पागलपन से कम नहीं है

दान-पुण्य के नाम पर यह बर्बादी

– डॉ. दीपक आचार्य

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मकर संक्रांति के ये दो-तीन दिन हमारे यहाँ दान-पुण्य और धर्म के नाम पर उन्माद अभिव्यक्ति का वार्षिक पर्व हो चला है।  धर्म और दान-पुण्य करें मगर इसके नाम पर आजकल जो हो रहा है वह किसी भी दृष्टि से धर्म नहीं कहा जा सकता, बल्कि जो कुछ हो रहा है उससे अधर्म और हमारा पागलपन पूरी तरह झलक रहा है।

मल मास और मकर संक्रांति के ये दिन..krodh.. सभी को लगता है कि जैसे इन दो-तीन दिनों में जितना दान-पुण्य का धर्म कमा लिया जाए,कमा लें..इसमें पीछे क्यों रहें। दो तरह के लोग हैं। एक वे हैं जो धर्मभीरू और रूढ़ीवाद की कैद में बँधे हुए छटपटा रहे हैं और उन्हें लगता है कि भगवान इसी से खुश होता है इसलिए कुछ तो पुण्य पा ही लें।

दूसरी किस्म में वे लोग हैं जो व्यभिचारों, अपराधों, अन्याय और बेईमानी, शोषण, अनाचार, रिश्वतखोरी, मुनाफाखोरी, लूट, भ्रष्टाचार तथा अनैतिक कर्मों से धन और संसाधन जमा करते हुए पापों से भरते जा रहे हैं, इन लोगों को लगता है कि जैसे थोड़ा-बहुत भी दान-धर्म हो जाए तो पापों का असर कम हो जाए, पुण्य मिल जाए और नरक की यातना से बच जाने लायक ईश्वरीय कृपा मिल जाए अथवा पापों की समाप्ति होकर पुण्य लाभ मिल जाए। इसलिए जो कुछ संग्रह किया है उसका हजारवां अंश दान कर देने में क्या जाता है।

ये लोग अपने आपमें कितने ही गंदे और क्रूर क्यों न हों, इन दिनों पुण्य का मौका कमाने में पीछे नहीं रहते। फिर जहां कहीं ये पुण्य करते हैं इनके प्रताप से भरपूर और मनचाही पब्सिसिटी मिल जाती है सो अलग फायदा। पुण्य का पुण्य, प्रचार भी मिल जाए, और आम लोगों की नज़रों में अच्छी छवि बनने लगती है वो अलग।

दान-पुण्य अमीर करे या गरीब, सज्जन करें या दुर्जन… अच्छी बात है। लेकिन आजकल मकर संक्रांति पर दान-पुण्य के नाम पर जो कुछ हो रहा है वह समाज के लिए अच्छा नहीं है और इससे सामग्री की बर्बादी ज्यादा हो रही है। लोग मकर संक्रांति के दिन बड़े सवेरे से चौराहों, सर्कलों,आम रास्तों, मन्दिर परिसरों और सार्वजनिक स्थलों पर हरे चारे, हरे चने, घास, खाद्य सामग्री आदि के इतने ढेर लगा देते हैं कि पशु पूरा खा भी नहीं पाते हैं और अपने खुरों से रौंदते रहते हैं । इससे दूसरे पशु भी मुँह नहीं लगाते। और अन्ततः यह सामग्री फेंकने में ही जाती है।

मकर संक्रांति के दिन जितनी सामग्री हम पशुओं के लिए सड़कों पर डालते हैं उतनी सामग्री इन पशुओं के लिए महीने दो महीने काम आ सकती है। लेकिन हमारी आँखों पर चढ़ा हुआ धर्मान्धता का चश्मा इसे अनुभव नहीं कर पाता। हकीकत तो यह भी है कि इतनी सामग्री अगर कोई पशु एक ही दिन में खा ले तो उसे अजीर्ण आफरा हो जाए और कई पशुओं की मौत भी हो जाया करती है। ऎसे दान-पुण्य और धर्म से क्या अर्थ है?

