द II (यसोवती के पुत्र) 3139 30-3083 ई.पू.
  5. परीक्षित 3083-3041 ई.पू.
  6. हरदेवदेव
  7. रामदेव
  8. व्यासदेव
  9. दारुणदेव
  10. सिंहदेव
  11. गोपालदेव
  12. विजयानंद
  13. सुखदेव
  14. रामानंद
  15. संधिमन
  16. महाराणदेव और कामंदेव
  17. चंद्रदेव
  18. आनंददेव
  19. द्रुपददेव
  20. हरनामदेव
  21. सुलकनदेव
  22. सिनादित्य
  23. मंगलादित्य
  24. क्षीमेंद्र
  25. भीमसेन
  26. इंद्रसेन
  27. सुंदरसेन
  28. गलगेंद्र
  29. बलदेव
  30. नलसेन
  31. गोकर्ण
  32. प्रह्लाद
  33. बमब्रू
  34. प्रतापशील
  35. संग्रामचन्द्र
  36. लारिकचन्द्र
  37. बीरमचंद्र
  38. बाबिघना
  39. भगवंत
  40. लव 1752-1713 ई.पू.
  41. कुश 1713-1674 ई.पू.
  42. खगेंद्र 1674-1635 ई.पू.
  43. सुरेन्द्र (समस्या रहित) 1635-1596 ई.पू.
  44. गोधरा (एक और परिवार) 1596-1557 ई.पू.
  45. सुवर्ण 1557-1518 ई.पू.
  46. जनक 1518-1479 ई.पू.
  47. शचिनारा (उनके पैतृक चाचा शकुनि के बड़े पोते थे) 1479-1448 ई.पू.
  48. अशोक या धर्माशोक (गोनंद-राजवंश) 1448-1400 ई.पू. उसने अपना राज्य खो दिया; क्योंकि म्लेच्छों ने उस पर कब्जा कर लिया और वह जंगल में भाग गया। उनके बेटे जेलौक ने इसे प्राप्त किया :
  49. जेलौक 1400-1344 ई.पू.
  50. दामोदर II 1344-1294 ई.पू.
  51. हुश्क, जुश्क और कनिष्क 1294-1234 ई.पू.
  52. अभिमन्यु 1234-1182 ई.पू.

धर्माशोक, जो गोनंद-राजवंश के थे, बौद्ध-धर्म अपनाकर पापों से मुक्त हो गए, ने 1448-1400 ई.पू. के दौरान कश्मीर की राजधानी श्रीनगर शहर का निर्माण किया, जिसमें निन्यानबे लाख घर थे, जो धन-संपत्ति से परिपूर्ण थे। वह भी एक कवि थे।

गोनंद III का राजवंश 1182 ई.पू. से 272 ई.पू. (कुल 910 वर्ष) :
53. गोनंद III 1182-1147 ई.पू.
54. विभीषण 1147-1092½ ई.पू.
55. इंद्रजीत 1092½-1057 ई.पू.
56. रावण 1057-1027 ई.पू.
57. विभीषण II 1027-991ई. ई.पू.
58. किन्नर या नार 991½-952 ई.पू.
59. सिद्ध 952-892 ई.पू.
60. उत्पलक्ष 892-861½ ई.पू.
61. हिरण्याक्ष 861½-824 ई.पू.
62. हिरण्यकुल 824-764 ई.पू.
63. वसुकुल 764-704 ई.पू.
64. मिहिरकुल 704-634 ई.पू.
65. बाका 634-594 ई.पू.
66. क्षितिनन्दन 594-564 ई.पू.
67. वसुनन्दन (कवि) 564-512 ई.पू.। वसुनन्दन कवि थे और इन्होंने ‘समरशास्त्र’ की रचना की थी।
68. नर 512-477 ई.पू.
69. अक्ष 477-417 ई.पू.
70. गोपादित्य 417-357 ई.पू.। गोपादित्य ने 367-366 ई.पू. में आद्य शंकराचार्य का मंदिर बनवाया था। उन्होंने कई मंदिरों और अग्रहारम की स्थापना की। वह एक कवि भी थे।
71. गोकर्ण 357-322 ई.पू.
72. किंखिल या नरेंद्रादित्य 322-285 ई.पू.
73. अंध युधिष्ठिर 285-272 ई.पू.
(छोटी आँखोंवाले होने के कारण उन्हें लोगों द्वारा अंध-युधिष्ठिर कहा जाता था। वास्तव में वे अंधे नहीं थे।)

