भगवान ने सब कुछ दिया है

सुखी या दुःखी होना अपने हाथ में

– डॉ. दीपक आचार्य

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इंसान की जात-जात की भूख और प्यास इतनी विराट और अपरिमित है कि पूरी दुनिया उसे मिल जाए तब भी भिखारी का भिखारी ही रहेगा, उसे संतोष या तृप्ति का अहसास कभी नहीं हो सकता।

इंसान के लिए संतोष या आत्म तृप्ति का स्रोत उसके मन में ही सुप्तावस्था में पड़ा होता है जबकि भूख और प्यास का रिश्ता उसके मनोविकारों, असंतोष और दुनियावी माया से जुड़ा होता है जहाँ वह जितना अधिक दौड़भाग करता है उतना ही अधिक उलझता और फँसता चला जाता है। उसे अपनी हर थोड़ी सी दौड़ के बाद लगता रहता है जैसे उसने जमाने भर का वो सब कुछ पा लिया है जो औरों के नसीब में शायद नहीं है।

यह खुशी कुछ क्षण रहने के बाद फिर उसका अवचेतन भूख और प्यास की याद दिलाता है, ऎसे में फिर वह भागना शुरू करता है। यह क्रम उसका इतना अधिक बढ़ता चला जाता है कि वह घनचक्कर होकर रह जाता है। दिमाग से अपने आपको सबसे ज्यादा समृद्ध, प्रतिष्ठित और महान समझने का सायास भ्रम बनाये रखता है लेकिन इतना सब कुछ पा जाने के बाद मन कभी शांत नहीं होता, वह उतना ही अधिक चंचल, उद्विग्न और उतावला होने लगता है।

तमाम उलझनों, चुनौतियों और खतरों के बावजूद एक सामान्य इंसान को भगवान ने उतना सामथ्र्य दिया ही है कि वह अपने आपको बनाये और बचाये रखते हुए आसानी से जीवन निर्वाह कर सके। इसके बावजूद हम औरों से अपनी प्रतिस्पर्धा शुरू कर देते हैं और यह स्पर्धा ऎसी घातक होती है कि नॉन स्टॉप या बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह निरन्तर स्पीड़ पकड़ती रहती है और एक समय बाद रफ्तार इतनी अधिक हो जाती है कि रुके नहीं रूकती। यह वो समय होता है जब हम अपने पास सब कुछ होते हुए भी स्वयं को अनाथ और अकेला पाते हैं।

दुःख और सुख अपने आप में मन का वो कालजयी और सार्वजनीन वहम है जिसे सामान्य इंसान कभी दूर नहीं कर सकता। प्रकृति और दुनिया में मस्ती से रहने के लिए जिन चीजों की जरूरत होती है वह आसानी से अपने आप उपलब्ध हैं लेकिन हमारा असंतोष का ग्राफ इतना बड़ा कैनवास पा लेता है कि हमें हमेशा कमी महसूस होती है । इस मानसिकता की वजह से हम सभी को हर दिन, हर पल यही लगता है कि कहीं न कहीं कोई कमी है जिसे पूरी करने के लिए कुछ न कुछ जतन करने की जरूरत है।

समृद्धों और अभावग्रस्तों की मानसिकता को जानने की कोशिश करें तो यह बात सामने आएगी कि अभावग्रस्तों के लिए बुनियादी सुविधाओं की जरूरत है और वे उसी में मस्त हैं जबकि हम लोगों के पास आधारभूत सुविधाओं का जख्ीारा है लेकिन हम उससे खुश नहीं हैं क्योंकि हमें अपनी जरूरतों की नहीं बल्कि औरों की तरह समृद्ध होने की आकांक्षा है और यही हमारे सारे दुःखों का प्रधान कारण है।

जिनके पास कुछ नहीं है उनके लिए  दुःखी होने के कारण हो सकते हैं लेकिन उन लोगों का क्या, जिनके पास सब कुछ और बहुत कुछ है फिर भी अपने राग-द्वेष, ईष्र्या और संकीर्ण मनोवृत्ति की वजह से हर क्षण दुःखी रहने की मानसिकता पाले हुए बैठे हैं।

इनमें से काफी संख्या में लोग ऎसे हैं जिनकी पूरी जिंदगी उन लोगों में कैद होकर रह गई है जो पराये हैं, बाहर वाले हैं, जिनका इनसे कोई लेना-देना नहीं,मगर लोग क्या कहेंगे, इस समस्या की वजह से हम अपने नैसर्गिक और सहज सुखों को भी प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं।

हमारी मानसिकता ही ऎसी हो गई है कि जो प्राप्त है उसके प्रति उपेक्षित रवैया अपनाते हैं और जिन वस्तुओं का आकर्षण फैला होता है उन्हें प्राप्त करने के लिए लपकते और लार टपकाते रहते हैं। यह स्थिति अपने आप में बड़ी ही विचित्र है।

जीवन के शाश्वत सत्य को जानने की थोड़ी सी कोशिश कर ली जाए तो हमें आसानी से समझ में आ सकता है कि थोड़ा सा त्याग और समन्वय रख लिया जाए तो हमारे दुःखों का कोई अस्तित्व रहे ही नहीं, मगर ऎसा सामान्यजन नहीं कर पाते।

जो हमें प्राप्त है उसका पूरा आनंद लें, इससे हमारी आशाओं और अपेक्षाओं को भी बल मिलता है अन्यथा प्राप्त वस्तुओं और लोगों की उपेक्षा तथा अनादर करने से जो प्राप्त होना है उस पर भी विराम लग जाया करता है। सहज स्थिति में हमेंं सब कुछ प्राप्त हो सकता है लेकिन शर्त यह है कि हम वर्तमान को स्वीकारें और उसी के अनुरूप सहज व सम रहें।

अपने जीवन की तुलना उन लोगों से करें जो कि अभावों से घिरे हुए हैं। इससे हमारी जीवनशैली से लेकर हमारे दुःखों के सारे कारण अपने आप समझ में आ सकते हैं लेकिन इसके लिए चाहिए ईमानदारीपूर्वक तुलनात्मक मूल्यांकन। हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति में कहीं कोई कमी नहीं होती, हमारे पास उतना सब कुछ है जो हमारे लिए जरूरी है, संचित भी है।

अपनी इच्छाओं की बजाय आवश्यकताओं पर ध्यान देने के साथ ही यह भी जरूरी है कि हम उसी में संतोष पाते हुए मस्ती से जीवनयापन की आदत डालें जो हमें प्राप्त है। उन वस्तुओं और व्यक्तियों की अभिलाषा या अपेक्षा न करें जो हमें सहजता से प्राप्त नहीं है।

दुनिया में जो कुछ सहजता से प्रसन्नतापूर्वक प्राप्त हो जाए, वही ईश्वरीय उपहार है। छीना झपटी और दबावों से अर्जित हर वस्तु में नकारात्मकता और आसुरी भाव समाहित होते हैं जो हमेशा अंधेरों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

जो लोग न्यूनतम आवश्यकताओं में प्रसन्न नहीं हैं वे ही संसार के ऎसे दुःखी प्राणी हैं जिन्हें मरते दम तक आप और हम कभी सुखी देख नहीं पाएंगे। जो लोग संतोषी हैं, वे अपने आप में धरती के इन्द्र हैं। सुख-समृद्धि प्राप्त कर दुःखी होना सहज है किन्तु संतोष और मस्ती के साथ जीवन जीना बिरलों का ही कमाल हो सकता है।

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