दूसरी तरफ मकर संक्रांति के दान-पुण्य के नाम पर हम जो दान करते हैं उनमें नब्बे फीसदी लोग पात्र नहीं हुआ करते। दान का अर्थ यही है कि समाज या अपने आस-पास के जो प्राणी अभावों और समस्याओं से ग्रस्त हैं उनके अभाव हम दूर करने में मददगार बनें और जरूरतमन्द तक उसकी आवश्यकता की राशि या वस्तु पहुंचे ताकि उसके जीवनयापन को आसान बनाया सके, हमारे आस-पास कोई प्राणी भूखा-प्यासा नहीं रहे।

इसके विपरीत हमने दान-पुण्य का अर्थ निकाल लिया है भिखारियों को देना। असल में आजकल कुछेक लोगों को छोड़कर कोई भिखारी नहीं है। मकर संक्रांति के दिनों में भगवे, गेरुए वस्त्र पहनकर, तिलक-छापा लगाकर और माला-अंगुठियाँ पहनकर घूमने और माँगने वाले, बीड़ी-सिगरेट,अफीम-गांजा और दारू पीने वाले, माँसाहार करने वाले ये बाबावेशी भिखारी लोग ऎसे हैं जो पुरुषार्थ करना नहीं चाहते, हरामखोरी जिनके स्वभाव में आ गई है तथा इन सभी को समाज के उन मूर्खों के बारे में पता है कि ये लोग धर्म के नाम पर दान-पुण्य करने में पीछे नहीं रहते। किसी को पता नहीं है ये लोग कहाँ से आए हैं, क्या इनका चरित्र है।

हमारा दुर्भाग्य यह है कि हमारे आस-पास का कोई व्यक्ति कितना ही अभावग्रस्त या जरूरतमंद हो, हमें नहीं दिखता। और ये बाहर से अचानक आ धमकने वाले नालायक भिखारी चिकनी-चुपड़ी बातें कहकर हमें भरमाते हुए अपने जाल में फंसा कर जो अपेक्षा होती है उतना हमसे ले जाते हैं। हमें डूब करना चाहिए कि हमारे क्षेत्र में रहने वाले बंधु या भगिनियों या प्राणियों के प्रति हम बेपरवाह हैं, और भिखारियों के प्रति धर्म के नाम पर सहानुभूति जताते रहते हैं। उन पर लुटाने भर को तैयार रहते हैं। कितना शर्मनाक है हमारा यह चरित्र?

ऎसे भिखारियों की जिन्दगी के सच को हम जान लें तो इन्हें अपने आस-पास कभी नहीं फटकने दें। वास्तव में इन दिनों जो बाबा और भिखारी मकर संक्रांति पर पुण्य के नाम पर भीख मांगते घूम रहे हैं वे सारे धंधेबाज हैं और इन सभी के पास अपना अच्छा खासा बैंक बेलेंस है। दिन में भीख मांगते हैं और शाम ढले ये लोग हमारे दान-पुण्य के पैसों से माँस और दारू की पार्टियों का मजा लेते हैं।

यकीन न हो तो मकर संक्रांति को शाम ढले इनके डेरों की ओर एक बार चक्कर लगा लें। समझ में नहीं आता हम लोगों में वह पात्रता कहाँ चली गई जो सामने वालों को पहचान लिया करती थी। जो लोग दान-पुण्य से धर्म कमाने के नाम पर पैसे लुटा रहे हैं, सामग्री बर्बाद कर रहे हैं उन लोगों को चाहिए कि वे वास्तव में दान-पुण्य करना चाहते हैें तो अपने पैसों का उपयोग करें, दुरुपयोग न करें।

वैसे यह भी सत्य ही है कि जिसका जैसा पैसा होता है उसकी गति वैसी ही होती है क्योंकि उसके बुनियादी रास्तों से लेकर उपयोग में भी दुर्बुद्धि होती है, फिर खराब पैसा होगा तो वह बर्बादी के रास्ते ही खोलेगा। दान-पुण्य और धरम के नाम पर उन्मादी न बने रहें। गंभीरता से सोचें और अपने क्षेत्र के जरूरतमन्दों की मदद में आगे आएं। ऎसा कुछ काम करें कि अपने क्षेत्र में सेवा और परोपकार का कोई स्थायी माध्यम बने। शराबियों और माँसाहारियों को दान देना अपने आप में पाप मोल लेना है।

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