प्रतापादित्य का वंश (272 से 80 ई.पू. 6 राजाओं के साथ (कुल 192 वर्ष) :
74. प्रतापादित्य 272-240 ई.पू.
75. जलौकस 240-208 ई.पू.
76. तुन्जिन 208-172 ई.पू.
77. विजय 172-164 ई.पू.
78. जयेन्द्र 164-127 ई.पू.
79. संधिमती 127-80 ई.पू.
इस 74वें राजा प्रतापदित्य का उल्लेख राजतरंगिणी में विक्रमादित्य के एक रिश्तेदार के रूप में किया गया है, उन्हें मंत्रियों द्वारा दूर देश से लाया गया था और कश्मीर के सिंहासन पर बिठाया गया था। उसने 272 से 240 ई.पू. तक कश्मीर पर शासन किया। विक्रमादित्य का उल्लेख यहां 457 ई.पू. के उज्जैन के श्रीहर्ष विक्रमादित्य के रूप में होना चाहिए। कल्हण का कहना है कि यह विक्रमादित्य, प्रतापदित्य का रिश्तेदार 57 ई.पू. का शकारि विक्रमादित्य नहीं था।
80. मेघवाहन 80-46 ई.पू.
81. प्रवरसेन या श्रेष्ठसेन 46-16 ई.पू.
82. हिरण्य 16 ई.पू.-14 ई.। हिरण्य का निस्संतान ही देहान्त हो गया। वह तोरमान का बड़ा भाई था, जो अपनी पत्नी और बेटे के साथ निर्वासन में था।
83. मृगपुत्र 14 – 19 ई.। इन्हें उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने कश्मीर के राजा के रूप में भेजा था।
84. प्रवरसेन II (तोरमान का पुत्र) 19-79 ई.
85. युधिष्ठिर द्वितीय 79-118 ई.। यह शालिवाहन-संवत् के प्रवर्तक महाराज शालिवाहन के समकालीन था)
86. लक्ष्मण (नरेंद्रादित्य) 118-131 ई.
87. तुन्जिना या रणादित्य (कवि) 131-173 ई.
87. विक्रमादित्य 173-215 ई.
89. बालादित्य 215-252 ई.

कर्कोट-राजवंश (कुल 17 राजाओं ने 600 वर्षों तक शासन किया) :
90. दुर्लभवर्धन (बालादित्य के दामाद) 252-288 ई.
91. दुर्लभका या प्रतापादित्य 288-338 ई.
92. चंद्रपीड़ या वर्णादित्य 338-397 ई.
93. तारापीड़ या उदयादित्य 397-431 ई.
94. ललितादित्य या मुक्तापीड़ (कवि) 431-467 ई.। इन्होंने कश्मीर में प्रसिद्ध मार्तण्ड (सूर्य) मंदिर का निर्माण कराया।
95. कुवलयादित्य 467-468 ई.
96. वज्रादित्य या ललितापीड़ 468-525 ई.
97. पृथिव्यापीड़ 525-569 ई.
98. संग्रामापीड़ I 569 ई. (केवल 7 दिनों तक शासन किया)
99. जयपीड़ (पंडित और कवि) 569-620 ई.
100. ललितापीड़ 620-672 ई.
101. संग्रामपीड़ II 672-729 ई.
102. जयपीड़ 729-781 ई.
103. अजीतापीड़ 781-837 ई.
104. अनंगपीड़ 837-840 ई.
105. उत्पलपीड़ 840-845 ई.
106. सुखवर्मा 845-852 ई.

