हमारे दरवाजे पर उत्पात मचाती प्रलय

20jun_flood1वेद-मत का प्रचार प्रसार करना महर्षि दयानंद जी महाराज का जीवनोद्देश्य था। उनके सत्प्रयासों और कठोर तपस्वी जीवन के परिणाम स्वरूप मिथ्या-पंथों-संप्रदायों एवं मत मतांतरों के मठाधीशों के हृदय की धड़कनें बढ़ गयी थीं। क्योंकि सबको अपने मिथ्यावाद की चूलें हिलती दिख रही थीं। अंग्रेजों के ईसाई पादरी भी महर्षि के शुद्घि अभियान और शास्त्रार्थ आवाहन के निशाने पर थे। इसलिए कितने ही स्थानों पर ईसाई पादरियों से भी महर्षि दयानंद का शास्त्रार्थ हुआ और महर्षि दयानंद जी महाराज ने वेदधर्म की सर्वोच्चता को स्वीकार करने के लिए ईसाई पादरियों को विवश कर दिया।
ईसाई पादरियों की पराजय को देखकर अंग्रेजी सरकार को भी पसीने आ रहे थे। वह जिस ईसाइयत को शुचिता, मानवता, पवित्रता और लोकतंत्र की ध्वजाहक सिद्घ कर भारत में उसके प्रचार-प्रसार में लगी हुई थी उसके इन कथित गुणों की पोल महर्षि वेद के प्रमाणों से बड़ी सावधानी और साहस के साथ खोलते जा रहे थे। महर्षि वेद की शुचिता, मानवतावाद, पवित्रता और लोकतंत्र के प्रति गहन आस्था को शेरदिली से स्थापित करते जा रहे थे। चारों ओर वेद का डंका बज रहा था। मिथ्या मतों की इमारतें धड़ाधड़ गिरती जा रही थीं। तब ईसाई अंग्रेजों के कई बड़े उच्चाधिकारियों सहित शासकों तक ने महर्षि दयानंद से किसी प्रकार अंग्रेजियत का गुणगान करने के लिए प्रेरित करने हेतु वार्ताएं करना उचित समझा। परंतु महर्षि दयानंद ने बड़ी ही दृढ़ता से अंग्रेजों की चाल में फंसने से इंकार कर दिया। वह उस समय स्वराज्य के उद्घोषक, प्रेरक और उद्बोधक बनकर उभरे और उन्होंने भारतीय स्वातंत्रय समर को स्वराज्यवादी चिंतन देकर उसकी दिशा ही परिवर्तित कर दी।
महर्षि दयानंद पंजाब के लाहौर शहर में अपना डेरा डाले हुए थे। लाहौर (अब पाकिस्तान में) उस समय के भारत का प्रमुख शहर था और इस ऐतिहासिक नगरी से भारत के क्रांतिकारियों स्वतंत्रता सेनानियों एवं इतिहास पुरूषों के कितने ही प्रसंग जुड़े हुए हैं। महर्षि ने भी यहां रहकर लोगों को वेदमत के प्रति आस्थावान बनाने का प्रयास किया था। अपने इसी प्रयास के लिए जब महर्षि यहां डेरा डाले हुए थे, तो तत्कालीन पंजाब के लॉर्ड साहब ने महर्षि से मिलकर ईसाइयत की श्रेष्ठता पर चर्चा करना उचित समझा। लार्ड साहब ने महर्षि से वार्ता का समय चाहा। समय दिया गया। नियत समय पर वार्ता हुई, तो चर्चा का क्रम आगे बढ़ा। लॉर्ड साहब ने पांच प्रश्न महर्षि दयानंद से पूछे। उसका पहला प्रश्न था-
स्वामी जी ! आपकी दृष्टि में कौन सा सम्प्रदाय अच्छा है?
इस पर स्वामी जी ने कहा कि कोई सा भी संप्रदाय अच्छा नही है। तब लॉर्ड साहब ने आगे प्रति प्रश्न किया कि आप ऐसा कैसे कह सकते हैं, कि कोई सा सम्प्रदाय भी अच्छा नही है, क्योंकि आप तो स्वयं मजहब के प्रचारक हैं?
इस पर स्वामीजी महाराज ने कहा कि मैं किसी संप्रदाय या मजहब का प्रचारक नही हूं, मैं तो वेदधर्म का प्रचारक हूं। इस पर लार्ड ने आगे कहा-
हम आगे बढ़ें या नही?
इस पर स्वामी जी ने कहा कि द्विज यदि संतोष करता है तो उसका नाश होता है, और ब्राहमण संतोषी न हो तो पतित हो जाता है।
तीसरा प्रश्न करते हुए लॉर्ड साहब ने कहा-भारत में हमारी चिरस्थायी उन्नति कैसे हो?