उत्पल-राजवंश :
107. अवंतिवर्मा 852-880 ई.। इनके दरबार में आनंदवर्धन, रत्नाकर-जैसे कई शोभायमान थे।
108. शंकरवर्मा 880-900 ई.पू.। उत्तरज्योतिष, दिव्यकटक और सिंहपुर, जो अब अफगानिस्तान का हिस्सा है, में यवनों के ब्राह्मण राजा लल्यसाही के समकालीन
109. गोपालवर्मा (नाबालिग, जिनकी माँ सुगंधा ने शासन किया) 900-902 ई.
110. संकट
111. सुगंध
112. सूरवर्मा 902-904 ई. (सभी 3 ने केवल 2 वर्षों तक शासन किया)
113. पार्थ 904-918 ई.
114. निर्जीतवर्मा 918-920 ई.
115. चक्रवर्मा (हत्या) 920-934 ई.
116. उन्मत्तिवर्मा 934-936 ई.

कश्मीर के गुप्त-ब्राह्मण राजा :
117. यसस्कर 936-945 ई.
118. वर्णत (1 महीना)
119. संग्रामदेव (5 महीने) 945-946 ई.
120. पर्वगुप्त 946-948 ई.पू.
121. क्षेमगुप्त 948-957 ई.
122. अभिमन्युगुप्त 957-971 ई.। अभिमन्यु एक नाबालिग था, जो मां दिद्दा या क्षेमगुप्त की पत्नी दित्था देवी द्वारा शासन किया गया। दिद्दा लल्याशाही के वंशज काबुल के भीमशाही की समकालीन थीं और भीमशाही की पोती थीं।
123. नंदीगुप्त (दिद्दा का दूसरा पुत्र) 971-972 ई.
124. त्रिभुवनगुप्त (दिद्दा का तीसरा पुत्र) 972-974 ई.
125. भीमगुप्त (दिद्दा का चौथा पुत्र) 974-979 ई.। सभी बेटे नाबालिग थे। तो, माँ दिद्दा द्वारा शासन
126. दिद्दा या दित्था, ने स्वयं 979-1012 ई. तक शासन किया। दिद्दा लोहार के सिंहराज की पुत्री और क्षेमगुप्त की पत्नी थीं। यह लोहार-परिवार आंध्र-सातवाहन वंश का है। यह सिंहराज काबुल के भीमशाही के दामाद हैं, जो थोमारा राजवंश के थे, जो चार अग्निवंशियों में से एक थे। इन दस ब्राह्मण-राजाओं ने 76 वर्षों तक शासन किया।

कश्मीर के लोहार वंश के शासक (छह राजाओं ने 98 वर्षों तक शासन किया) :
127. संग्रामराज 1012-1027 ई.। यह दिद्दा का भाई था; काबुल के त्रिलोचनपाल के समकालीन
128. हरिराज : केवल 22 दिन
129. अनंतदेव 1027-1062 और 1062-1078 ई.। अनंतदेव को 1062 ई. में कुछ दिनों के लिए अलग रखा गया था, लेकिन वापस आ गया।
130. कलश या रणादित्य (पंडित और कवि) 1078-1088 ई.
131. उत्कर्ष (केवल कुछ दिन)
132. हर्ष 1088-1110 ई.

कश्मीर के अग्निवंश या ब्रह्मक्षेत्र राजा :
133. उच्चल (कुछ दिन)
134. शंखराज 1110-1120 ई.
135. सुस्सल 1120-1127 ई.
136. जयसिंह 1127-1154 ई.। कल्हण ने ‘राजतरंगिणी’ में जयसिंह तक का इतिहास दिया है।
(साभार)

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