इस पर स्वामीजी ने सधे सधाये शब्दों में कहा-वेद, ब्राह्मण और गऊ की रक्षा से ही भारत में आपकी उन्नति होना संभव है।
चौथा प्रश्न करते हुए लार्ड ने पूछा-
स्वामीजी! युद्घ विद्या वेदों में है, अथवा नही? स्वामी जी ने कहा-वेद में सब विद्याएं हैं। युद्घ के लिए धनुर्वेद है। इसके लिए मनु स्मृति से व्यूह रचना का श्लोक उन्होंने लार्ड को सुनाया, जिसमें बताया गया था कि युद्घ में ऐसी व्यूह रचना करनी चाहिए कि अपने लोग तो बच जावें परंतु शत्रु पक्ष का नाश हो जाए।
अंत में लार्ड साहब ने पांचवां प्रश्न करते हुए पूछा- हमारा ईसाई मत उन्नति पर है, आप इसको क्यों नही मानते?
इस पर महर्षि दयानंद जी महाराज ने कहा-आपकी उन्नति का कारण ईसाई मत नही है। ब्रहमचर्य का इंजील में उल्लेख नही है, परंतु यूरोपियन लोग बड़ी आयु में विवाह करते हैं। स्त्रियों के अधिकार इन में सुरक्षित हैं। इस कारण वहां उन्नति हेा रही है। ये बातें वास्तव में वेद की हैं, जो वेदमार्ग पर चलेगा वही उन्नति करेगा।
महर्षि दयानंद के सामने ऐसे अवसर एक बार नही, अपितु उनके जीवन में कितनी ही बार आये, जब अंग्रेज अधिकारियों या शासकों ने उन्हें ईसाई मत के प्रति उदारता दिखाने का प्रस्ताव रखा। परंतु महर्षि दयानंद अपने विचारों से फिसले नही और वेद धर्म की सत्यता पर अडिग रहे। परंतु आज के भारत में ईसाइयत बड़ी तेजी से बढ़ रही है। इसका कारण अपने वेद धर्म की सर्वोच्चता के प्रति हमारी अज्ञानता है। अंग्रेजों के काल से भी अधिक तेजी से ईसाइयत भारत में पैर जमा रही है। हमारे लोगों को धन का प्रलोभन देकर या किसी और प्रकार से ईसाई मिशनरी अपने शिकंजे में फंसा रही हैं। धर्मांतरण के षडयंत्र को देश की सुपर पी.एम. सोनिया गांधी बड़ी सावधानी से रच रही हैं। ये सारा खेल लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हो रहा है। बहुसंख्यक हिंदुओं को अल्पसंख्यक बनाकर इस प्राचीन देश को सांस्कृतिक रूप से नष्ट करने के इस षडयंत्र में आज कितने ही ‘लाट साहब’ लगे हैं। खेद का विषय है कि उन्हें सटीक उत्तर देने वाला कोई महर्षि दयानंद हमारे पास नही है। ईसाई मिशनरियां विश्व में किस प्रकार फेल रही हैं, इसके लिए 1989 की रिपोर्ट आंख खोलने वाली है-विश्व भर में ईसाई चर्चों की संपत्ति लगभग एक सौ पैंतालीस बिलियन अमेरिकी डालर यानी लगभग सात लाख पचास हजार करोड़ है तथा इकतालीस पूर्णकालिक कार्यकर्ता हैं। तेरह हजार बड़े पुस्तकालय बाईस हजार प्रकाशित पत्रिकाएं तथा अठारह सौ रेडियां टी.वी स्टेशन हैं। सारे विश्व में चार हजार मिशन एजेंसियों द्वारा मिशन की गतिविधियां चल रही हैं, जिनके संयंत्रों को दो लाख 62 हजार तीन सौ मिशनरी आठ बिलियन अमरीकी डालर (यानि कि लगभग चालीस हजार करोड़ रूपये ) के खर्च पर चलाते हैं। इसके अतिरिक्त दस हजार पुस्तकें और पैम्फलेट्स आदि विदेशों में धर्मांतरण के लिए उपलब्ध किये जाते हैं।’
इस सारे तामझाम का अधिकांश भाग भारत जैसे देशों पर निशाना साधने पर लगा हुआ है। जहां का राजनैतिक नेतृत्व मानसिक नपुंसकता का शिकार है और समाज में धर्मनिरपेक्षता का पक्षाघात हो चुका है। सचमुच हमारे स्व पर घातक हमला हो चुका है। प्रलय का उत्पात हमारे दरवाजे पर विनाश मचा रहा है और हम झूठे वैभव की कहानी लिखते लिखते अपनी ही पीठ को थपथपा रहे हैं। देर केवल इतनी है कि प्रलय का यह ताण्डव अभी हर घर की देहरी के भीतर नही घुसा है। समय रहते यदि सुरक्षा प्रबंध नही किये गये तो सर्वनाश हो जाएगा।

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